नई दिल्ली: राजधानी दिल्ली में पत्रकारों की गिरफ्तारी, मीडिया पर सेंसरशिप और विरोध प्रदर्शनों के कवरेज पर प्रशासनिक बंदिशों को लेकर बहस तेज हो गई है। हालिया घटनाओं पर प्रतिक्रिया देते हुए वरिष्ठ विश्लेषकों का मानना है कि जब पत्रकारों को काम करने से रोका जा रहा हो और उनके साथ बदसलूकियां हो रही हों, तब 'पत्रकारिता में संतुलन (Balance in Journalism)' की बात करना बेमानी है।
'पत्रकार तय करेगा कि कवरेज कहाँ से होगी'
इंटरव्यू के दौरान वरिष्ठ पत्रकार ने दिल्ली पुलिस और प्रशासन के उस रवैये पर कड़ा एतराज जताया जिसमें पत्रकारों को प्रदर्शनकारियों के बीच जाने से रोका जा रहा है। उन्होंने स्पष्ट किया कि:
"पत्रकार किसी घटना को कवर करने के लिए कितनी दूर जाएगा या कहाँ खड़ा रहेगा, यह उसके विवेक पर निर्भर करता है। पुलिस या सरकार यह तय नहीं कर सकती कि पत्रकार का कैमरा एंगल क्या होगा।"
उन्होंने कहा कि भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19 (1)(a) हर नागरिक को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देता है और मीडिया उसी अधिकार के तहत काम करता है।
पुलिस तंत्र का दबाव और मीडिया नियंत्रण
प्रशासन की पुलिसिया सख्ती पर बात करते हुए उन्होंने कहा कि पुलिस बल पर लगातार 18-18 घंटे काम करने का दबाव है और उनसे संविधान विरोधी काम कराए जा रहे हैं। वहीं, मेनस्ट्रीम मीडिया के कॉर्पोरेट नियंत्रण पर सवाल उठाते हुए उन्होंने कहा कि मीडिया घरानों की आर्थिकी पर कब्जा करके स्वतंत्र आवाजों को दबाने का प्रयास किया जा रहा है। यह स्थिति लोकतांत्रिक नहीं, बल्कि फासीवादी मानसिकता का प्रतीक है, जिससे निपटने के लिए अब वैकल्पिक और स्वतंत्र मीडिया को एकजुट होना पड़ेगा।





