आर्थिक बजट 2018 और मोदी सरकार के वादें
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आर्थिक बजट 2018 और मोदी सरकार के वादें

Author: Adarsh Kumar calender  31 Jan 2018

आर्थिक बजट 2018 और मोदी सरकार के वादें

संसद का बजट सत्र शुरू हो चुका है। कल मतलब 1 फरवरी को सदन में बजट पेश होना है। आम तौर पर समझे तो घर के अभिभावक को तनख्वाह मिलने के समय का एहसास। 2014 लोक सभा चुनाव में तमाम वादों के साथ आई सरकार को अपने वादों को पूरा करने के लिए इस कार्यकाल में यह आखिरी मौका होगा।

पिछले तीन सालों से लगातार विभिन्न मुद्दों में उलझे हुए हमलोग जरूरी मांगों पर आवाज उठाना भूलते जा रहे हैं। शायद यही कारण है की तमाम TV Channels आर्थिक बजट को tax slabs, tax rates तथा tax relaxation जैसे टर्म्स में उलझाए जा रहें हैं। एक आम आदमी के तौर पर बात करें तो क्या सरकार उन मुद्दों पर कुछ कर पा रही है जिनसे हमारी रोज मर्रा की जिंदगी में सुधार हो सके?

अपने इंटरव्यूज तथा भाषणों में स्वास्थ्य, रोजगार और शिक्षा जैसे तमाम जरूरी मुद्दों पर आँख बंद करते हुए प्रधानमंत्री 2022 के ख्वाब बेचने में लगे हुए हैं। शायद सरकार ने जनता के जरूरी मुद्दों को राजनैतिक हितों के लिए कुर्बान करने की कसम खा रखी है।

राज्य सभा टीवी के एक परिचर्चा में सामने आए स्वास्थ्य संबंधी कुछ सरकारी आंकड़े कहते हैं की NHA (National Health Acceleration) तथा NMR (Neutriants Mortality Ratio) के मामले में हम विश्व के निम्नतम देशों में शामिल हैं। हमरे देश में GDP का 2% हिस्सा स्वास्थ्य पर खर्च होता है। ये आंकड़ा भी हमें विश्व में स्वास्थ्य पर खर्च करने वाले राष्ट्रों के निम्नतम श्रेणी में शामिल करता है। कुल आबादी के 60% लोग आज भी इलाज के लिए निजी अस्पतालों पर निर्भर है। 63% से ज्यादा लोग आज भी इलाज के खर्चे के वजह से आर्थिक तंगी में हैं। 10 लाख बच्चे आज भी 5 वर्ष से कम उम्र में मर जाते हैं। 10000 मरीजों पर महज 9 अस्पताल हैं। स्थीति समान्य करने के लिए तत्काल 4 लाख डाक्टर तथा प्रयाप्त अस्पतालों की आवश्यकता है।

भारत में 50% से ज्यादा लोग आजीविका के लिए आज भी कृषि क्षेत्र पर निर्भर करते हैं। तमाम वादों के बाद सरकारी आंकड़े के अनुसार किसान परिवार की वार्षिक आय 20000 रुपए है। मतलब 2000 रुपए प्रति माह से भी कम। एक रिपोर्ट के मुताबिक कर्नाटक में दूध की कीमतों में 5 रुपए प्रति लीटर की कमी आई है। उपज में वृद्धि होने के बावजूद भी कीमत सही नहीं होने के कारण किसान घाटे में है। वर्तमान में उचित मूल्य के साथ 20 हजार आधुनिक गोदामों के साथ 4200 नये बजारो की आवश्यकता है। राष्ट्रीय अपराध ब्यूरो के अनुसार किसानों के 2014 में 628 जबकि 2016 में 4837 प्रर्दशन दर्ज हुए। ये आंकड़े पुराने आंकड़ो से लगभग 670% ज्यादा है। इन मुद्दों पर सरकार कोई ठोस जानकारी नहीं देती है की कितने मामलों में संज्ञान लिया गया और कितनी मांगें पूरी की गई हैं। ये बात भी सोचने वाली है की कितने मामले TV Channels ने कवर किया। खैर, मिडिया को हिंदू मुस्लिम टॉपिक से फुर्सत ही कहाँ है। प्रधानमंत्री का दावा है की 2022 तक किसानों की आमदनी दुगनी हो जाएगी। पर कैसे होगी इसपर कोई ठोस तथ्य नहीं है। शायद जनता भी ये सवाल पूछना जरूरी नहीं समझती।

शिक्षा तथा रोजगार पर के सवाल पर सरकार चुप्पी साधे हुए है। भारत के मुख्य आर्थिक सलाहकार का कहना है की भारत डेवलपिंग इकोनॉमी है इसलिए शिक्षा तथा स्वास्थ्य पर बहुत ज्यादा खर्च नहीं कर सकते। ये फर्मूला समझ के बाहर है की स्वास्थ्य तथा शिक्षा को दरकिनार कर हम बेहतर मैनपावर कैसे बना पाएंगे। व्यवसाय के लिए दिए गए कुल कर्जे का 17.4% लघु तथा मध्यम उद्योग कर्मियों को तथा लगभग 82% बड़े उद्योगपतियों को दिया गया है। लेकिन चौंकाने वाली बात यह है की सबसे ज्यादा NPA बड़े उद्योगपतियों के वजह से क्रिएट हुआ है, जिससे भारी मात्रा में रोजगार कम हुए हैं।

इन तमाम आंकड़ों के बीच प्रदूषण, जलवायु परिवर्तन, सामाजिक सुरक्षा तथा सौंदर्य और लिंगानुपात जैसे जरूरी मुद्दों को सरकार ने दरकिनार कर रखा है। केंद्र सरकार ने आगामी वित्तीय वर्ष में 7.5% GDP का लक्ष्य रखा है। पिछले वित्तीय वर्ष के लक्ष्य पर आर्थिक सलाहकार का कहना है की नोटबंदी तथा GST के वजह से हमारी ग्रोथ रेट धीमी रही। उम्मीद है इस बार सुधार हो। कितना बदलाव हुआ, कितना होना है? हिंदू मुस्लिम फर्मूला समझाती सरकार से उम्मीद है कि यह बजट जनता और राष्ट्र की आर्थिक ज़रूरतों को ध्यान में रखकर पेश करे। इस बजट को लोकसभा चुनावों के भेंट न चढ़ाए।

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