महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव से पहले मुख्यमंत्री पद के दो दावेदार चुनावी तीर्थयात्रा पर
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महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव से पहले मुख्यमंत्री पद के दो दावेदार चुनावी तीर्थयात्रा पर

By Theprint calender  29-Jul-2019

महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव से पहले मुख्यमंत्री पद के दो दावेदार चुनावी तीर्थयात्रा पर

चुनाव आते ही राजनीतिक दलों के नेताओं की आत्मा मतदाताओं के दर्शन करने के लिए मचलने लगती है. महाराष्ट्र में अक्टूबर में विधानसभा चुनाव हैं. इसलिए महाराष्ट्र के नेताओं का मतदाताओं से मिलने के लिए आकुल व्याकुल होना स्वाभाविक है. लोकसभा चुनाव में सफलता के झंडे गाड़ने के बाद महाराष्ट्र का केसरिया गठबंधन राज्य में भी सफलता के झंडे गाड़ना चाहता है. अभी केसरिया गठबंधन में दो प्रमुख दल हैं और दोनों की नज़र मुख्यमंत्री की कुर्सी पर है. इसलिए दोनों दलों के नेता या तो राज्य की चुनावी यात्रा पर निकल चुके हैं या निकलने वाले हैं. चुनाव से पहले इस बात का भी फैसला होगा कि किसकी चुनावी यात्रा हिट होती है.
केसरिया गठबंधन की पार्टी शिवसेना की तीसरी पीढ़ी के युवराज आदित्य ठाकरे कुछ दिनों पहले ही चुनावी यात्रा पर निकल चुके हैं. उन्हें शिवसेना मुख्यमंत्री पद के दावेदार के तौर पर पेश कर रही है. यह है वंशवाद की ताकत. आदित्य ठाकरे शिवसेना में दाखिल होते ही शिवसेना की युवा शाखा के अध्यक्ष हो गए थे. अब न तो उन्हें मंत्री पद का अनुभव है, न प्रशासन का मगर शिवसेना उन्हें मुख्यमंत्री बनाना चाहती है. इसके लिए शिवसेना की परंपरा भी बदली जा रही है. बाल ठाकरे के ज़माने में शिवसेना दहाड़नेवाला शेर थी, शिवसेना प्रमुख ठाकरे न कभी चुनाव लड़े न मंत्री बने ,उनके जमाने में एक बार शिवसेना भाजपा की सरकार बनी थी. उसमें ठाकरे किंगमेकर की भूमिका निभाते थे. उन्होंने पहले मनोहर जोशी को मुख्यमंत्री बनाया फिर नारायण राणे को. तब भाजपा आज्ञाकारी छोटे भाई की भूमिका निभाती थी. तब एक कार्टून छपा था कि कमरे में दो कुर्सियां हैं, एक पर बाल ठाकरे बैठे हुए है दूसरी पर पैर फैलाएं हुए है. तभी भाजपा नेता प्रमोद महाजन आते हैं. ठाकरे उनसे कहते हैं- बैठों पर दूसरी कुर्सी से पैर नहीं हटाते. वे केसरिया गठबंधन के सर्वोच्च नेता थे. वे शिवसेना ही नहीं भाजपा के नेताओं को हड़काने से बाज नहीं आते.
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उद्धव ठाकरे के जमानें में शिवसेना कागज़ी शेर बन गई. उसे केसरिया गठबंधन में छोटा भाई बनना पड़ रहा है. मुख्यमंत्री बनने का तो सवाल ही नहीं था. मगर मुख्यमंत्री पद की अतीत की स्मृतियों में खोई शिवसेना उद्धव के बेटे आदित्य का नाम मुख्यमंत्री पद के लिए पेश कर रही है. आदित्य ठाकरे अपने भाषणों और इंटरव्यू में कह रहे हैं कि अगला मुख्यमंत्री शिवसेना का होगा. जिसका निहितार्थ यह है कि आदित्य टाकरे यानी वे स्वयं मुख्यमंत्री होंगे. भला उनके रहते शिवसेना में कोई और मुख्यमंत्री बन कैसे सकता है. मगर कुछ राजनीतिक पर्यवेक्षक कह रहे हैं. घर में नहीं दाने बुढ़िया चली भुनाने. शिवसेना के पास इतना संख्याबल नहीं होगा कि वह मुख्यमंत्री पद का दावा ठोक सके. एक ज़माने में शिवसेना सड़क की राजनीति करने वाला संगठन हुआ करती थी. अब वह राजनीतिक सलाहकार प्रशांत किशोर की कंसल्टेंसी से चलनेवाली फर्म है. आदित्य ठाकरे उसके नवीनतम प्रोडक्ट हैं.
हाल ही में शिवसेना ने प्रशांत किशोर की कंसल्टेंसी ली है. उन्होंने ही आदित्य ठाकरे जैसे युवा नेता की को आगे बढ़ाने, मुख्यमंत्री के तौर पर पेश करने का सुझाव दिया है.अब तक प्रशांत किशोर वायएसआर-कांग्रेस के कंस्लटेंट थे. वहां वे सफल रहे है. देखना है वे शिवसेना को कैसे भाजपा से आगे ले जा सकते हैं. पहले शिवसेना शिवाजी की लड़ाकू सेना होती थी. अब वह शिवजी की बारात हो चुकी है. इन दिनों वह ज्यादा से ज्यादा दलबदलुओं को पार्टी में शामिल करने में भाजपा से होड़ कर रही है.
आदित्य के मुकाबले में हैं भाजपा के नेता और महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडनवीस. जब वे मुख्यमंत्री बने थे, तब राजनीतिक पर्यवेक्षक मानते थे कि भाजपा ने अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार ली है. फुले,आंबेडकर और शाहू महाराज के महाराष्ट्र में कांग्रेस ने जो मराठा राजनीति की उसमें 3 प्रतिशत आबादी वाला ब्राह्मण नेता टिक ही नहीं सकता, ऐसा सबका ख्याल था. इसलिए लगता था कि केसरिया गठबंधन का इतिहास दोहराया जाएगा. ठाकरे के समय बनी सरकार में ब्राह्मण मनोहर जोशी चार साल तक मुख्यमंत्री रहे. मगर फिर चुनाव से पहले मराठा नेता नारायण राणे को मुख्यमंत्री बनाना पड़ा. मगर फडनवीस अपने विरोधियों को मात देने में सफल रहे और शिवसेना को भी साथ लाने में भी. लोकसभा के चुनाव में उन्होंने भाजपा को जो सफलता दिलाई वह इस बात की प्रतीक है कि वह बहुत लोकप्रिय जननेता भले ही नहीं हो. मगर सबको साथ लेकर चलने में कामयाब रहे हैं. मराठा आरक्षण के कारण राज्य के सबसे बड़े समुदाय को भाजपा से जोड़ने में कामयाब रहे हैं. यही वह समुदाय था. जो कांग्रेस और राष्ट्रवादी का प्रमुख जनाधार था, घोर ब्राह्मण विरोधी भी. मगर बड़े पैमाने पर भाजपा के साथ है, क्योंकि पहले कांग्रेस नें भी मराठों को आरक्षण दिया था. मगर अदालत में टिक नहीं पाया.
महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री और भाजपा नेता देवेंद्र फडणवीस अगस्त माह के पहले सप्ताह से प्रदेश भर में महा जनादेश यात्रा निकालेंगे. राज्य भाजपा ने यात्रा को झंडी दिखाने और समापन में भाग लेने के लिए पीएम मोदी, अमित शाह समेत राष्ट्रीय नेताओं से अनुरोध किया है. यह यात्रा अमरावती ज़िले के गुरूकुंज मोजारी से शुरू होगी जो कि दो चरणों में समाप्त होगी. इस यात्रा के दौरान मुख्यमंत्री फडणवीस 104 रैलियां, 228 स्वागत सभाओं और 20 संवाददाता सम्मेलनों में हिस्सा लेंगे.
महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव को कुछ ही महीने बाकी हैं ऐसे में यह यात्रा काफी अहम मानी जा रही है. दोनों पार्टी की यात्राओं को महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री की कुर्सी की खींचतान से जोड़कर देखा जा रहा है.
चुनाव के बाद केसरिया गठबंधन का मुख्यमंत्री कौन होगा यह एक रहस्य में लिपटी पहेली बना हुआ है. एक गठबंधन दो पार्टियां, दो मुख्यमंत्री पद के दावेदार यह बात कुछ राजनीतिक पर्यवेक्षकों को हज़म नहीं हो रही. एक तरफ शिवसेना दावा कर रही है मुख्यमंत्री उसका होगा. दूसरी तरफ देवेंद्र फडनवीस ने हाल ही में बयान दिया कि शिवसेना की तरफ से वही मुख्यमंत्री होंगे.
लोकसभा चुनावों के बाद दोनों ही दलों के कुछ नेताओं ने इस विषय पर जब बयानबाज़ी शुरू की तो, उद्धव ठाकरे और देवेन्द्र फडनवीस ने यह हिदायत दी कि वे इस मामले में कुछ नहीं बोलें. बाद में दोनों ही नेताओं के बयान आये कि मुख्यमंत्री पद को लेकर ‘हमारे बीच सब तय हो चुका है’ और समय आने पर उसकी घोषणा कर दी जायेगी.
राजनीति के कुछ जानकार इसे शिवसेना के एक दांव के रूप में भी देखते हैं. उनका मानना है कि शिवसेना का मुख्यमंत्री बनाने का कार्ड खेल कर पार्टी हाईकमान शिव सैनिकों को ज़्यादा से ज़्यादा सीटें जिताने के लिए प्रेरित कर रहा है. क्योंकि आज विधानसभा में शिवसेना और बीजेपी के विधायकों की संख्या में बड़ा अंतर है और पार्टी की पहली प्राथमिकता इस अंतर को ख़त्म करने की ही है. इतिहास बताता है कि यह अंतर खत्म नहीं हो सकता और ज्यादा सीटे पाने के बाद भाजपा शिवसेना के लिए मुख्यमंत्री पद छोड़ने से रही.
मतदाताओं से संवाद साधने के लिए चुनावी यात्राएं करना नया राजनीतिक फैशन है. मगर इसके परिणाम मिले जुले रहे हैं. खासकर भाजपा के मुख्यमंत्रियों के लिए परिणाम अच्छे नहीं रहे. पिछले वर्ष हुए विधानसभा चुनावों से पहले भाजपा के तीन मुख्यमंत्रियों- मध्यप्रदेश के शिवराज सिंह चौहान, राजस्थान की वसुंधरा राजे और छत्तीसगढ़ के रमन सिंह ने राज्यभर में चुनावी यात्राएं कीं थीं और तीनों ही हार गए. मगर आंध्रप्रदेश के वायएसआर कांग्रेस के नेता मौजूदा मुख्यमंत्री ने चुनावी यात्रा की और वे चंद्रबाबू नायडू का तख्ता उलटकर सत्ता हासिल करनें में कामयाब रहे. मतदाताओं के उन्हें छप्पर फाड़कर सीटें दी. महाराष्ट्र में तो केसरिया गठबंधन के दो-दो नेता यात्रा करेंगे जिससे से संभ्रम ही फैलेगा. मगर भाजपा अपनी जीत को लेकर कुछ ज्यादा ही आश्वस्त है. आखिर मोदी है तो कुछ भी मुमकिन है.

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