दिल्ली में चुनाव आयोग के खिलाफ और ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर प्रदर्शनों का सिलसिला लगातार जारी है। आरके आश्रम मेट्रो स्टेशन के पास आइसा (AISA) की अध्यक्ष नेहा बोरा और अन्य नेताओं के आह्वान पर जैसे ही प्रदर्शनकारी और छात्र एकत्र हुए, दिल्ली पुलिस और अर्धसैनिक बलों ने पूरी ताकत से उन्हें खदेड़ना शुरू कर दिया। राजधानी के सेंट्रल दिल्ली इलाके को पहले ही छावनी में तब्दील किया जा चुका है, जहाँ दर्जनों चेकपॉइंट और भारी पुलिस बल तैनात है।
महिला पत्रकारों के साथ बदसलूकी और घसीटकर डिटेंशन
इस पूरी प्रशासनिक कार्रवाई के दौरान सबसे शर्मनाक और चिंताजनक तस्वीर तब सामने आई जब ज़मीन पर सच्चाई दिखाने पहुँची मीडिया को भी पुलिस ने निशाना बनाया:
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प्रेस कार्ड देखने के बावजूद कार्रवाई: घटनास्थल पर कवरेज कर रही एक महिला पत्रकार और अन्य मीडियाकर्मियों को पुलिस और पैरामिलिट्री फोर्स ने जबरन रोकना शुरू कर दिया। महिला पत्रकार द्वारा बार-बार अपना प्रेस कार्ड दिखाने और मीडियाकर्मी होने की बात कहने के बावजूद पुलिसकर्मियों ने उनकी एक नहीं सुनी।
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लाठी-डंडों का प्रयोग और धक्का-मुक्की: महिला पत्रकारों और प्रदर्शनकारियों को घसीटते हुए पुलिस बसों और वैन में ठूसा गया। पुलिस ने लाठी-डंडों का भय दिखाकर और धक्का-मुक्की कर मौके से मीडिया को खदेड़ने का प्रयास किया, ताकि विरोध प्रदर्शन और पुलिसिया ज्यादतियों की कोई भी तस्वीर बाहर न आ सके।
लोकतंत्र का गला घोंटने की अघोषित नीति
राजधानी के आरके आश्रम, कनॉट प्लेस और जंतर-मंतर के आसपास के इलाकों में हालात यह हैं कि अगर कोई एक या दो व्यक्ति भी सड़क पर खड़े नजर आते हैं, तो पुलिस उन्हें तुरंत हिरासत में ले रही है।
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शांतिपूर्ण आवाज़ पर पहरा: छात्रों और नागरिकों का कहना है कि वे संविधान के दायरे में रहकर शांतिपूर्ण तरीके से अपनी बात रख रहे थे, लेकिन सरकार और प्रशासन संवाद करने के बजाय दमन का रास्ता अपना रहे हैं।
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अधिकारों का हनन: जिस तरह से कवरेज कर रहे पत्रकारों को डराया-धमकाया जा रहा है और आम नागरिकों के मौलिक अधिकारों को कुचला जा रहा है, वह भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में एक काला अध्याय बनता जा रहा है।
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