देश को जलाकर क्या हासिल कर लेंगे दलित?
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देश को जलाकर क्या हासिल कर लेंगे दलित?

Author: Neeraj Jha calender  03 Apr 2018

देश को जलाकर क्या हासिल कर लेंगे दलित?

आज से तीन दशक पहले राजीव गाँधी के नेतृत्व वाली भारत सरकार ने SC-ST Act पारित किया। देश की आज़ादी के इतने सालों बाद भी दलितों को समाज में वह जगह नहीं मिली जो मनुष्य होने के नाते उनको मिलनी चाहिए थी। समाज में उस हक़ के लिए यह कानून पारित हुआ। काफी हद तक कानूनी सहायता मिली दलितों को। लेकिन धीरे धीरे शुरु होने लगा एक नया खेल। इस ऐक्ट को ढ़ाल बनाकर लोगों को बलैकमेल किया जाने लगा। पंचायत, वार्ड, म्यूनिसिपेलिटी आदि चुनावों में लोग अपने राजनैतिक प्रतिद्वंद्वियों के खिलाफ इस ऐक्ट का उपयोग हथियार के रूप में करने लगे।

लगभग 10 प्रतिशत केस बिल्कुल ही झूठे साबित हुए जबकि लगभग 75 प्रतिशत केस में या तो आरोपी बरी हो जाते हैं, या केस वापिस ले लिया जाता है या दोनों पक्षों में समझौता हो जाता है- जैसा कि सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा। यह कहते हुए सुप्रीम कोर्ट ने तत्काल गिरफ़्तारी पर रोक लगाने का फैसला दिया और जाँच डीएसपी रैंक के अफसर के हवाले कर दी। पहले इंस्पेक्टर के पास इन केसेज की जाँच की जिम्मेदारी थी।

दलितों के विरुद्ध अपराध बढ़े, सज़ा हुई कम

सिक्के का दूसरा पहलु भी है। वो ये कि 2010 से 2016 तक दलितों के विरुद्ध हुए अपराधों में 10 से 20 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। जबकि इन मुकदमों में सज़ा दर काफी कम हो गई है। यह उन लोगों की सामाजिक स्थिति को दिखाता है। अगर हम अपने आस पास के वातावरण को देखें तो अपने आप ही इस स्थिति को भाँप सकते हैं। किस तरह देश के कई हिस्सों में अनु जाति और जनजाति के लोग भारत के नागरिक होने के कारण मिलने वाले अधिकार और मनुष्य होने के कारण मिलने वाले सामाजिक ओहदे से वंचित हैं। किसी ने घोड़ खरीद लिया तो मार दिया गया। कोई घोड़ी चढ़ कर बारात के लिए गया तो मार दिया गया।

क्या हिंसा से मिलेगा न्याय

लेकिन 2 अप्रैल को जो कुछ भी हुआ, क्या वह इन सबका हल है? २ अप्रैल - पूरा भारत बंद रहा। कारण SC-ST कानून में सुप्रीम कोर्ट द्वारा किया गया संशोधन। चलिए संभव है कि संशोधन दलितों के विरुद्ध हो लेकिन क्या इसका अर्थ ये है कि आप देश के संसाधनों में आग लगा देंगे। देश को बंद कर देंगे। क्या दंगों के ज़रिए, आगजनी के ज़रिए लोगों को मार-पीट कर आप अपनी माँगे पूरी करवा लेंगे? याद रखिए की लाठी की भाषा कभी अंतिम नहीं होती। आज आपने चलाई है, कल कोई और चलाएगा। जिसकी लाठी होगी उसी की भैंस। जैसा कि प्राचीन काल से तथाकथित उच्चवर्ग ने किया। लाठी के बल पर दबाए रखा समाज के एक बड़े हिस्से को।

क्या हिंसा बाबा साहेब की विचारधारा का अपमान नहीं है

जिस बाबा साहब की तस्वीर को लेकर आप लोग यह हिंसक आंदोलन कर रहे हैं, यक़ीन मानिए इस वक़्त अगर ज़िंदा होते तो इस घटना से सबसे ज्यादा उदास और क्रोधित होते बाबा साहब। जिन्होंने हम सबको एक संविधान दिया, बराबरी का हक़ दिया, न्यायपालिका दी उन हकों की रक्षा के लिए, उन्हीं की तस्वीर की आड़ में उसी संविधान को तार तार करते हुए क्यों आपका विवेक आपको कोस नहीं रहा?

हिंसक आंदोलनकारियों में संविधान के प्रति कोई सम्मान नहीं

मध्य प्रदेश में 4 लोगों की और कुल मिलाकर 9 लोगों की हत्या की पुष्टि हो चुकी है। हरियाणा में पुलिस को भगा-भगा कर पीटा गया है। बिहार और झारखंड में पुलिस बलों पर हमला किया गया है। क्या इस तरह से देश की संस्थाओं पर हमला करके आपको अधिकार मिल जाएँगे। पत्रकारों के कैमरे तोड़े गए। बैंकर्स पर हमला किया गया। बसों में आग लगा दी गई। बाबा साहेब की तस्वीर को आगे करके इन कामों को अंजाम देने वाले लोग आखिर क्या छवि पेश करना चाहते हैं। हक़ीकत तो ये है कि न इनकी आस्था भारतीय संविधान में दिखाई देती है न ही बाबा साहेब की विचारधारा में।

जाँच से कैसी परहेज़

जिन संशोधनों के उपर ये पूरा हंगामा हो रहा है, उनमें से एक संशोधन है कि SC-ST केस में तत्काल गिरफ्तारी नहीं होगी। Deputy Sp Rank का कोई व्यक्ति उसकी जाँच करेंगे। इसमें ग़लत क्या है। क्या आप गाँधी के उस संदेश को भूल गए, जिसमें उन्होंने कहा था कि चाहे सौ दोषी छूट जाएँ लेकिन किसी बेगुनाह को सज़ा नहीं मिलनी चाहिए।

SC-ST Act का होता रहा है दुरुपयोग

इस दौर में भारतीय राजनीति में दलितों के सबसे बड़े चेहरे के रूप में मौज़ूद मायावती ने अपने शासन के दौरान इस कानून में संशोधन करते हुए आरोपी के खिलाफ एक गैर-दलित गवाह के होने का नियम लागू किया था। यह इस बात की पुष्टि करता है कि कहीं न कहीं इस कानून का दुरुपयोग हो रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि

हिंसा से नहीं होगाा कुछ भी हासिल

न तो राजपूतों द्वारा पूरे देश को आग के हवाले झोंक देने से उनकी इज़्ज़्त में चार चाँद लग गए न ही आपके द्वारा आग लगाने से आपको कोई फायदा होगा। अगर किसी को फायदा हुआ तो वो होंगे कुछ दलित नेता जो आपको मोहरा बनाकर खुद कि सियासत को मजबूत करेगा। एक ऐसा नेता जिसकी कुर्सी आपके कंधों और लाशों पर टिकी होगी। एक ऐसा नेता, जिसे न तो आपकी सामाजिक स्थिति से कोई सरोकार होगा न ही आपसे कोई अपनत्व।

राजनेताओं को है केवल कुर्सी से मतलब

विपक्ष में मौज़ूद राहुल गाँधी, ममता बनर्जी आदि सबने खुले मन से समर्थन किया। लेकिन उनका समर्थन आपके साथ नहीं था। उनका समर्थन देश के टूटने के साथ है। देश जितना टूटेगा, राजनैतिक लोगों को उतना ही फायदा होगा। प्रधान सेवक, मौनी बाबा बने बैठे हैं और गृहमंत्री बॉर्डर फिल्म के जैकी श्रॉफ जो करना बहुत कुछ चाहते हैं लेकिन कर कुछ नहीं पा रहे।

हिंसा कभी कोई विकल्प हो ही नहीं सकता। मुश्किलें कुछ भी हों, समस्या कोई भी हो आग लगा देने से छाया नहीं मिलती। 

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