बाबूलाल गौर : जिन्होंने संघ के लिए पिता की शराब की दुकान पर बैठने से मना कर दिया
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बाबूलाल गौर : जिन्होंने संघ के लिए पिता की शराब की दुकान पर बैठने से मना कर दिया

By TheLallantop calender  21-Aug-2019

बाबूलाल गौर : जिन्होंने संघ के लिए पिता की शराब की दुकान पर बैठने से मना कर दिया

मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल गौर का निधन हो गया. वो अगस्त 2004 से नवंबर 2005 तक मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री रहे थे. लो ब्लड प्रेशर की शिकायत पर 7 अगस्त, 2019 को उन्हें भोपाल के एक अस्पताल में भर्ती किया गया था. वहां उनकी तबीयत बिगड़ी और बुधवार, 21 अगस्त, 2019 की सुबह उन्होंने अंतिम सांस ली. बाबूलाल गौर ने एक असाधारण ज़िंदगी जी. अपने पिता की दुकान चलाने से इनकार कर दिया क्योंकि मूल्य आड़े आ रहे थे. एक रुपया दिहाड़ी पर कपड़ा मिल में मज़दूरी की. राजनीति की. मंत्री बने. मुख्यमंत्री बने. भोपाल की गोविंदपुरा की सीट के अलावा एक और नाम अपनी पहचान के साथ चस्पा किया – बुलडोज़र. ये सब कैसे हुआ, हमने आपको बताया था, जब हमने तफसील से मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्रियों के किस्से सुनाए थे. अब बाबूलाल गौर शांत हो गए हैं. और बचे हैं उनकी ज़िंदगी के किस्से. 
पॉलिटिकल किस्सों की ख़ास सीरीज़- मुख्यमंत्री की इस कड़ी में बात उस लड़के की, जो पैदा उत्तर प्रदेश में हुआ था. जिसने शराब कंपनी में काम करने के लिए गांव और राज्य दोनों छोड़ दिया. मध्यप्रदेश आया और शराब कंपनी में नौकरी की. संघ की शाखा में जाने लगा, संघ के कहने पर शराब की दुकान छोड़ दी और घर लौट गया. वहां से भोपाल वापसी हुई, कपड़ा मिल में मज़दूरी की, ट्रेड यूनियन की सियासत करते हुए विधायक बना और एक वक्त आया, जब वो सूबे का मुख्यमंत्री बन गया. ये कहानी है मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री बाबूलाल गौर की.
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अंक 1. शराब बेचने वाला लड़का सीएम बन गया
ये कहानी है बाबूराम यादव की. जिनका जन्म तो उत्तरप्रदेश के प्रतापगढ़ में हुआ. लेकिन 44 सालों से वो मध्यप्रदेश की एक सीट से विधायक हैं. लेकिन न पहचान सिर्फ इतनी सी है, और न ही पहचान इस नाम से है. आप जिस नाम को जानते हैं. वो नाम है बाबूलाल गौर का. 2 जून 1930 की पैदाइश. उत्तरप्रदेश के प्रतापगढ़ के नौगीर गांव में. जब वो पैदा हुए तो देश में अंग्रेजों का राज था. गांवों में दंगल हुआ करते थे. ऐसे ही एक दंगल में बाबूलाल गौर के पिता श्री राम प्रसाद की जीत हुई. वो जीते तो अंग्रेजों ने उन्हें एक पारसी शराब कंपनी में नौकरी दे दी. लेकिन नौकरी के पीछे गांव छूटा, राज्य छूटा. आंख खुली तो सामने नया शहर था भोपाल. जगह थी बरखेड़ी. कैलेण्डर में साल लगा था 1938. कुछ दिन की नौकरी बीती तो कंपनी ने खुद की दुकान दे दी. उसी दुकान में काम करने लगे. शराब बेचने लगे.
16 बरस हुए तो बाबूलाल संघ की शाखा जाने लगे. वहां कहा गया, शराब बेचना छोड़ दो. इसी बीच पिता की मौत हो गई. बात ये आई कि शराब की दुकान बाबूलाल गौर के नाम कर दी जाए. बाबूलाल ने शराब की दुकान चलाने से मना कर दिया. गांव लौट गए. खेती की कोशिश, वो उनके बस की नहीं थी. वापस भोपाल लौट आए. कपड़ा मिल में मजदूरी करने लगे. कपड़ा मिल में मजदूरी करते बाबूलाल गौर को रोज़ एक रुपये दिहाड़ी मिलती. बाबूलाल बताते हैं, लाल झंडे वाली यूनियन में थे. मांगों को लेकर वो लोग अक्सर हड़ताल कर देते, मांगों का पता नहीं. ये जरूर होता कि हड़ताल वाले दिन की मजदूरी कट जाती. ये सब देख वो राष्ट्रीय मजदूर कांग्रेस में चले गए. वहां भी निराशा ही हाथ लगी. थोड़ा संघ की शाखा में जाने का जोर, थोड़ा गोवा मुक्ति आंदोलन के सत्याग्रह में शामिल रहने का अनुभव. नतीज़ा ये रहा कि मजदूरों की बात रखने के लिए भारतीय मजदूर संघ बना और बाबूलाल गौर का नाम संस्थापक सदस्यों में लिखा गया. इस समय साथ ही उनकी पढ़ाई चल रही थी. बीए-एलएलबी हो गए.
इस दौरान ट्रेड यूनियन की गतिविधियों में शामिल रहे. 1956 में पार्षदी लड़े. हार गए. साल 1972 आया. उन्हें जनसंघ की ओर से विधानसभा टिकट मिला. सीट वही, भोपाल की गोविन्दपुरा. आम तौर पर पार्टियों के गढ़ होते हैं, ये सीट जल्द ही बाबूलाल गौर का गढ़ बनने वाली थी. लेकिन राह आसान नहीं थी. बाबूलाल गौर अपना पहला चुनाव हार गए. कोर्ट में पिटीशन डाली. पिटीशन जीती फिर 1974 में उपचुनाव हुए बाबूलाल जीते और पहली बार विधानसभा पहुंचे.
अंक 2. जेपी के आशीर्वाद से ज़िंदगी भर की जीत हाथ लगी
साल 1975 आया. इमरजेंसी वाला साल. उधर जयप्रकाश नारायण का आंदोलन, जिसमें बाबूलाल गौर भी खूब एक्टिव रहे. 27 जून 1975 को विरोध में बैठे. मीसा में गिरफ्तार हुए. जेल में रहे. जेपी की नज़रों में आ चुके थे. उनका फोन आया. कहा, चुनाव लड़ो. गौर ने कहा, लेकिन मैं तो जनसंघ का आदमी हूं. वही तय करेंगे मेरे बारे में. इसके बाद गौर ने कुशाभाऊ ठाकरे से पूछा. ठाकरे ने गेंद लाल कृष्ण आडवाणी के पाले में डाली. आडवाणी ने जयप्रकाश से बात की और नतीज़ा ये रहा कि अगले चुनावों में बाबूलाल जनता पार्टी से चुनाव लड़े और जीते. जेपी भोपाल आये तो गौर के सिर पर हाथ रखा. आशीर्वाद दिया. जिंदगी भर जनप्रतिनिधि बने रहने का. उस बात को 43 साल हो गए, गौर आज तक नहीं हारे.
अंक 3 बुलडोजर मंत्री
बाद के सालों में सरकारें आती-जाती रहीं. बाबूलाल गौर भी मंत्री बने. 90 से 92 तक सुन्दरलाल पटवा की सरकार रही. बाबूलाल गौर को नया नाम दे गई, बुलडोजर मंत्री. वो अतिक्रमण हटाने के मामले में सख्त थे. कई किस्से सुनाए जाते हैं. कैसे गौतम नगर में अतिक्रमणकारियों को हटाने के लिए गौर ने सिर्फ बुलडोजर खड़ा करके इंजन चालू करा दिया और अतिक्रमण अपने-आप गायब हो गया. वीआईपी रोड पर झुग्गियां आड़े आईं तो भी बुलडोजर चलवाया. बुलडोजर चलाने में अधिकारी पीछे हट जाते थे, गौर नहीं. गौर बताते हैं, बुलडोजर रोकने को नोटों से भरे सूटकेस आते थे, लेकिन बुलडोजर रुकते नहीं थे.
एक किस्सा वो खुद सुनाते हैं. बड़े ताल के किनारे झुग्गियां बसी थीं, गटर बन जाने का खतरा था. उसी बीच (अब के) तेलंगाना में हिंसा हो गई. उपद्रव संभालने CRPF के 5000 जवान लखनऊ से विजयवाड़ा जा रहे थे. बीच में ट्रेन बदली और 2 दिन उन्हें भोपाल में रुकना पड़ा. उनके रहने की व्यवस्था भोपाल में ही होनी थी. बाबूलाल गौर ने उन्हें इकबाल मैदान में रोका और बड़े ताल के पास की बस्तियों में फुल ड्रेस में मार्च करा दिया. डर बन गया. अगले दिन से अतिक्रमणकारियों ने हटना शुरू कर दिया. ये बुलडोजर सिर्फ गरीबों की बस्ती पर नहीं चलते थे. 2005 में खुद की पार्टी के नेता ने राजभवन की जमीन कब्जाने के लिए बाउंड्री खड़ी कराई, तो उस पर भी बुलडोजर चल गया.
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अंक 4 उमा उवाच, बाबूलाल को टिकट मत दो
एक वॉरंट और एक राजनीतिक महात्वाकांक्षा ने बाबूलाल को मुख्यमंत्री बना दिया. 74 साल की उम्र में. दरअसल 2003 के एमपी चुनाव में उमा भारती के नेतृत्व में बीजेपी सत्ता में लौटी. उमा मुख्यमंत्री बनीं. फिर एक साल के अंदर ही उनके नाम एक वॉरंट जारी हो गया. हुबली की अदालत से. दस साल पुराने एक राजनीतिक मामले में. बीजेपी ने नैतिकता के आधार पर उनसे इस्तीफा देने को कहा. उमा को भी लगा कि इससे उनका राजनीतिक कद बड़ा हो जाएगा. उन्होंने खड़ाऊं की तरह सत्ता बाबूलाल को सौंपी.
यहां एक जरूरी सवाल का जवाब पा लेते हैं. उमा ने बाबूलाल को क्यों चुना. सबके सामने तो वह वरिष्ठता का तर्क देती रहीं. लेकिन सब जानते थे. बाबूलाल कमजोर हैं. प्रदेश भर में आधार नहीं रखते. उमा के लिए वापसी करना आसान होगा. क्योंकि ये वही बाबूलाल गौर थे, जिन्हें उमा टिकट वितरण की मीटिंग तक में नहीं आने देना चाहती थीं. वो आते तो कहा जाता, इन्हें टिकट ही मत दो. ये सब तब हो रहा था, जब दिग्विजय सिंह की सरकार के समय बाबूलाल गौर नेता प्रतिपक्ष थे. एक बार तो गौर इससे आहत हो मीटिंग से उठकर चले गए. और बाहर स्टूल पर धरना सा देने लगे.
एक बात और कही जाती है. उमा इसलिए भी बाबूलाल गौर को मुख्यमंत्री बनाने को राजी हो गईं क्योंकि वो पिछड़ा वर्ग से आते हैं. जाति से यादव हैं. लेकिन खुद बाबूलाल गौर ने कभी ‘यादव’ सरनेम इस्तेमाल नहीं किया. असली नाम बाबूराम यादव था. स्कूल में पढ़ते थे, वहां दो बाबूराम यादव और थे. एक दिन टीचर बोले जो मेरी बात “गौर” से सुनेगा और सवाल का सही जवाब देगा. उसका नाम बाबूराम गौर कर दिया जाएगा . बाबूराम यादव जवाब दे गए. बाबूराम गौर बन गए. भोपाल वालों ने बाबूराम को बाबूलाल कहना शुरू किया तो नाम ही बाबूलाल गौर रख लिया.
अंक 5 बाबूलाल की दो शपथ
उमा ने कुर्सी छोड़ने के बाद एक भावुकतापूर्ण तमाशा भी किया. बाबूलाल को सीएम पद की शपथ से पहले खुद एक शपथ दिलवाई. हाथ में गंगाजल देकर बाबूलाल. कि उमा जब कहेंगी बाबूलाल गौर को इस्तीफा देना होगा. इसके बाद मध्य प्रदेश के राज्यपाल बलराम जाखड़ ने बाबूलाल गौर को मुख्यमंत्री पद की असली शपथ दिलवाई. तारीख थी 23 अगस्त 2004.
बाबूलाल गौर चतुर-चालाक मुख्यमंत्री साबित हुए. मंत्री रहते हुए उन्होंने अफसरों से काम लेना बखूबी सीखा था. खुद कहते थे, हर अफसर हर काम नहीं कर सकता. अफसरों से भी कहा, हमें आप पर भरोसा है. छोटी-मोटी शिकायतों से घबराइयेगा नहीं, वो सुनी तक न जाएंगी. उमा भारती से उकताई नौकरशाही ने उस दिन वल्लभ भवन में बस घी के दिए ही नहीं जलाए थे. बाकी खुश वो बहुत थे. गौर अफसरशाही के जरिये बढ़िया सरकार चलाना चाहते थे. केंद्र से ज़्यादा से ज़्यादा पैसे लेकर राज्य में लगाना चाहते थे. उद्योगपति आते तो वो खुद उनसे मिलने पहुंच जाते.
लेकिन पर्सनल ग्राउंड पर बाबूलाल गौर के लिए सब कुछ अच्छा नहीं था. 2 बेटियां और एक बेटा था उनका. मुख्यमंत्री बने तीन महीने ही हुए थे कि बेटे पुरुषोत्तम गौर की हार्ट अटैक से मौत हो गई. बेटे की अंत्येष्टि के बाद बाबूलाल घर नहीं लौटे. एक ट्रेन हादसे में मारे गए लोगों के घर ढाढ़स बंधाने चले गए. कुछ दिनों बाद उन्होंने बेटे की पत्नी कृष्णा गौर को पर्यटन निगम का अध्यक्ष बना दिया. पार्टी में ही एक तबके ने इसका विरोध किया. नतीजतन कृष्णा को 13 दिन में पद छोड़ना पड़ा.
अंक 6 सीएम पर आरोप, दूसरी की बीवी को लव यू बोलने का
सियासत है तो संभावनाएं हैं. और मुश्किलें भी. बाबूलाल की मुश्किलें भी शुरू हो चुकी थीं. बीजेपी के मध्य प्रदेश के संगठन महामंत्री कप्तान सिंह सोलंकी सत्ता का समानांतर केंद्र बनते जा रहे थे. विधायकों की सिफारिशें हों या अफसरों की, उनके पास पहुंचने लगी थीं. तभी एक दिन उकताकर गौर को कहना पड़ा-
“कप्तान सिंह सुपर सीएम नहीं हैं.”
मगर ये संकटों की शुरुआत थी. जल्द आई लव यू मामला सामने आ गया. ये क्या था. पंच ज (जल, जंगल, जमीन, जानवार और जन) स्कीम के लिए एक कमेटी बनी थी. उसकी मेंबर थी शगुफ्ता कबीर. शगुफ्ता का अपने पति सलीम से विवाद था. सलीम ने इसमें बाबूलाल को घसीट लिया. एक शपथपत्र में सलीम ने आरोप लगाया-
“बाबूलाल गौर मेरा घर तोड़ रहे हैं. फोन पर मेरी बीवी को ‘आई लव यू’ कहते हैं.”
शगुफ्ता ने इसका जवाब दिया. गौर को पितातुल्य बताए. मगर कुछ रोज बाद उन्होंने रुख बदल लिया. एक दिन वो ये कहते हुए मीडिया के सामने आईं कि बाबूलाल गौर ने मेरा शोषण किया है. मगर ड्रामा अभी खत्म नहीं, बल्कि शुरू हुआ था. जब शगुफ्ता मीडिया से बात कर रही थीं, तभी उनकी बहन समीना प्रकट हुईं. बोलीं, अगर बाबूलाल गौर के बारे में कुछ कहा तो दुपट्टे से फांसी लगा लूंगी. ये नहीं हुआ तो खिड़की से कूदकर जान देने की कोशिश की. वो भी नहीं हुआ तो लौटीं, बहन के कान में कुछ कहा. फिर दोनों बहनें मीडियावालों को पीछे छोड़, इमारत से निकलीं. एक गाड़ी सामने आकर रुकी. दोनों उसमें बैठीं और भाग गईं. इस बीच जाने कहां से भारी पुलिस मौके पर आ गई. मीडिया वाले उनका पीछा नहीं कर सके. और बाबूलाल गौर रिएक्शन लेने के लिए पीछे पीछे चलते मीडिया वालों से बस एक ही वाक्य कहते रहे-
“मुझे फंसाया जा रहा है.”
अंक 6 अटल के भांजे की जासूसी
शगुफ्ता मामला निपटा भी नहीं था कि जासूसी कांड खुल गया. मध्य प्रदेश पुलिस की इंटेलीजेंस यूनिट के कुछ सिपाही अटल बिजारी वाजपेयी के भांजे और गौर सरकार में मंत्री अनूप मिश्रा के घर के बाहर जासूसी करते पकड़ाए गए. अनूप ने सीधे अरुण जेटली को फोन लगाया और सब कह दिया.
बदलाव की बयार अब तेज हो चली थी. उमा भारती तो पहले ही पार्टी से बगावत कर चुकी थीं. ऐसे में अखबारों में अचानक विदिशा के सांसद शिवराज सिंह चौहान का नाम आने लगा. वो विधानसभा जाते तो अखबारों में तस्वीरें छपतीं. ऐसे ही 2005 के अंत में, एक दिन अखबार में बाबूलाल गौर के इस्तीफे की ख़बर भी छपी. बीजेपी के संसदीय बोर्ड ने शिवराज सिंह चौहान को सीएम बनाने का फ़ैसला ले लिया था. मध्यप्रदेश के इतिहास में कम ही हुआ है कि मुख्यमंत्री 5 साल पूरा टिक पाएं. गौर भी उसी का शिकार हुए.
अंक 7 बहू से टिकट का झगड़ा
सीएम पद से हटने के बाद बाबूलाल घर नहीं बैठे. शिवराज सरकार में वो वाणिज्य और उद्योग मंत्री बने. तब से अब तक उनकी जीभ का उद्योग भी जारी रहा. कुछ नमूने आप भी चखिए.
1 एक रूसी नेता की महिला ने मुझे धोती कुर्ता में देखा. फिर पूछा, धोती में जो जिप नहीं होती. आप इसे कैसे पहनते हैं. मैंने जवाब दिया. मुझे पहनना भी आता है और धोती उतारना भी.
2 अगर मैं सरनेम में यादव लगाता तो पार्टी मुझे विधायकी का टिकट भी न देती, मुख्यमंत्री बनाना तो दूर की बात है.
3 चेन्नई में यौन अपराध कम हैं क्योंकि महिलाएं पूरे कपड़े पहनती हैं.
तीन नमूने तो जनरल हुए. अब एक वो सुनिए जिसमें उन्होंने नरेंद्र मोदी की खिल्ली उड़ाई. वह भी शिवराज सरकार में गृह मंत्री रहते हुए. किसी ने गौर से कहा-
‘भोपाल को अब स्मार्ट सिटी बनाया जा रहा है, आप तो पहले ही इसे ग्रीन सिटी बना चुके हैं.’
गौर ने जवाब दिया,
‘दाने नहीं खाने को और चले स्मार्ट सिटी…’ (बनाने को नहीं कहा था, लेकिन सब समझ गए).
मुंहफट बाबूलाल की कांग्रेस में भी खूब पूछ है. एक बार तो कांग्रेस के एक कार्यक्रम में मुख्य अतिथि बन गए. जोश-जोश में कांग्रेस का झंडा भी लहरा दिया. इसी लहर के दीवाने हैं दिग्विजय. कहते हैं, मैं जब सीएम था तो गौर को जन्मदिन पर गुलदस्ता देना चाहता था. उनके घर जाकर. मगर गौर कहते, मत आओ, हमारी पार्टी वाले नाराज हो जाएंगे.
बहरहाल. अब अंतिम वाकया. नाराजगी से ही जुड़ा. जून 2016 में पार्टी ने उन्हें मंत्री पद छोड़ने को कहा. उम्र का हवाला देकर. 86 के हो गए थे गौर तब तक. लेकिन अब आलम ये है कि 88 साल के गौर विधायकी के लिए दावेदारी ठोंक रहे हैं. बयान भी दे रहे हैं. कहते हैं. टिकट का क्या है. वो तो पार्टी घर आकर देगी. मगर घर में कोई और था जो टिकट मांग रहा था. गौर की ही सीट से. गौर की बहू. कृष्णा गौर. जिन्हें इन विधानसभा चुनावों में टिकट मिला और गौर का पॉलिटिकल करियर समाप्त हो गया.
मुख्यमंत्री के अगले दो एपिसोड्स में जानिए सूबे के सबसे ज्यादा समय तक सीएम रहे नेता की कहानी. जिसे जनता मामा कहती है. और जिसका राजनीतिक अभ्युदय अटल के इस्तीफे के चलते हुआ.

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