पत्रकारों को प्रदर्शन कवर करने से रोकने, सोशल मीडिया अकाउंट निलंबित होने और सत्ता से सवाल पूछने की आजादी पर चर्चा
पत्रकारिता में निष्पक्षता और संतुलन को लेकर वरिष्ठ पत्रकार अभिसार शर्मा ने सवाल उठाए हैं। एक चर्चा के दौरान उन्होंने कहा कि पत्रकारिता का उद्देश्य ताकतवर और पीड़ित के बीच कृत्रिम संतुलन बनाना नहीं, बल्कि सत्ता से सवाल पूछना और तथ्यों को सामने लाना है। बातचीत में दिल्ली में प्रदर्शनों की कवरेज के दौरान पत्रकारों पर कथित पाबंदियों, सोशल मीडिया अकाउंट निलंबित होने और मीडिया संस्थानों के कामकाज पर भी चर्चा हुई।
‘संतुलन नहीं, सत्ता से सवाल जरूरी’
अभिसार शर्मा ने सवाल किया कि अत्याचार करने वाले और पीड़ित के बीच किस तरह का संतुलन बनाया जा सकता है। उन्होंने राजनीतिक और आर्थिक ताकत के असमान वितरण का उल्लेख करते हुए कहा कि एक तरफ एजेंसियों और संसाधनों तक पहुंच रखने वाले लोग हैं, जबकि दूसरी तरफ ऐसे लोग भी हैं जिनके बैंक खाते फ्रीज किए जाने का दावा किया जाता है।
उन्होंने पारंपरिक मीडिया और डिजिटल मीडिया के बीच कथित अंतर पर भी सवाल उठाए। चर्चा में सोशल मीडिया अकाउंट निलंबित होने का जिक्र करते हुए कहा गया कि पत्रकारिता में निष्पक्षता के दावे से अधिक महत्वपूर्ण है कि पत्रकार सत्ता से कठिन सवाल पूछने का साहस रखें।
पुराने आंदोलनों और मौजूदा हालात की तुलना
बातचीत में अभिसार शर्मा ने अन्ना हजारे आंदोलन और रामदेव आंदोलन की कवरेज के अपने अनुभव साझा किए। उन्होंने बताया कि उस दौर में न्यूज चैनलों के बड़े सेटअप और स्टूडियो प्रदर्शन स्थलों पर लगाए जाते थे। रामदेव आंदोलन के दौरान रात में हुई पुलिस कार्रवाई को दिखाने का भी उन्होंने उल्लेख किया।
उन्होंने लालू प्रसाद यादव के साथ अपने एक इंटरव्यू का उदाहरण देते हुए कहा कि पत्रकारों को नेताओं से सीधे सवाल पूछने और जवाब न मिलने पर भी अपनी भूमिका निभाने का अवसर मिलता था। उनके मुताबिक, उस समय प्रदर्शनों की कवरेज के दौरान मौजूदा स्थिति जैसी पाबंदियां उन्हें देखने को नहीं मिली थीं।
मोदी सरकार और मीडिया की भूमिका पर टिप्पणी
अभिसार शर्मा ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संदर्भ में 2002 के गुजरात दंगों की मीडिया कवरेज का उल्लेख किया। उनका आरोप था कि उस समय की रिपोर्टिंग को लेकर नाराजगी बाद के वर्षों में मीडिया के प्रति रवैये में दिखाई दी। उन्होंने कहा कि पिछले 12 वर्षों में कुछ मीडिया संस्थानों का रुख सरकार के प्रति अधिक समर्थन वाला हो गया है, लेकिन उनके अनुसार स्वतंत्र पत्रकारों ने अपना सवाल पूछने का तरीका नहीं बदला है।





