इस बयान से यह साफ होता है कि कर्नाटका में राज्य भाषा कन्नड़ को सम्मान मिलने की उम्मीद है, और यह भी दर्शाता है कि हिंदी को दूसरी क्षेत्रीय भाषाओं की कीमत पर नहीं थोपना चाहिए।
इस बीच, मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने भी इस मुद्दे पर अपनी प्रतिक्रिया दी है और कहा है कि हिंदी भाषा को थोपे जाने के खिलाफ अपनी आवाज को और तेज किया जाना चाहिए। उनके अनुसार, कर्नाटका में त्रिभाषा नीति लागू करने की कोशिश के बावजूद, राज्य की भाषा कन्नड़ की अहमियत को बनाए रखना जरूरी है। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने इस विवाद को और बढ़ाते हुए नया सवाल उठाया है। उन्होंने यह पूछा कि हिंदी के अलावा अन्य भाषाओं के लिए कोई विशेष दिवस क्यों नहीं मनाया जाता? स्टालिन ने अपने सवाल में यह भी कहा कि हिंदी दिवस के अलावा संविधान की 8वीं अनुसूची में शामिल अन्य 21 भाषाओं के लिए कोई विशेष दिवस क्यों नहीं तय किया गया है। उन्होंने डीएमके कार्यकर्ताओं को एक पत्र भी लिखा, जिसमें उन्होंने कहा, "हम हमेशा हिंदी थोपने का विरोध करेंगे।" उन्होंने पत्र में यह सवाल भी उठाया कि क्या हिंदी के अलावा अन्य भारतीय भाषाओं के लिए कोई सेलिब्रेशन डे है, और अगर नहीं, तो हिंदी के अलावा अन्य भाषाओं के साथ इस प्रकार का भेदभाव क्यों किया जा रहा है?
एमके स्टालिन ने यह भी कहा कि अगर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अन्य भाजपा नेताओं के दिलों में तमिल भाषा के लिए जगह है, तो फिर उसे देश की आधिकारिक भाषा क्यों नहीं घोषित किया जाता? उन्होंने यह आरोप भी लगाया कि सरकार की नीतियां क्षेत्रीय भाषाओं की अनदेखी कर रही हैं, जबकि तमिल को और अन्य क्षेत्रीय भाषाओं को समान दर्जा देने की आवश्यकता है। एमके स्टालिन ने इस मुद्दे को और गंभीरता से उठाते हुए एक तीखा बयान दिया और यूएसएसआर (सोवियत संघ) के विखंडन का उदाहरण दिया। उन्होंने कहा कि सोवियत संघ का विखंडन केवल राजनीतिक कारणों से नहीं हुआ था, बल्कि इसका एक बड़ा कारण यह भी था कि रूसी भाषा को पूरे देश पर थोपने की कोशिश की जा रही थी, और अन्य क्षेत्रीय भाषाओं को नजरअंदाज किया गया था। इसके कारण, जब सोवियत संघ टूट गया, तो वहां के कई देशों में रूसी बोलने वाले अल्पसंख्यक हो गए। आज वही रूसी बोलने वाले लोग लातविया जैसे देशों में अपनी भाषा को आधिकारिक दर्जा देने की मांग कर रहे हैं, और यही एक बड़ा मुद्दा बन चुका है।
एमके स्टालिन ने कहा कि इतिहास में ऐसे कई उदाहरण हैं जब भाषाई दबाव के कारण देशों में असंतोष उत्पन्न हुआ और अंततः यह देशों के विखंडन का कारण बना। उन्होंने यह भी चेतावनी दी कि अगर हिंदी को इस तरह से थोपने की कोशिश की जाती रही, तो भारत में भी ऐसी ही स्थिति उत्पन्न हो सकती है, जिससे देश को गंभीर परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं।
इसके अलावा, नई शिक्षा नीति में त्रिभाषा फॉर्मूले की चर्चा की गई थी, जिसके तहत बच्चों को तीन भाषाएं सीखने का प्रस्ताव दिया गया है, और इसका विरोध सबसे पहले तमिलनाडु से शुरू हुआ था। अब कर्नाटक ने भी इस पर विरोध जताया है, और माना जा रहा है कि इस विवाद में अन्य दक्षिणी राज्यों जैसे तेलंगाना, आंध्र प्रदेश और केरल भी शामिल हो सकते हैं। इन राज्यों में भी इस मुद्दे पर चर्चा होने की संभावना है, जो कि भारतीय भाषाओं और क्षेत्रीय भाषाओं के सम्मान और संरक्षण से जुड़ा हुआ है।
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