गाँधी होते तो कहलाते एंटी-नेशनल
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गाँधी होते तो कहलाते एंटी-नेशनल

Author: Neeraj Jha calender  30 Jan 2019

गाँधी होते तो कहलाते एंटी-नेशनल

72वें स्वतंत्रता दिवस वाली देशभक्ति ख़त्म हो गई। 5 महीने बाद फिर से जागेगी। फिर से देशभक्ति के तराने गूँजेंगे। सड़कों पर देश का भविष्य फटे-पुराने कपड़ों या देश की संस्कारों की बुज़ुर्ग ज़िदा लाशें तिरंगा लिए एक गाड़ी से दूसरी की तरफ भागेंगे। लोग थोड़े बहुत दयालु हो जाएंगे उनके प्रति और खरीद लेंगे उनका समान। देशभक्ति की भावना ही ऐसी है। 

वैसे देशभक्ति के बारे में सोचते सोचते यकलख़्त उमर ख़ालिद पर हुए हमले की याद आ गई। वही उमर, जिसे बीते सालों में देशद्रोह का चेहरा बना दिया गया है। जिसके कारण पूरे जेएनयू को गद्दारों या आतंकियों का अड्डा कहा जाने लगा है। उस समय जब पूरी दिल्ली में सुरक्षा व्यवस्था अपने चरम पर होती है, कांस्टीट्यूशन क्लब में उमर ख़ालिद पर हमला काफी कुछ सोचने पर मजबूर करता है। लेकिन इस सोच की सीमा है नहीं। सीमा तय होगी जाँच और रिपोर्ट्स के बाद। ख़ैर, उमर ख़ालिद, उस पर हुए हमले और देशद्रोह के बारे में सोचते हुए बापू एकदम से ज़ेहन में आ गए। अगर होते सामने, तो उनसे ज़रूर कहता कि बापू हम आपके वाले ज़माने में धीरे धीरे लौट रहे हैं। न न ग़लतफहमी मत पालिएगा…सच्चाई या ईमानदारी या भाईचारे के युग में नहीं बल्कि उस युग में जहाँ सिडिशन चार्जेज़ आम हों। ज़ेहन में बापू के आते ही सवाल उमड़ा कि बापू देशभक्त थे या देशद्रोही। 

बापू पर भी लगे थे सिडिशन चार्जेज

कानून के हिसाब से तो बापू पर भी सिडिशन चार्जेज लगे थे। उनकी दो-दो क़िताबों को बैन कर दिया गया था। हिंद स्वराज और सर्वोदय। तत्कालीन हुक़ूमत को डर था कि ये किताब उनकी जड़ें हिला कर रख देखा। उनके साम्राज्य को कमज़ोर कर देगा। लोगों को ताक़त दे देगा। सरकार विरोधी तो थी ये क़िताबें। साम्राज्य विरोधी थीं। गुलाम थे उस वक्त हम। आज तो नहीं हैं, लेकिन शायद सिडिशन चार्जेज आज भी लग जाते गाँधी पर। हुक़ूमत के ख़िलाफ़ आवाज़ को कभी किसी ने स्वीकार नहीं किया है। चाहे हुक़ूमत किसी की रही हो। हुक़ूमतें अपने आप को देश समझने का अहंकार सदियों से पाले बैठीं हैं। आज बी ये सिलसिला बदस्तूर जारी है।

समाचार पत्रों का काम लोकप्रिय दोषों को निडरता से जनता के सामने रखना है

वैसे, बापू, हिंद स्वराज पढ़ा। कुछ भी लिख दिया करते थे। वक़ील आदमी थे लेकिन ज़हानत अलग क़िस्म की थी आपकी। हिंद स्वराज में आप लिखते हो - समाचार पत्रों का काम लोकप्रिय दोषों को निडरता से जनता के सामने रखना है। पर बापू, जज लोया को किसने मारा, 2जी स्पेक्ट्रम में किसने खाया, किसने पचाया, राफेल डील में किस-किस का हिस्सा रहा, मुस्लिमों का तुष्टिकरण कौन कर रहा है, हिंदुओं का ध्रुवीकरण कौन कर रहा है - ये सब पता चल गया, तो आपके वाली कांग्रेस या फिर बीजेपी सत्ता पर कैसे बैठेगी, सरकार कैसे बनेगी, देश कैसे चलेगा! कोई चिंता ही नहीं है आपको देश की। 

निडरता ही ताकत है

अच्छा, गजब तो आपने और भी किए हुए हैं। लिखा है - निडरता ही ताकत है। सर्वथा झूठ है ये बापू। ताकत अगर कुछ है तो सत्ता। और ताकतवर वे हैं, जो या तो सत्ता में स्थापित हैं या जो आँखे बंद करके सत्ता में स्थापित परम पूज्यों का बिना किसी तर्क-वितर्क के निस्वार्थ भाव से महिमामंडन करते रहें। ऐसे ताकतवरों को पद्मश्री भी मिल जाता है और बड़े से बड़े केसो में आराम से रिहाई भी। कुछ लोगों ने आपकी बात मान ली होगी। उनकी हालत आप उनसे ही पूछ लें। क्योंकि आपकी परिभाषा के अनुसार ताकतवर को यहाँ रहने का हक़ नहीं। गौरी लंकेश, कलबुर्गी, कुछ रीढ़ वाले पत्रकार मिल जाएँगे आपको। कुछ एक त्रस्त हैं यहाँ भी। 

हम सब भारतीय एक हैं

अच्छा बापू, आगे पढ़ा, इस उम्मीद के साथ कि कुछ तो सच्चा लिखा होगा आपने। लेकिन नहीं। आगे तो आपने लिख दिया - हम सब भारतीय एक हैं। कहाँ से? कितना तो अलग अलग है सबकुछ। ब्राह्मण, दलित, पिछड़े, अगुवे, महिला, पुरुष, मराठी, कन्नड़, हरियाण्वी, बंगाली, बिहारी, हिदु, मुस्लिम, सिख, इसाई, जैन, बौद्ध आदि आदि। और इसी के हिसाब से वोट बैंक भी हैं। हिंदी बेल्ट किसी का, साउथ बेल्ट किसी की तो उत्र-पूर्व किसी का। हर तरफ भिन्नता ही तो है। अलगाव ही तो है। आप पं नेहरु, सरदार पटेल, मौलाना आज़ाद, खुद आप - इस एकता में उलझ गए होंगे। गहराई नहीं भाँप सके सब। अलगाव नहीं देख पाए।

राष्ट्र और धर्म दो अलग अलग बातें हैं

आगे आपने लिखा कि राष्ट्र और धर्म दो अलग अलग बातें हैं। नहीं बापू। एक बार फिर मात खा गए आप। बिल्कुल भी अलग नहीं है ये तो। धर्मरक्षा ही राष्ट्र रक्षा है। धर्म विस्तार ही राष्ट्र विस्तार है। भगवा - हिंदुस्तानियत की पहचान है। कमरे की दीवारों से बाथरूम की टाइल्स तक सब भगवा हो जाना ही राष्ट्रभक्ति की पहचान है। धर्म के नाम पर गै़रों को दुखी करना ही राष्ट्र के प्रति कर्तव्य की पूर्ति है। बापू - राष्ट्र तो कुछ है ही नहीं। जो है धर्म ही है। कम से कम - सियासत यही सिखा रही है। वही सियासत जिसके एक सिपहसालार आप भी थे।

अगर गाय के दुख को देख नहीं सकते तो अपने जान की क़ुर्बानी दे दो, गाय की जान लेने वालों की हत्या न करो

ख़ैर, हम आगे बढ़े। और पढ़ा आपके हिंद स्वराज को। इस उम्मीद के साथ कि कुछ तो देशभक्ति मिलेगी। लेकिन पाया बिल्कुल उल्टा। गाय के बारे में इतने निर्मम बयान। अगर गाय के दुख को देख नहीं सकते तो अपने जान की क़ुर्बानी दे दो, गाय की जान लेने वालों की हत्या न करो। ये तो हद पार हो गई बापू। गाय - माता है माता। और माता पर कोई हाथ उठाये तो हाथें तोड़ देनी चाहिए न। ऐसे कैसे छोड़ दें माता को मारने वालों को? आप तो कुछ भी कह देते हो बापू।

देश ज़मीन का टुकड़ा है बापू और कुछ नहीं

वो तो भला हो नाथूराम गोड्से का कि उतार दी तीन गोलियाँ आपके सीने में। अगर आज तक ज़िंदा होते न आप तो या तो किसी नए राष्ट्रभक्त की लाठी खाते या गोली। हो सकता है जेल में सड़ रहे होते। बापू, कोई भी ऐसी बात जो हुक़ूकम को परेशान करे, देश के लिए घातक है। कोई भी ऐसा उपदेश जो देशवासियों को ताकतवर बनाए, देश के लिए घातक है। बापू, देश तो ज़मीन का एक टुकड़ा है न? देशवासियों का क्या? आते रहेंगे, जाते रहेंगे।

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