रमज़ान में चुनाव, क्या होगा असर?
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रमज़ान में चुनाव, क्या होगा असर?

Author: Neeraj Jha   11 Mar 2019

रमज़ान में चुनाव, क्या होगा असर?

लोकसभा चुनाव - 2019 - चुनावों की तारीखें आ गई। और साथ ले आई विवाद और कुछ अहम सवाल। क्या चुनाव आयोग ने मुस्लिम वोटर्स को एक्सक्लूड करने की कोशिश की है? क्या चुनाव आयोग पीएमओ से संचालित होता है? क्या पीएम के दिशानिर्देशों पर चुनाव की तारीखें घोषित की गई है? ये वे सवाल हैं जो विपक्ष में मौजूद तमाम नेता पूछ रहे हैं। 

सात फेज़ में होने वाले चुनाव शुरू होंगे 11 अप्रैल को और समाप्त होंगे 15 मई को। रमज़ान शुरू हो रहा है 6 मई को और खत्म हो रहा है 3 जून को। बिहार, झारखंड, मध्य प्रदेश, राजस्थान, उप्र, प. बंगाल, जम्मु और कश्मीर, दिल्ली, हरियाणा, हिमाचल, चंडीगढ़, और पंजाब में रमज़ान शुरू होने के बाद वोटिंग है। बिहार, झारखंड, मप्र, उप्र और प. बंगाल में रमज़ान के दौरान तीन फेज़ की वोटिंग होनी है। 

जम्मु कश्मीर सर्वाधिक मुस्लिम जनसंख्या वाला राज्य है। पश्चिम बंगाल 27 प्रतिशत मुस्लिम जनसंख्या, उत्तर प्रदेश 19 फीसदी से ज्यादा, बिहार में 17 फीसदी, झारखंड में साढ़े 14 फीसदी मुस्लिम जनसं है। ये वो राज्य हैं जहाँ मुस्लिम वोट्स सत्ता निर्धारण में महत्वपूर्ण भूमिका रखते हैं।

इन राज्यों में टीएमसी, राजद, कांग्रेस, सपा-बसपा आदि मुस्लिम वोटों की पहली पसंद है। मुस्लिमों की कम वोटिंग का सीधा मतलब है - विपक्षी पार्टियों को नुकसान और बीजेपी को फ़ायदा।

रमज़ान के दौरान मुस्लिम समुदाय के वोटिंग की संख्या कम होगी - इसमें भी कोई दोराय नहीं। यही कारण है कि आप नेता अमानतुल्लाह समेत टीएमसी नेता ने इसका विरोध किया है। आप नेता संजय सिंह ने कहा कि चुनाव आयोग ने पीएमओ के इशारे पर काम किया है।

इसके अलावा जो बड़ा आरोप लग रहा है वो है चुनावों को बेवजह खींचे जाने का। उड़ीसा, महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश में चार फेज़ के चुनाव, पश्चिम बंगाल में 7 फेज़ में चुनाव भी सवालों को जन्म दे रहे हैं। पूर्व शेफोलॉजिस्ट और स्वराज इंडिया के अध्यक्ष योगेंद्र यादव ने ये सवाल उठाए हैं।

चुनाव विश्लेषकों का मानना है कि बूथ स्तर तक पकड़ को मजबूत करने के लिए और बेहतर चुनावी प्रबंधन के लिए चुनावों को लंबा खींचा गया है। आगामी चुनाव देश के अब तक के सबसे अहम चुनावों में से एक है। विपक्ष इसे संविधान और लोकतंत्र की रक्षा के लिए लड़ाई बता रही है। कांग्रेस कह रही है कि एक और स्वतंत्रता की लड़ाई है। स्वतंत्रता फ़ासीवादी ताकत से। विपक्ष को तमाम चिंताएँ दिख रही हैं कि कि रमज़ान के दौरान चुनाव होने से उन्हें नुकसान होगा। आँकड़ों की और वोटिंग पैटर्न की मानें तो ये डर जायज़ भी है।

भारतीय जनता पार्टी भी इन चुनावों को काफी गंभीरता से ले रही है। जिस तरह से देश बेरोज़गारी के सवालों से अलग होता दिख रहा है और राष्ट्रवाद चर्चा का ज्यादा बड़ा विषय बन गया है - वह बीजेपी के लिए फ़ायदेमंद है। नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता और लोगों के बीच उनका अपील भी बीजेपी के पक्ष में है। और इन सबसे ज्यादा ताकतवर पक्ष है मीडिय पर बीजेपी की पकड़, मजबूत और विशाल कैडर और अनुपम चुनाव प्रबंधन कला। 

लेकिन लोकतंत्र के लिए किसी भी पर्व से बड़ा पर्व है चुनाव। सभी लोग अपने अपने त्योहार अपनी मर्ज़ी से मनाएँ - इसके लिए ज़रूरी है लोकतंत्र के इस बड़े त्यौहार में शामिल होना। ज़िम्मेदारी से वोट करना और लोकतंत्र के त्यौहार को सफल बनाना ताकि बाद के सारे त्यौहार ठीक से मनाए जा सकें।

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