कहीं खो न दे भारत अपना स्वभाव
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कहीं खो न दे भारत अपना स्वभाव

Author: Neeraj Jha calender  31 Jul 2017

कहीं खो न दे भारत अपना स्वभाव

तो लीजिए, लगभग तय हो गया है कि पहली बार भारत के तीन सर्वोच्च राजनीतिक पदों पर RSS से जुड़े नेता स्थापित होंगे। देश के प्रधानमंत्री पद पर नरेंद्र मोदी आसीन हैं राष्ट्रपति पद के लिए रामनाथ कोविंद की घोषणा हो चुकी है और उपराष्ट्रपति पद के लिए वेंकैया नायडू का नामांकन किया जा चुका है। गौरतलब है कि नरेंद्र मोदी रामनाथ कोविंद और वेंकैया नायडू तीनों RSS से जुड़े हैं। सन 2014 में भाजपा की लगभग एक तरफा जीत के बाद ऐसा होना लाजिमी था। 283 सीटों के साथ लोकसभा चुनावों में जीत दर्ज करने वाली भाजपा ने चुनाव प्रचार के दौरान लोगों से कांग्रेस मुक्त भारत की अपील की। भाजपा के लोग हमेशा कांग्रेस पर वंशवादी पार्टी होने का आरोप लगाते रहे। आज भारतीय जनता पार्टी भारत को एक विचारधारा का से देश बनाने का काम कर रही है। जिस देश की विविधता के लिए संपूर्ण विश्व उसका सम्मान सम्मान करता है आज उस देश में विचारधाराओं की विविधता पर प्रश्नचिन्ह लग गया है। गांधी के सपनों का वह मुल्क, जिसमें अलग अलग भाषा, जाति, वर्ण, और संप्रदाय के लोग मिल जुलकर देश की अखंडता और अस्मिता की रक्षा करते, आज टूटता दिख रहा है। हिंदू राष्ट्रवाद की अवधारणा पर चलने वाली RSS देश और संविधान की आत्मा के साथ न्याय करने में सर्वथा अयोग्य है लेकिन वक़्त का खेल ऐसा है कि आज उसी विचारधारा के पोषक लोग भारत के सर्वोच्च राजनैतिक पदों पर आसीन होंगे। RSS की स्थापना करने वाले केशव बालीराम, विनायक दामोदर सावरकार के हिंदु राष्ट्रवाद के विचारों और भारत को हिंदु राष्ट्र बनाने की उनकी इच्छा से प्रभावित थे। अपने अतिवादी सोच के कारण RSS ने सदैव सांप्रदायिक नफ़रत फैलाने का काम किया है। RSS से जुड़े नाथुराम गोड्से ने महात्मा गाँधी की हत्या की। इन बातों से खिन्न होकर तत्कालीन गृह मंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल ने संगठन को निरस्त करने की माँग की थी। बाद में, इस संगठन ने अपने आप को सांस्कृतिक संस्था बना लिया लेकिन इसकी आड़ में बीजेपी के ज़रिए अपनी राजनैतिक कुटिलताएँ जारी रखी। आज जबकि देश में शासन RSS द्वारा प्रयोजित बीजेपी का है, संपूर्ण देश हिंदु मुस्लिम के धड़ों में भँटता दिख रहा है तब देश के दो सर्वोच्च पदों पर RSS से जुड़े लोगो का चुना जाना मन में एक सवाल पैदा करता है। सवाल ये कि क्या भारत का वह स्वरूप बचा रह पाएगा जिसमें सभी धर्मों के लोग मिलजुलकर रहते थे; जिसमें इच्छानुसार धर्म अपननाने की आज़ादी थी आदि। सवाल रामनाथ कोविंद या वेंकैया नायडू के व्यक्तिगत योग्यता का नहीं सवाल उस विचारधारा का है जिसकी छांव में उन लोगों का राजनीतिक करियर पला-बढ़ा है, सवाल उस विचारधारा का है जिसने अपने शुरुआती दिनों से ही समाज के विखंडन का काम किया है. संप्रदायवाद जिस की रगों में बहता है और भारत को एक हिंदू राष्ट्र बनाना जिसका सपना है, सवाल उस विचारधारा का है जिसके प्रभाव में अहिंसा और शांति के दूत महात्मा गांधी की हत्या की गई, सवाल उस विचारधारा का है जिसने महात्मा की हत्या के बाद लड्डू बांटे, सवाल उस विचारधारा का है जो गोडसे को देशभक्त की तरह प्रचारित करता है और उसके नाम का मंदिर बनाना चाहता है, सवाल उस विचारधारा का है जिसने 1992 में बाबरी मस्जिद को ढहाया था, सवाल उस विचारधारा का है जिसने 2002 में गुजरात में नरसंहार करवाए थे और सवाल उस विचारधारा का है जिस की जद में इंसान, इंसानों से अलग हिंदू-मुस्लिम-सिख-इसाई आदि धर्मों में बँट रहे हैं। कहीं ऐसा न हो कि देश अपनी सांस्कृतिक विविधता खो दे और एक विचारधारा में बँध कर रह जाए।

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