पैसा बनाने का अड्डा बने हुए हैं निजी स्वास्थ्य संस्थान
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पैसा बनाने का अड्डा बने हुए हैं निजी स्वास्थ्य संस्थान

Author: Neeraj Jha   17 Jul 2018

पैसा बनाने का अड्डा बने हुए हैं निजी स्वास्थ्य संस्थान

दिल्ली का मैक्स हॉस्पिटल हो, गुड़गांव का फोर्टिस अस्पताल या फिर मेदांता - अस्पतालों के नाम पर यह सब संस्थान रुपया बनाने की मशीन बने हुए हैं। साल के फरवरी माह में ब्रेन ट्यूमर के एक मामले में गुड़गांव के पारस अस्पताल में एक मरीज को 4 लाख रुपए का अनुमान दिया। 15 दिनों तक अस्पताल में रहने के बावजूद अपनी स्थिति में मरीज को कोई सुधार नहीं दिखा तो उसने अस्पताल को छोड़ने का निर्णय लिया। लेकिन उस वक्त उसके हाथों में लगभग 9 करोड़ रुपए का बिल थमा दिया गया। फोर्टिस अस्पताल में मेडिकल नेग्लिजेंस के कारण डेंगू की चपेट में आए एक बच्चे की मौत हो गई और उसके परिजनों को दिया गया 18 लाख रूपए का बिल। इसी तरह मेदांता अस्पताल में 8 साल के बच्चे के डेंगू के इलाज के लिए आए परिजनों को बच्चे की मौत के बाद 16 लाख रूपए का बिल दिया गया। डॉक्टर होना दुनिया का सबसे प्रतिष्ठित पेशा माना जाता है। कहने वाले डॉक्टरों को भगवान का रूप कहते हैं। लेकिन बाजारवाद के राक्षस ने डॉक्टर रूपी भगवान को शैतान में तब्दील कर दिया। एक नेक और जनहित के कार्य को वाणिज्यक प्रगति और निजीकरण के दौर में लूट-खसोट का धंधा बना लिया गया है। अस्पताल अब जान बचाने के केंद्र से ज्यादा पैसा बनाने का अड्डा बन गया है। आप का इलाज आप के आर्थिक ताकत को देखते हुए किया जाता है। पैसे फेंकते जाइए और अपने पीछे डॉक्टर तथा उनके सहयोगी कर्मियों का कदमताल देखते जाइए। अगर पैसे नहीं तो सहूलियतों को तो छोड़ें, अच्छे इलाज और अच्छी देखभाल के लिए भी आप को तरसा दिया जाएगा। बीते दिनों गुरुग्राम के नामी गिरामी बड़े निजी अस्पताल जिन कारणों से चर्चा में आए वह शर्मनाक है। अस्पताल प्रशासन मरीज को बचा नहीं पाता और फिर मरीज के घरवालों के सामने लाखों का बिल रख देता है। जिसे चुकाए बिना परिजनों को शव तक नहीं सौंपा जाता है। कोई भी सरकार अस्पतालों की गुंडई को रोकने का काम नहीं कर रही। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने मैक्स हॉस्पिटल का लाइसेंस रद्द कर के निजी स्वास्थ्य संगठनों के खिलाफ साहस तो दिखाया था, लेकिन उप राज्यपाल ने लाइसेंस बहाल कर के सरकार के उस कदम को पीछे खींच दिया। देशभर में कोई और सरकार इस तरह का साहस नहीं दिखा पाई है। अगर दिखाती भी है तो फिर मामला हल नहीं हो पाता है। कर्नाटक सरकार निजी संस्थानों के रेगुलेशन के लिए एक बिल लेकर आई लेकिन डॉक्टर्स के भारी विरोध के कारण बिल को वापस लेना पड़ा। गुड़गांव में हुए मामलों के कारण प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री ने कुछ कड़े कदम जरूर उठाएं हैं लेकिन यह कितने फलीभूत हो पाते हैं यह देखना बाकी है। अब सवाल यह उठता है कि कुकुरमुत्ते की तरह उगते हुए इन निजी स्वास्थ्य संस्थानों के रेग्युलेशन की जिम्मेदारी किसकी है? क्या लोगों के जान की क़ीमत भी उनके आर्थिक योग्यता के आधार पर होगी? क्या सरकारी तंत्र लूट खसोट के इस गोरखधंधे में पूरी तरीके से शामिल है? इन सवालों का जवाब ढूंढना ही पड़ेगा और इन सवालों के खिलाफ लोगों को एक होकर लड़ना पड़ेगा।

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