क्या कभी मिलेंगे बीएचयू से उठे सवालों के जवाब
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क्या कभी मिलेंगे बीएचयू से उठे सवालों के जवाब

Author: Neeraj Jha   31 Jul 2017

क्या कभी मिलेंगे बीएचयू से उठे सवालों के जवाब

क्या शक्ति स्वरूप नारी की पूजा करने वाला हमारा भारतीय समाज वास्तव में स्त्री जाति की इज़्जत करता है या करने की इच्छा रखता है? क्या संयुक्त राष्ट्र में ओजस्वी भाषण देने वाली सुषमा स्वराज को नारी सशक्तिकरण का सिंबल बना कर दिखाने वाला समाज महिला सशक्तिकरण का अर्थ भी समझता है? क्या शौचालयों को इज़्जतघर समझने और समझाने वाला समाज इज़्जत की परिभाषा जानता है? क्या "बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ" के नारे पर थिरकने वाला हमारा समाज बेटी शब्द के अनुराग को समझने का माद्दा या फिर उन्हें पढ़ाने की हिम्मत रखता है? काश इन प्रश्नों का उत्तर हाँ हो पाता। सन 1919 में मदन मोहन मालवीय द्वारा स्थापित बनारस हिंदु विश्वविद्यालय इन दिनों जिस आग में झुलस रहा है, वह आग केवल विवि की साख़ ही नहीं बल्कि संपूर्ण भारतीय संसकृति और मान्यताओं को राख़ कर रहा है। विवि में पढ़ने वाली छात्राओं के अनुसार "उनके छात्रावास के सामने कुछ मनचले आवारा तत्व पत्थरबाजी करते हैं, फ़ब्तियाँ कसते हैं, और अभद्र हरक़तें करते हैं। सिक्योरिटी गार्ड उन मनचलों के ख़िलाफ़ कुछ करता नहीं। रास्ते पर रोशनी की भी समुचित व्यवस्था नहीं है।" विवि स्तर पर पहुँचने वाली छात्राएँ नारी सशक्तिकरण का अर्थ जानती थी और इसी कारण इन सब के विरुद्ध उन्होंने विवि प्रशासन को शिक़ायत की और मूलभूत सुरक्षा की मांग की। जवाब मिला - आप इतनी देर तक घूमती क्यों हैं? स्थिति देखते हुए छात्राओं ने फैसला किया कि विवि परिवार के मुखिया से बात की जाएगी। लेकिन विवि प्रशासन को ये बात नागवार गुज़री और छात्राओं पर लाठी बरसा दी गई। इस तरह इग्नोरेंस झेलने के बाद छात्राओं ने आंदोलन उग्र कर दिया। पत्थरबाज़ी की गई, नारे लगाए गए। इसके बाद छात्राओं ने देश के मुखिया और उनके क्षेत्र के माननीय सांसद नरेंद्र मोदी (जो उस दिन शहर में ही मौज़ूद थे) के सामने प्रदर्शन करने की योजना बनाई लेकिन प्रधान सेवक ने अपना रास्ता बदल लिया ताकि विवि गेट के आगे से उन्हें न निकलना पड़े। उस दिन प्रधान सेवक ने गौ माता के साथ बड़ी आत्मीय तस्वीर खिंचवाई और गौ माता के प्रेम में इतने डूब गए कि अपने ही संसदीय क्षेत्र की बेटियों का दर्द उन्हें दिखा नहीं। ख़ैर अपनी अपनी प्राथमिकताएँ होती हैं। प्रदेश के मुखिया योगी आदित्यनाथ भी बेटियों के लिए संवेदनशील दिखे नहीं। मुख्यमंत्री पद संभालते ही "रोमियो” को सुधारने के लिए "एंटी रोमियो स्क्वैड" बनाने वाले योगी "दुशासनों" और "दुर्योधनों" के ख़िलाफ कोई कारगर क़दम नहीं उठा पाए। कार्वाई के नाम पर विवि 2 अक्टूबर तक बंद कर दिया गया है और छात्र/छात्राओं से हॉस्टल खाली कराए जा रहे हैं। विवि के 1000 छात्र/छात्राओं पर एफआइआर दर्ज़ किया गया है। जबकि एक निजी चैनल पर विवि के वीसी त्रिपाठी जी कहते हैं कि आंदोलन करने वाले लोग बाहरी थे। वे ही छात्राओं को उकसा कर ये सब करवा रहे हैं। दो प्रश्न उठते हैं - अगर आंदोलनकारी बाहरी थे तो इन 1000 छात्र/छात्राओं पर एफ़आइआर क्यों? दूसरा, आख़िर ये बाहरी तत्व इस तरह से अराजकता फैलाने में सफल कैसे हो गए? ख़ैर, आजकल उत्तर मिलते नहीं। राजनीति की भाषा सबने सीख ली है - फिर चाहे वो आम जनता हो, किसी दल का समर्थक या फिर शिक्षक। उत्तर न दिया जाना, प्रश्नों को समाप्त करने का एक तरीक़ा है। ये सुनियोजित है। लेकिन एक बात जो हमें ध्यान रखना है वो ये कि प्रश्न करते रहना ही हमारे ज़िंदा होने का सबूत है। डरें नहीं, उत्तर मिले या न मिले - प्रश्न करते रहिए।

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