चौकीदारों के रहते नौकरियों की डकैती कैसे हो गई?
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चौकीदारों के रहते नौकरियों की डकैती कैसे हो गई?

Author: Neeraj Jha calender  22 Mar 2019

चौकीदारों के रहते नौकरियों की डकैती कैसे हो गई?

“प्रधानमंत्री ने अपने नाम के आगे चौकीदार लगाया तो खुशी हुई।” - एक चौकीदार ने जब यह बात कही तो #मैं_भी_चौकीदार_कैंपेन का मकसद समझ में आने लगा। लेकिन जैसे ही उसने कहा कि “साहब बेरोज़गार हूँ इसलिए चौकीदार हूँ” तब इस कैंपेन की हकीकत सामने आ गयी।

चुनाव जीतने के लिए मुद्दों पर पकड़ नहीं बल्कि जज़्बातों पर कब्ज़ा चाहिए होता है। बीजेपी इस बात को लगातार इंप्लीमेंट कर रही है। मुद्दे पीछे छूट रहे हैं।  -
अलबत्ता इस बात को लगभग दबा दिया गया कि फरवरी 2019 में बेरोज़गारी दर 29 माहों के अपने सर्वाधिक पर रहा।
इस बात को आगे नहीं आने दिया गया कि नौकरी मांग रही भीड़ ने एक व्यक्ति को जला दिया
इस बात पर चर्चाएँ समाप्त कर दी गयी कि बी टेक, एम टेक और अन्य उच्च डिग्रियाँ हासिल किए हुए युवा फोर्थ ग्रेड की जॉब के लिए आवेदन कर रहा है
पीएम के रूप में मोदी के पहले स्वतंत्रता दिवस स्पीच को भुला दिया गया जिसमें उन्होंने कहा आओ, भारत में इलेक्ट्रिकल से लेकर इलेक्ट्रॉनिक्स तक का निर्माण करो।

चौकीदार होने का ढ़िंढ़ोरा पीट रहे लोगों की मौजूदगी में ही नीरव से लेकर माल्या तक देश से भागे। इन्ही की मौजूदगी में सीमा पार के साथ झड़पों में सर कटते रहे। इन्ही की मौजूदगी में मीडिया ध्वस्त होता रहा। लोकतांत्रिक और संवैधानिक संस्थाएँ तड़पती रही। हिंदुओँ और मुस्लिमों के बीच की खाई बढ़ती रही। देश जाति के नाम पर लड़ता रहा।

इन्हीं चौकीदारों की मौजूदगी में कभी राफेल की फाईल चोरी हो गई तो कभी मिल गई। चौकीदार होना आसान नहीं है। चौकीदार उस ताकत का नाम है, जो रात के घुप्प अँधेरों में भी अड़ा रहता है मुस्तैदी के साथ। लड़ता रहता है दुश्मनों से। अगर खुद नहीं लड़ पाया या कमज़ोर पड़ गया तो अगले ही दिन ज़िम्मेदार लोगों को इस बारे में बताता है। ताकि दुश्मन को सबक सिखाया जा सके।

लेकिन ये नए ज़माने के चौकीदार जागते हुए भी सोते रहते हैं। जिस संविधान के किताब की कसम खाते हैं उसे ही नाक के नीचे जला दिया जाता है, लेकिन ये चौकीदार चुप रहते हैं। जिस बापू के सिद्धांतों की पर चलने का दंभ भरते हैं, उस बापू की तस्वीर पर गोलियाँ तन दी जाती हैं, पर चौकीदार मौन रहता है। चौकीदारी जिसने सौंपी, जब वही सवाल करे तब भी नए चौकीदार देश के पहले प्रधानमंत्री को आगे कर देते हैं।

बीजेपी के वरिष्ठ नेताओं और लाखों लोगों ने अपने नाम के आगे चौकीदार लिखा। लेकिन स्वघोषित चौकीदारों के पास बताने को यह जवाब नहीं कि आपकी मौजूदगी में रोज़गारों की डकैती कैसे हो गई? नकल के ज़रिए परीक्षाओं के सवाल कैसे चोरी होने लग गए? SSC जैसी परीक्षाओं को पास कर के नौकरी का सपना पालने वाले युवाओं का सपना कैसे छीन लिया गया?

जिस चौकीदार का ज़िक्र शुरू में किया उसने कहा था कि मेरा काम कुछ गलत हो रहा हो तो उसकी रिपोर्ट देना है। सो जाना चौकीदारी नहीं होता। यहाँ जो भी कुछ गलत होगा उसका मैं ही ज़िम्मेदार हूँ। हमें नहीं लगता कि नरेंद्र मोदी ने कभी भी इस तरह से सोचा होगा। चौकीदारी करने से न कि चौकीदार कहलान से चोरियाँ रुकती हैं पीएम जी।

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