नई दिल्ली: राजधानी दिल्ली में चल रहे विरोध प्रदर्शनों के दौरान वकीलों और स्वतंत्र पत्रकारों पर पुलिसिया दमन को लेकर लीगल फ्रेटरनिटी ने कड़ा ऐतराज जताया है। प्रसिद्ध अधिवक्ता और कांग्रेस कार्यकर्ता मयंक ने एक ग्राउंड इंटरव्यू में सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के उल्लंघन, पत्रकारों व वकीलों की गिरफ्तारी और न्यायपालिका की भूमिका पर तीखी राय व्यक्त की।
'आवाज दबाने के लिए पत्रकारों और वकीलों को निशाना बनाया जा रहा'
अधिवक्ता मयंक ने आरोप लगाया कि प्रशासन उन लोगों को लक्षित कर रहा है जो कानून की समझ रखते हैं और जनता की आवाज को मुखर करते हैं। उन्होंने कहा:
"सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट आदेश दिया है कि अपनी प्रोफेशनल ड्यूटी कर रहे वकीलों और पत्रकारों के साथ कोई रुकावट नहीं होगी। इसके बावजूद कल पत्रकारों और वकीलों को न सिर्फ हिरासत में लिया गया, बल्कि वैन में बंद कर डंडों से पीटा गया।"
उन्होंने कहा कि इस तरह की कार्रवाइयों का मुख्य मकसद जनता के बीच एक डर का माहौल (Fear Psychosis) बनाना है, लेकिन अब लोग डरने वाले नहीं हैं।
न्यायपालिका और संस्थाओं की साख पर सवाल
न्यायपालिका में गिरते भाषाई स्तर और हालिया टिप्पणियों पर चिंता व्यक्त करते हुए मयंक ने स्पष्ट किया कि लोकतंत्र में कोई भी संस्था आलोचना या समीक्षा से ऊपर नहीं है। उन्होंने कहा कि भारत के सुप्रीम कोर्ट के पास असीमित शक्तियां (Judicial Review) हैं, और यदि न्यायपालिका सरकार के विस्तार की तरह काम करने के बजाय जनता के संवैधानिक अधिकारों की रक्षा करे, तो ऐसी स्थिति कभी उत्पन्न नहीं होगी।
मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे और कानूनी इम्युनिटी (Immunity) पर बात करते हुए मयंक ने कहा कि लोकतंत्र में सबसे बड़ी ताकत जनता है। समय बदलने पर कानून भी बदले जाएंगे और गलत काम करने वाले अधिकारियों की जवाबदेही तय होगी।
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