राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में एक बार फिर प्रशासनिक सख्ती और पुलिसिया बर्बरता की तस्वीरें सामने आई हैं। जंतर-मंतर और उसके आसपास के इलाकों में विरोध प्रदर्शन के लिए पहुंचे नागरिकों, प्रदर्शनकारियों और यहाँ तक कि लाइव कवरेज कर रहे स्वतंत्र पत्रकारों को भी दिल्ली पुलिस और पैरामिलिट्री फोर्स द्वारा जबरन हिरासत (डिटेन) में लेने का मामला सामने आया है। प्रशासन द्वारा उठाए गए इन कदमों ने एक बार फिर नागरिकों के मौलिक अधिकारों, प्रेस की स्वतंत्रता और कानून के प्रावधानों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। इस पूरे घटनाक्रम और मौके की जमीनी स्थिति का विस्तृत विवरण निम्नलिखित है।
1. जंतर-मंतर पर सुबह-सुबह पुलिसिया सख्ती और डिटेंशन
सुबह से ही जंतर-मंतर की सड़क पर तनावपूर्ण और मुस्तैद माहौल देखने को मिला, जहाँ प्रशासन किसी भी तरह के जन-आंदोलन को कुचलने के लिए पूरी तरह तैयार बैठा था:
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शांतिपूर्ण खड़े लोगों पर त्वरित कार्रवाई: मौके पर मौजूद स्वतंत्र पत्रकारों और रिपोर्टर्स के अनुसार, जंतर-मंतर पर जो लोग शांतिपूर्वक खड़े थे या इक्का-दुक्का संख्या में पहुंचे थे, उन्हें बिना किसी चेतावनी के तुरंत हिरासत में लिया जाने लगा। हालात यह थे कि नियमों के तहत तय संख्या या भीड़ न होने के बावजूद पुलिस ने रैंडम तरीके से लोगों को उठाना शुरू कर दिया।
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महिलाओं के साथ सख्ती: महिला प्रदर्शनकारियों को महिला पुलिसकर्मियों द्वारा जबरन बसों में ठूंसा गया, जबकि उनके चारों तरफ पुरुष पुलिसकर्मियों की भारी और आक्रामक घेराबंदी देखने को मिली। रिपोर्टिंग कर रहे पत्रकारों का आरोप है कि पुलिसकर्मियों का यह रवैया और बॉडी लैंग्वेज बेहद असंवेदनशील और बल प्रयोग पर आधारित थी।
2. डिटेंशन सेंटर और बसों में भरी जा रही भीड़
पुलिस प्रशासन ने विरोध प्रदर्शन को पूरी तरह से विफल करने के लिए राजधानी के इस महत्वपूर्ण हिस्से को एक खुली जेल में तब्दील कर दिया था:
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न्यायिक अभिरक्षा वाहिनी का इस्तेमाल: मौके पर डीटीसी और क्लस्टर बसों के साथ-साथ 'न्यायिक अभिरक्षा वाहिनी' लिखे वाहनों को तैनात किया गया था। जो भी व्यक्ति या प्रोटेस्टर वहां नजर आ रहा था, उसे तुरंत उठाकर इन गाड़ियों में भरा जा रहा था।
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हाउस अरेस्ट और रैंडम उठापटक: प्रदर्शनकारियों को यह तक नहीं बताया जा रहा था कि उन्हें किस आधार पर और कहाँ ले जाया जा रहा है। विरोध प्रदर्शन शुरू होने से पहले ही लोगों को घरों में नजरबंद (House Arrest) करने और सड़कों से खींचकर गाड़ियों में डालने का सिलसिला चल पड़ा था।
3. मीडिया और प्रेस की स्वतंत्रता पर सीधा हमला
इस पूरी कवरेज के दौरान यह बात सबसे प्रमुखता से सामने आई कि प्रशासनिक मशीनरी केवल प्रदर्शनकारियों ही नहीं, बल्कि जमीन पर सच दिखाने वाले स्वतंत्र पत्रकारों को भी अपना निशाना बना रही है:
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लाइव कवरेज में बाधा: रिपोर्टर्स और कैमरामैन जब जंतर-मंतर की सड़क पर खड़े होकर जमीनी हकीकत दिखा रहे थे, तब पुलिसकर्मियों और पैरामिलिट्री फोर्स ने उन्हें जबरन धक्का देकर पीछे हटाना शुरू कर दिया। पत्रकारों के माइक पर हाथ हटाए गए और उन्हें कैमरे पर तस्वीरें दिखाने से रोकने के लिए बल प्रयोग किया गया।
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बर्बर और तानाशाही रवैया: मीडियाकर्मियों ने आरोप लगाया कि दिल्ली की सड़कों पर पिछले कुछ दिनों से पुलिस का जो बर्बर और असंवैधानिक रवैया देखने को मिल रहा है, वह कानून-व्यवस्था बनाए रखने के नाम पर जनता की आवाज़ और सच को दबाने का एक सुनियोजित प्रयास है। भाषा और आचरण में संयम की जगह पूरी तरह से गुंडई और दबंगई दिखाई दे रही थी।
4. छावनी में तब्दील इलाका और केंद्रीय सुरक्षा बलों का पहरा
नई दिल्ली के जंतर-मंतर और जनपथ लेन वाले पूरे क्षेत्र को सुरक्षा बलों ने पूरी तरह से अपने कब्जे में ले लिया है:
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पैरामिलिट्री और पुलिस का जमावड़ा: दिल्ली पुलिस के अलावा भारी संख्या में पैरामिलिट्री फोर्स की टीमों को तैनात किया गया है। नई दिल्ली के उस पूरे इलाके में 37 से अधिक कड़े चेक पॉइंट बनाए गए हैं।
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इलाके की पूरी तरह सील बंदी: स्थिति ऐसी बना दी गई है मानो यह दिल्ली का कोई आम नागरिक क्षेत्र न होकर किसी युद्ध या अंतरराष्ट्रीय बॉर्डर का इलाका हो। इंटरनेट सेवाओं पर रोक, मेट्रो स्टेशनों के गेट बंद करना और आवाजाही पूरी तरह ठप करने से आम जनता को भारी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है।





