बंसी लाल के बाद हरियाणा में इस नेता ने दिखाई हिम्मत!
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बंसी लाल के बाद हरियाणा में इस नेता ने दिखाई हिम्मत!

Author: Neeraj Jha calender  09 Jul 2019

बंसी लाल के बाद हरियाणा में इस नेता ने दिखाई हिम्मत!

राजनीति और शराब - इनका संबंध बड़ा घनिष्ठ है। आज के माहौल में बिना शराब के सत्ता तक पहुँचना मुश्किल जान पड़ता है। लेकिन हरियाणा की एक राजनैतिक पार्टी शराब का विरोध करके, ठेकों के खिलाफ आंदोलन करके इस रास्ते को तय करना चाहता है। वह पार्टी है स्वराज इंडिया के।

 

ये जानते हुए कि अल्कॉहल से मिलने वाले राजस्व के मामले में हरियाणा पूरे देश में दूसरे नंबर पर है, योगेंद्र यादव की स्वराज इंडिया की यह पहल साहसी है। एक ऐसे दौर में जब लोकसभा चुनावों में लगभग 294 करोड़ रुपयों की 184.34 लाख लीटर शराब सीज़ की गई, स्वराज इंडिया का ये कदम स्वागत योग्य है। 

 

हरियाणा में शराब के विरोध की कहानी नई नहीं है। पूर्व मुख्यमंत्री बंसी लाल ने शराबबंदी की शुरुआत की थी। उन दिनों पूरा हरियाणा शराब की गिरफ्त में था। पुरुष घरों में शराब की जमाखोरी करने लगे थे। महिलाएँ परेशान थी। उन्होंने आंदोलन किया।बंसी लाल ने शराबबंदी को घोषणापत्र में शामिल किया। महिलाओं के काफी वोट उन्हें हासिल हुए।

 

लेकिन इसके बाद की कहानी दिलचस्प है। जिन महिलाओं ने शराबबंदी के लिए बंसी लाल को प्रेरित किया उन्हीं की नाराज़गी के कारण बंसीलाल को फैसला वापिस लेना पड़ा। हुआ यूँ कि शराब बंदी के बाद हरियाणा की। सीमा से लगे पंजाब, हिमाचल प्रदेश, उत्तर प्रदेश, दिल्ली, चंडीगढ़, उत्तराखण्ड तथा राजस्थान से शराब की तस्करी धड़ल्ले से शुरू हो गई। सीमाओं पर ठेके खुल गए। 

 

हरियाणा के जो मर्द पहले शराब पीकर या उसके साथ घर पहुँचते थे, अब वो दूसरे राज्य की सीमाओं में जाने लगे। सुबह दफ्तर, रात को दूसरे राज्य की सीमा और फिर दफ्तर। इस स्थिति ने महिलाओं को और अधिक नाराज़ किया। हुआ ये कि उन्हीं महिलाओं ने बंसी लाल को अगले चुनावों में सत्ता से बाहर का रास्ता दिखाया। 

 

इसके बाद से हरियाणा में शराबबंदी को लेकर कुछ हुआ नहीं। अब स्वराज इंडिया के योगेंद्र यादव ठेकेबंदी की मुहिम के साथ आगे बढ़ रहे हैं। लगभग हर गाँव, हर जिले में ठेकाबंदी के लिए आंदोलन कर रहे हैं। स्वराज इंडिया सीधे तौर पर कह रही है - अगर महिलाओं को गवारा नहीं, तो ठेके वहीं खुलेंगे।

 

चुनावों में इस कदम का फ़ायदा होगा या नहीं, ये निश्चित तौर पर नहीं कहा जा सकता, लेकिन एक बात तय है कि इस तरह की राजनीति हमारे लोकतंत्र औऱ समाज के लिए ज़रूरी है।

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