राजनैतिक अखाड़े में ऐसे मजबूत होंगी महिलाएँ!
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राजनैतिक अखाड़े में ऐसे मजबूत होंगी महिलाएँ!

Author: Neeraj Jha calender  08 Mar 2019

राजनैतिक अखाड़े में ऐसे मजबूत होंगी महिलाएँ!

मंचों पर, भाषणों के दौरान महिला सशक्तिकरण की बातें आम हैं। महिलाएँ माँ हैं, बहन हैं, पत्नी हैं, दोस्त हैं, भगवान हैं - ऐसे अलंकरण भी आम हैं। लेकिन इन सबके बीच क्या महिलाएँ सामाजिक स्तर से पिछड़ी हुई नहीं हैं?

हैं। इसका कारण क्या है? क्यों आबादी का आधा हिस्सा कहलाने वाली महिलाएँ राजनैतिक पटल पर गंभीरता से नहीं ली जाती? कारण आम हैं। 

महिलाओं में नेताओं को वोटर नहीं दिखता। उन्हें इल्म है कि भारत के पितृसत्तात्मक समाज में यदि परिवार के पुरुष को साध लिया जाए तो महिलाएँ अपने आप सध जाएँगी। महिलाएँ पुरुष का साया मात्र समझी जाती हैं। जो हमेशा बस वही करती दिखेंगी जो पुरुष चाहेगा। होंगी लगभग हर जगह लेकिन क़ैद। अपने वजूद को तड़पती हुई।

देश की राजधानी में एक दिन में छः बलात्कार होते हैं। इनके खिलाफ आंदोलन होता है। फेसबुक और ट्विटर पर मुहिम चलते हैं। लेकिन कुछ ही दिनों में सब नॉर्मल हो जाता है। जनप्रतिनिधि अपने अनर्गल बयानों से महिलाओं का बलात्कार करते रहते हैं। दुर्भाग्य कि खुद महिलाओं के बीच से आने वाली प्रभुत्वशाली महिलाएँ भी महिला विरोधी दिखाई देने लगती हैं। 

तमाम दुश्वारियों को पार करके एक मुकाम को पाने वाली स्मृति ईरानी, हेमा मालिनी या किरन खेर जैसी महिलाएँ भी इतनी असहाय हो जाती हैं कि महिलाओं के साथ खुलकर खड़ी नहीं हो पाती। कोई मंदिरों में महिलाओं के प्रवेश पर रोक को सही ठहराता है तो कोई महिलाओं को आज़ादी से ऑटो में न बैठने की सलाह देता है। तो कोई कहता है कि आजकल बलात्कार जैसी ख़बरों को ज्यादा प्रचारित किया जा रहा है। क्यों?

इस सब का कारण है- महिलाओं के संगठनों का अभाव। सूरज के उगने से पहले उठ जाने वाली और आधी रात तक जागने वाली देश की अधिकांश महिलाओं की ज़िंदगी सिगरेट जैसी हो गई है। जलती हैं औरों के लिए और धीरे-धीरे खत्म हो जाती हैं। घर की चाहरदीवारी से लेकर परंपराओं का अदृश्य जाल उन्हें बाँधे रखता है। उस चाहरदीवारी या जाल से ताउम्र बाहर नहीं आ पातीं। ऐसे में उनके मुद्दे चर्चा के केंद्र में नहीं आ पाते।

महिलाओं के प्रति समाज के दोयम सोच और परंपराओं की जंज़ीरों को तोड़ने के लिए ज़रूरी है महिलाओं का संगठन। उनकी आज़ादी - दैहिक, मानसिक और आत्मिक। उनके मुद्दों का मुख्यधारा में शामिल हो पाना। केवल अर्धांगिनी कहा जाना नहीं बल्कि माना जाना। ज़रूरी है कोने में स्थापित महिलाओं की मूर्तियों को महिलाएँ तोड़ दें और भगवान होने के झाँसे में न आएँ

  • अपने स्वाभिमान और सम्मान के लिए, 
  • अपनी आज़ादी और अभिव्यक्ति के लिए, 
  • अपने वजूद के लिए।

ये सब कर सकने में हर महिला सक्षम है। बस एक शुरुआत ज़रूरी है। ज़रूरी नहीं कि दुर्गा और लक्ष्मी की पूजा हो और भाषणों में भगवान बनाकर उन्हें एक कोने में स्थापित कर दिया जाए पर ज़रूरी है ये सुनिश्चित करना कि लाखों दुर्गाओं और लक्ष्मियों को पैरों तले रौंद न दिया जाए। बड़े बड़े इंडस्ट्रीज़ में महिलाओं को दैहिक और मानसिक रूप से प्रताड़ित न किया जा सके।

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