कांग्रेस नेता ने आरोप लगाया कि सरकार ने संघर्ष विराम पर सहमति देकर 1972 के शिमला समझौते की आत्मा को कमजोर किया है। उन्होंने कहा, “शिमला समझौते के तहत भारत और पाकिस्तान ने यह तय किया था कि वे आपसी विवाद केवल द्विपक्षीय बातचीत से सुलझाएंगे। लेकिन अब तीसरे पक्ष को बीच में लाकर सरकार ने उस समझौते को दरकिनार कर दिया है।” कर्रा ने केंद्र सरकार की कथनी और करनी पर सवाल उठाते हुए कहा, “आप पिछले 10 वर्षों से पीओके को वापस लेने की बात करते रहे हैं, लेकिन जब कार्रवाई का मौका आया तो आप पीछे हट गए। देश जानना चाहता है कि आपने पीओके पर हमला क्यों नहीं किया।”
उन्होंने 22 अप्रैल को हुए पहलगाम आतंकी हमले को भी सरकार की खुफिया विफलता बताया, जिसमें 25 पर्यटकों और एक स्थानीय नागरिक की जान गई थी। कर्रा ने दावा किया कि सरकार को पहले से इनपुट था कि आतंकी घाटी में बड़ी वारदात को अंजाम दे सकते हैं, बावजूद इसके सुरक्षा व्यवस्था नाकाफी रही।
उन्होंने सवाल किया कि क्या बैसरन जैसे संवेदनशील क्षेत्र में सुरक्षा बलों की तैनाती न करना सरकार की लापरवाही नहीं थी? और क्या हमले की चूक के लिए किसी को जिम्मेदार ठहराया गया? कांग्रेस नेता ने केंद्र पर ‘ऑपरेशन सिंदूर’ का राजनीतिकरण करने का आरोप भी लगाया। उन्होंने कहा, “सरकार इस सैन्य कार्रवाई का उपयोग राजनीतिक लाभ के लिए कर रही है, जो हमारे सैनिकों की बहादुरी और बलिदान का अपमान है।”





