मेधा पाटकर: मोदी नर्मदा को पानी से ज़्यादा पर्यटन समझते हैं
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मेधा पाटकर: मोदी नर्मदा को पानी से ज़्यादा पर्यटन समझते हैं

By BBC(Hindi) calender  02-Sep-2019

मेधा पाटकर: मोदी नर्मदा को पानी से ज़्यादा पर्यटन समझते हैं

गुजरात में सरदार सरोवर बांध का जल स्तर 134 मीटर तक पहुंच गया है. इसकी वजह से मध्य प्रदेश के कई गाँवों में पानी भर गया है.
इन गाँवों में रहने वाले लोगों का जीवन बुरी तरह से प्रभावित हुआ है. कई घरों में पानी भर गया है. इसके विरोध में सामाजिक कार्यकर्ता मेधा पाटकर अपने कुछ सहयोगियों के साथ मध्य प्रदेश के बडवानी ज़िले के बड्डा गाँव में अनिश्चितकालीन अनशन पर बैठ गई हैं.
उन्हें भूख हड़ताल पर बैठे नौ दिन हो गए हैं. उनकी हालत अब बिगड़ने लगी है. लेकिन उनका कहना है कि जब तक उनकी माँगे नहीं मानी जाएंगी वो अनशन जारी रखेंगी.
मेधा पाटकर बीते 34 वर्षों से 'नर्मदा बचाओ' आंदोलन के बैनर तले सरदार सरोवर बांध की वजह से विस्थापित हुए लोगों के अधिकारों के लिए लड़ रही हैं.
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बीबीसी संवाददाता तेजस वैद्य ने बड्डा गांव पहुंचकर मेधा पाटकर से मुलाक़ात की और उनसे पूछा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तो कह रहे हैं कि सरदार सरोवर बांध की ऊंचाई से पानी ठीक से जा रहा है और आपको ये देखने के लिए आना चाहिए, लेकिन आप यहां अनशन पर बैठी हैं. ऐसा विरोधाभास क्यों?
मेधा: नरेंद्र मोदी एक राजनेता हैं और यहां हमारी जनता रह रही है. नरेंद्र मोदी का विकास का नज़रिया अलग है. वो देश में प्राकृतिक संसाधनों की कोई परवाह नहीं करते और परंपराओं के बारे में उनकी श्रद्धा नहीं है.
उन्होंने अपने भाषण में सिंचाई के बारे में भी कहा था कि हमें सारी पारंपरिक सिंचाई की पद्धतियां छोड़ देनी चाहिए जबकि देश में बड़े-बड़े बांधों के बावजूद भी सूखे और बाढ़ के चक्र में महाराष्ट्र जैसा राज्य भी आ गया है. अमरीका भी हज़ार बांध तोड़ चुका है. यहां उनका नज़रिया पर्यटन का अधिक है.
आपको ऐसा क्यों लगता है कि सरदार सरोवर बांध को अब पानी के बजा पर्यटन का मुद्दा बना दिया गया है?
उनके हर क़दम से ऐसा महसूस होता है. नदी किनारे के गाँवों को भी वो पर्यटन केंद्र के रूप में देख रहे हैं. उनका पूरा ध्यान उसी पर है.
उनको परवाह नहीं है कि गुजरात के विस्थापितों का भी आज तक पूरी तरह से पुनर्वास नहीं हुआ है. जहां उन्हें बसाया गया है, वहां घर-घर से लोग मज़दूरी करने जाते हैं. कई लोगों को ज़मीन ख़राब मिली है. कई को पुनर्वास में पीने के पानी की समस्या तक है.
आप 34 साल से लगातार आंदोलन कर रही हैं, इस बार के अनशन के महत्वपूर्ण मुद्दे क्या हैं?
पानी नहीं भरना चाहिए. गाँव-गाँव डूब रहे हैं, टूट रहे हैं और ज़मीनों का टापू बनना, ये सब हुआ है, उसके बाद और पाँच मीटर पानी बढ़ा तो मतलब हाहाकार मच जाएगा. फिर पुनर्वास होना भी मुश्किल होगा.
जलस्तर 134 मीटर होने से मध्य प्रदेश के कितने गाँव प्रभावित हुए हैं. पानी इससे ज़्यादा बढ़ता है तो और कितने गांव प्रभावित होंगे?
अभी तक पहाड़ी पट्टी के गाँव में डूब क्षेत्र के अंदर कम मकान हैं. लेकिन वे सब भी पुनर्वासित नहीं हैं. जो पुनर्वास स्थल पर गए हैं और जिन्हें ऊपर घर बांधना पड़ा है, उन्हें भी दूसरी जगह नहीं मिली है.
निमाड़ का जो मैदानी क्षेत्र है, जहां बड़े-बड़े भरे-पूरे गांव हैं, अति उपजाऊ ज़मीन है, सैकड़ों मंदिर हैं, हज़ारों मवेशी हैं, एक-एक गाँव में हज़ारों पेड़ हैं, वहां अभी तकरीबन 50 से 80 गांव तो प्रभावित हो चुके हैं.
अगर जल स्तर 139 मीटर तक पहुंच जाएगा तो 192 गाँव और एक नगर प्रभावित होंगे. पिछली मध्य प्रदेश की सरकार ने केंद्र के साथ कई गाँवों (16 हज़ार परिवारों) को डूब से बाहर करने का खेल खेला, लेकिन वो ग़लत साबित हो रहा है.
उन्होंने गाँवों की संख्या 176 पर लाई और ये बताना शुरू किया कि पूरे गांव ख़ाली हो गए हैं और पुनर्वास के लिए कोई भी बाक़ी नहीं है. अब साबित हो रहा है कि वो सब झूठ था. अब तक सिर्फ़ गाँवों के आँकड़ों के हिसाब से 32 हज़ार परिवार प्रभावित थे, आज भी 30 हज़ार के आस-पास संख्या जा ही रही है.
सरदार सरोवर बांध के पास रिवर राफ्टिंग शुरू हो रहा है. पर्यटन की और भी चीज़ें शुरू हो रही हैं. अगर पर्यटन के ज़रिए भी विकास होता है और वहां के आदिवासियों को भी रोज़गार मिलता है तो इसमें दिक्क़त क्या है?
आदिवासियों की ग्रामसभा को पूछकर विकास होना चाहिए. उन्हें क्या ऐसा विकास चाहिए, जिसमें बाहर के लोग आकर उनकी शांति, उनकी खेती और उनकी व्यवस्था पूरी बर्बाद कर देंगे.
उनको जो नौकरी अभी-अभी मिली है, वहां सिर्फ़ तीन-तीन महीने के लिए काम मिल रहा है. कॉन्ट्रैक्ट लेबर ही अधिक रहेंगे. ये भी सोचना चाहिए कि उनकी सादगी, स्वावलंबन की, प्रकृति-निर्भर संस्कृति किस प्रकार से बदलेगी.
हम ये नहीं कहते कि पर्यटन बिल्कुल नहीं होना चाहिए. लेकिन बाहर की बड़ी-बड़ी कंपनियों और कॉन्ट्रैक्टर्स को लाया जा रहा है. इसके बजाय अगर आदिवासी गांव की आतिथ्य परंपरा को बढ़ने का मौक़ा देते तो बात अलग होती. इनका बहुत ही अलग नज़रिया है और अलग नज़ारा बनने वाला है.
आपके अनशन के आठ दिन हो गए हैं. आपकी तबीयत भी बिगड़ रही है. तो ये अनश आगे कबतक चलने वाला है?
मैं नहीं बता सकती. ये अनशन अनिश्चितकालीन है.

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