कोर्ट का कड़ा रुख
मद्रास हाई कोर्ट ने बुधवार को थलपति विजय की याचिका पर सुनवाई करते हुए तमिलनाडु पुलिस पर कड़ी टिप्पणी की। न्यायमूर्ति वी. लक्ष्मीनारायण ने पूछा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) को जम्मू-कश्मीर जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में रैलियों की अनुमति दी जाती है, तो फिर शांतिपूर्ण तमिलनाडु में उन्हें ऐसा करने से क्यों रोका जा रहा है। यह सवाल आरएसएस के प्रदेश सचिव जगदीसन की याचिका पर सुनवाई के दौरान उठाया गया।
जगदीसन ने अदालत में यह याचिका दायर की थी कि पुलिस को निर्देश दिया जाए कि वह 18, 25 अक्टूबर या 1 नवंबर को रैलियों का आयोजन करने की अनुमति दें। उन्होंने बताया कि इस संबंध में पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) को आवेदन दिया गया था, लेकिन कोई जवाब नहीं मिला। ऐसे में उन्होंने उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया।
विधिक तर्क और पुलिस का पक्ष
याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता एनएल राजा ने कोर्ट में दलील दी कि उच्च न्यायालय ने हर साल आरएसएस रैलियों की अनुमति का आदेश दिया था, जिसे उच्चतम न्यायालय ने भी स्वीकार किया था। इसके बावजूद, उन्होंने कहा, पुलिस द्वारा अनुमति देने से लगातार इनकार किया जा रहा है।
पुलिस की ओर से महाधिवक्ता विजय नारायण ने कहा कि रैलियों के लिए आवेदन कम से कम 21 दिन पहले दिया जाना चाहिए, जबकि इस मामले में यह अनुरोध केवल 3 अक्टूबर को किया गया था। उन्होंने यह भी दावा किया कि प्रस्तावित मार्ग ऐसे क्षेत्रों में स्थित हैं, जहां अनुमति नहीं दी जा सकती और त्योहारों के मौसम में रैलियां आयोजित करने से जनता को असुविधा हो सकती है।
न्यायालय के सवाल और आगे की प्रक्रिया
न्यायमूर्ति लक्ष्मीनारायण ने पुलिस की दलीलों का जवाब देते हुए कहा कि पिछले न्यायालयीन निर्देशों के बावजूद रैलियों की अनुमति क्यों नहीं दी जा रही है। उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि चाहे सत्ता में कोई भी पार्टी हो, आरएसएस की रैलियों पर पाबंदियां लगती रही हैं।
उन्होंने यह प्रश्न भी उठाया कि आतंकवाद प्रभावित जम्मू-कश्मीर में आरएसएस को रैलियों की अनुमति दी जाती है, जबकि तमिलनाडु में ऐसा करने से इनकार किया जा रहा है। न्यायाधीश ने याचिकाकर्ता और उनके अधिवक्ता को सरकारी मुख्य आपराधिक वकील आर जॉन सत्यन से इस मामले पर चर्चा करने का निर्देश दिया और मामले की अगली सुनवाई गुरुवार के लिए स्थगित कर दी।





