क्या कांग्रेस के लिए वरदान साबित होगा राहुल गांधी का इस्तीफ़ा?
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क्या कांग्रेस के लिए वरदान साबित होगा राहुल गांधी का इस्तीफ़ा?

By Wirehindi calender  19-Jul-2019

क्या कांग्रेस के लिए वरदान साबित होगा राहुल गांधी का इस्तीफ़ा?

 ‘हम ही नहीं, उत्तर प्रदेश का हर एक कार्यकर्ता चाहता है कि राहुल गांधी कांग्रेस अध्यक्ष बने रहें, क्योंकि एक वही हैं जो इस माहौल में पार्टी को संभाल सकते हैं और देश को भाजपा के चंगुल से आजाद करा सकते हैं. कमी हर किसी में होती है लेकिन अगर वह अपना मन बना चुके हैं तो कांग्रेस कार्य समिति जो फैसला लेगी, वह हमें मंजूर होगा.’
उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले के कांग्रेस जिलाध्यक्ष वीरेंद्र प्रताप पांडेय ने राहुल गांधी के इस्तीफे को लेकर चल रही चर्चा के बीच यह बात कही. पांडेय पिछले तीन दशक से राजनीति और कांग्रेस दोनों से जुड़े हैं और पिछले छह साल से कांग्रेस जिलाध्यक्ष की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं.
उनके नाना कमलापति त्रिपाठी कांग्रेस सरकार में केंद्रीय मंत्री रहे थे जबकि उनके पिता सुरेंद्र प्रताप नारायण पांडेय उर्फ कोट साहब हरैया से तीन बार कांग्रेस विधायक रहे थे. वीरेंद्र प्रताप पांडेय आगे कहते हैं, ‘जो भी नया अध्यक्ष बने वह युवा हो और साथ में उसके पास पार्टी चलाने और संगठन में काम करने का भी अनुभव हो. सरकार चलाने और संगठन चलाने में अंतर होता है. सरकार चलाने के लिए आपको पूरी मशीनरी मिलती है लेकिन संगठन चलाने के लिए आपको एक मशीनरी तैयार करनी पड़ती है.’
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23 मई को आए लोकसभा चुनाव 2019 के नतीजों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा ने 2014 से भी अधिक सीटें हासिल की और इसके साथ ही कांग्रेस अध्यक्ष बनने के बाद राहुल गांधी को एक बड़ी हार का सामना करना पड़ा था.
देश की 134 साल पुरानी कांग्रेस पार्टी को लगातार दूसरे आम चुनाव में 10 फीसदी से भी कम सीट मिलीं. 2014 में पार्टी 44 सीटों पर सिमट गई थी, जबकि 2019 में 52 सीटों से ही संतोष करना पड़ा. चुनाव के नतीजों के बाद 25 मई को हुई कांग्रेस कार्य समिति की बैठक में हार की जिम्मेदारी लेते हुए राहुल गांधी ने इस्तीफे की पेशकश कर दी, जिसे कांग्रेस कार्य समिति ने सिरे से खारिज कर दिया.
उस समय ऐसा कहा गया कि राहुल गांधी ने यह फैसला महज खानापूर्ति के लिए लिया है और जल्द ही वे इसे वापस ले लेंगे. हालांकि ऐसा होते हुए नहीं दिखा. एक तरफ जहां राहुल गांधी अपने इस्तीफे के फैसले पर अडिग रहे, वहीं कांग्रेस आगे बढ़ने के बजाय राहुल की तरफ टकटकी लगाए देखती रही.
नतीजा यह हुआ कि इस्तीफे पर एक महीने बाद भी कोई फैसला न होते देख 3 जुलाई को राहुल ने न सिर्फ इस्तीफा वापस न लेने की बात सार्वजनिक तौर पर साफ कर दी बल्कि अगला अध्यक्ष चुनने में हो रही देरी पर नाराजगी भी जाहिर की.
नया अध्यक्ष चुनने में हो रही देरी से पार्टी के वरिष्ठ नेता भी अपनी नाराजगी जाहिर कर रहे हैं. कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री कर्ण सिंह ने बीते हफ्ते कहा कि जल्द से जल्द कांग्रेस कार्य समिति (सीडब्ल्यूसी) की बैठक बुलाकर निर्णय किए जाएं. उन्होंने कहा कि 25 मई को गांधी के इस्तीफे की पेशकश करने के बाद पार्टी में जो असमंजस की स्थिति पैदा हुई उससे वह परेशान हैं
वहीं, पार्टी के वरिष्ठ नेता जनार्दन द्विवेदी ने कहा कि गांधी को पद छोड़ने से पहले नए अध्यक्ष को लेकर कोई व्यवस्था बनानी चाहिए थी. नए अध्यक्ष के चुनाव में हो रही देरी पर स्थानीय स्तर के कांग्रेस नेताओं में भी आक्रोश है.  80 के दशक से पार्टी से जुड़े हुए बदायूं कांग्रेस जिलाध्यक्ष साजिद अली कहते हैं, ‘हम बस इतना चाहते हैं कि जो भी फैसला करना है वह जल्दी किया जाए. यह देरी पार्टी के लिए अच्छी बात नहीं है.’
राहुल गांधी के इस्तीफे को लेकर जितनी तरह की आवाजें कांग्रेस पार्टी के अंदर से आ रही हैं, राजनीतिक विश्लेषक भी उसे उतने ही अलग-अलग तरीके से देख रहे हैं. राहुल गांधी के इस्तीफे पर वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक राशिद किदवई कहते हैं, ‘सैद्धांतिक रूप से एक हारा हुआ नेता जिम्मेदारी लेता है तो यह स्वागतयोग्य है.’
वे कहते हैं, ‘व्यावहारिक रूप से बात करें तो मोदी जी ने जो नामदार और कामदार का नारा दिया, युवाओं ने उस पर विश्वास किया. कांग्रेस ने जो मुद्दे उठाए वे सभी मौजूदा परिस्थितियों को सामने रख रहे थे लेकिन लोगों ने उस पर ध्यान इसलिए नहीं दिया क्योंकि उसे राहुल गांधी कह रहे थे.’
किदवई की बात से सहमति जताते हुए वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक नीरजा चौधरी सैद्धांतिक रूप से दिए गए राहुल गांधी के इस्तीफे को अच्छी परंपरा के तौर पर देखती हैं. वहीं, कांग्रेस पार्टी के रवैये पर नाराजगी जाहिर करते हुए कहती हैं, ‘लेकिन उसके बाद कांग्रेस ने जो किया है उससे राहुल गांधी के इस्तीफे से जो फायदा हो सकता था वह सब बर्बाद हो गया है.’

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