भूपेंद्र सिंह हुड्डा की कांग्रेस को दी गई चुनौती में कितना दम
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भूपेंद्र सिंह हुड्डा की कांग्रेस को दी गई चुनौती में कितना दम

By Satyagrah calender  28-Aug-2019

भूपेंद्र सिंह हुड्डा की कांग्रेस को दी गई चुनौती में कितना दम

हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता भूपेंद्र सिंह हुड्डा अपनी ही पार्टी को चुनौती देते हुए दिख रहे हैं. पिछले दिनों उन्होंने एक रैली आयोजित की. इसमें उन्होंने एक तरह से खुद को मुख्यमंत्री का उम्मीदवार घोषित कर दिया. हरियाणा में इसी साल अक्टूबर-नवंबर में विधानसभा चुनाव होना है.
काफी समय से हरियाणा कांग्रेस के अलग-अलग खेमों में सियासी संघर्ष चलता दिख रहा है. 2014 के लोकसभा चुनावों और इसके छह महीने के अंदर हुए विधानसभा चुनावों में कांग्रेस की हार के बाद से ऐसा लगा कि राज्य कांग्रेस में भूपेंद्र सिंह हुड्डा का युग खत्म हो रहा है. कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व ने भी कुछ निर्णय ऐसे लिए जिनसे लगा कि अब पार्टी हरियाणा में नई पीढ़ी का नेतृत्व विकसित करने की कोशिश में है.
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हालांकि प्रदेश अध्यक्ष के तौर पर अशोक तंवर की नियुक्ति 2014 के लोकसभा चुनावों के पहले ही ​हो गई थी, लेकिन उन्हें संगठन के मामलों में खुली छूट बाद में मिली. पार्टी की आंतरिक राजनीति के बारे में हरियाणा कांग्रेस के एक नेता कहते हैं, ‘अशोक तंवर के प्रदेश अध्यक्ष बनने के बाद न सिर्फ हम 2014 का लोकसभा चुनाव हारे बल्कि विधानसभा चुनावों में भी हमें हार मिली. इसके बाद अशोक तंवर और भूपेंद्र हुड्डा खेमे ने एक-दूसरे पर आरोप लगाना शुरू किया. तंवर का कहना था कि हुड्डा के शासन के खिलाफ लोगों का गुस्सा हार की वजह बना. वहीं हुड्डा का कहना था कि तंवर ठीक से संगठन नहीं संभाल पाए, इसलिए हारे.’ वे आगे जोड़ते हैं, ‘लेकिन राहुल गांधी से नजदीकी की वजह से तंवर जमे रहे और भूपेंद्र हुड्डा पूरी ताकत लगाने के बावजूद उन्हें हिला नहीं पाए.’
दरअसल, दस साल मुख्यमंत्री रहने के बाद जब भूपेंद्र हुड्डा 2014 में विधानसभा चुनाव हारे तो यह माना जा रहा था कि अब वे खुद को पीछे और अपने बेटे दीपेंद्र हुड्डा को आगे करेंगे. यह भी माना जा रहा था कि हरियाणा कांग्रेस में वर्चस्व की लड़ाई अब दीपेंद्र हुड्डा और अशोक तंवर के बीच होगी. लेकिन भूपेंद्र हुड्डा पीछे हटते नहीं दिखे. उन्होंने 2019 का लोकसभा का चुनाव भी लड़ा.
हरियाणा से कांग्रेस सांसद रहे एक नेता भूपेंद्र हुड्डा की इस सक्रियता के बारे में बताते हैं, ‘2019 के लोकसभा चुनावों में सोनीपत से भूपेंद्र हुड्डा चुनावी मैदान में उतरे. रोहतक की सीट से पहले भी उनके बेटे दीपेंद्र हुड्डा सांसद थे. 2019 में वे भी इसी सीट से उतरे. इन दोनों सीटों को हुड्डा परिवार का गढ़ माना जाता है. भूपेंद्र सिंह हुड्डा को लग रहा था कि लोकसभा चुनावों में प्रदेश की दस सीटों में से इन दोनों सीटों को छोड़कर बाकी सभी आठ सीटें कांग्रेस हार जाएगी. हुड्डा की योजना यह थी कि ऐसा होते ही विधानसभा चुनावों के लिए नेतृत्व पर उनकी दावेदारी पक्की हो जाएगी. उन्हें यह भी लग रहा था कि इसके बाद वे पार्टी के शीर्ष नेतृत्व पर अशोक तंवर को हटाने का दबाव बनाएंगे और खुद प्रदेश अध्यक्ष बन जाएंगे. लेकिन उनकी यह योजना सफल नहीं हुई और कांग्रेस हरियाणा की सभी दस सीटें हार गई.’
अपनी सीट हारने वाले भूपेंद्र हुड्डा के लिए बुरी खबर यह भी थी कि उनके बेटे दीपेंद्र हुड्डा की भी सीट नहीं बची. लेकिन उनके लिए अच्छी खबर यह थी कि प्रदेश अध्यक्ष अशोक तंवर भी सिरसा से चुनाव हार गए. अगर तंवर चुनाव जीत गए होते तो इस खींचतान में उनका पलड़ा भारी होता, लेकिन ऐसा नहीं हुआ. इसके बाद भी लगातार दोनों खेमों के बीच न सिर्फ सार्वजनिक बयानबाजी चलती रही बल्कि आंतरिक तौर पर शह और मात का खेल चलता रहा.
हरियाणा प्रदेश कांग्रेस के एक अन्य नेता कहते हैं, ‘भूपेंद्र सिंह हुड्डा लोकसभा चुनावों के बाद लगातार पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व पर तंवर को हटाने और खुद को प्रदेश अध्यक्ष बनाने के लिए दबाव बनाए हुए हैं. लेकिन इस बारे में अपने पक्ष में निर्णय नहीं होता देख उन्होंने अब एक रैली करके पार्टी को बगावत के संकेत दे दिए हैं.’
यह पूछे जाने पर कि बगावत के इस संकेत को पार्टी कितना गंभीरता से ले रही है, वे कहते हैं, ‘भूपेंद्र हुड्डा 71 साल के हैं. उनके सामने उनके बेटे का राजनीतिक भविष्य है. इसलिए वे पार्टी छोड़कर बाहर जाएंगे, इसकी संभावना तो कम है. इसलिए पार्टी भी मान रही है कि उन्होंने यह दांव दबाव बनाने के लिए खेला है. उन्हें ताकत इस बात से भी मिल रही है कि शीर्ष नेतृत्व को लेकर पार्टी में भ्रम की स्थिति है. लेकिन यह हर कोई मान रहा है अगर सोनिया गांधी उन्हें मिलने के लिए बुलाती हैं तो वे जो कहेंगी, भूपेंद्र हुड्डा वही करेंगे.’
वे आगे कहते हैं, ‘चर्चा ये चल रही है कि अगर उन्हें प्रदेश अध्यक्ष नहीं भी बनाया गया तो चुनाव अभियान समिति का प्रमुख या कोई अन्य महत्वपूर्ण भूमिका का प्रस्ताव उन्हें दिया जा सकता है और उन्हें यह कहा जा सकता है कि मुख्यमंत्री पद को लेकर फैसला चुनाव जीतने के बाद किया जाएगा. मध्य प्रदेश और राजस्थान में भी कांग्रेस ने इसी तरह का फॉर्मूला अपनाया था.’
पिछले दिनों रोहतक में आयोजित रैली में भूपेंद्र हुड्डा ने खुद को अगले विधानसभा चुनावों के लिए मुख्यमंत्री का उम्मीदवार घोषित कर दिया था. उन्होंने अनुच्छेद-370 पर कांग्रेस के रुख पर कहा कि पार्टी भटक गई है. साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि यह वह कांग्रेस नहीं है जो पहले थी. उनका कहना था, ‘जब सरकार कोई अच्छा काम करती है तो मैं उसका समर्थन करता हूं. मेरे कई साथियों ने अनुच्छेद 370 हटाने का विरोध किया. हमारी पार्टी से भटक गई है. यह अब वह कांग्रेस नहीं है, जिसमें मैं रहा हूं. जब राष्ट्रवाद और आत्मसम्मान की बात आती है तो मैं किसी चीज से समझौता नहीं करता हूं.’
इस रैली में भूपेंद्र सिंह हुड्डा ने अगले विधानसभा चुनावों को लेकर कई लोकलुभावन घोषणाएं भी कीं. उनका कहना था, ‘अगर राज्य में हमारी सरकार बनी तो आंध्र प्रदेश की तरह कानून बनाएंगे ताकि 75 फीसदी नौकरियां हरियाणा के लोगों को मिल सकें. सरकार बनेगी तो मैं सबसे पहले अपराधियों का सफाया करूंगा. दो महीने में सबको अंदर कर दूंगा. किसानों का सबसे पहले कर्ज माफ करूंगा. दो एकड़ तक के किसानों को बिजली फ्री की सुविधा दूंगा. पुरानी पेंशन व्यवस्था लागू होगी.’ उन्होंने इस रैली में यह घोषणा भी की कि वे अपनी सरकार में चार उपमुख्यमंत्री बनाएंगे ताकि प्रदेश के प्रमुख वर्गों को सरकार में सम्मान के साथ उचित प्रतिनिधित्व मिल सके.
हालांकि, इस रैली को प्रदेश अध्यक्ष अशोक तंवर अनुशानसहीनता मानते हैं. पत्रकारों से बातचीत में इस रैली के बारे में वे कहते हैं, ‘पार्टी के खिलाफ जाकर रैली करना अनुशासनहीनता है. अब इस अनुशासनहीनता का अंत होना चाहिए. कांग्रेस पहले वाली ही है, बदली नहीं है. इस रैली को लेकर मैं हाईकमान से बात करूंगा. घोषणा पत्र पार्टी का होता है और पार्टी ही जारी करती है. किसी व्यक्ति विशेष का मैनिफेस्टो नहीं होता.’
हरियाणा में भूपेंद्र सिंह हुड्डा की यह चुनौती 2016 में पंजाब में कैप्टन अमरिंदर सिंह की चुनौती की याद दिलाती है. 2017 में पंजाब में विधानसभा चुनाव होने थे और उस वक्त कैप्टन ने इसी तरह का दबाव कांग्रेस पर बनाया था. उस वक्त उनके बारे में भी माना जा रहा था कि अगर पार्टी ने कैप्टन को कमान नहीं दी तो वे अलग पार्टी बना सकते हैं. बाद में पार्टी ने कैप्टन को कमान दी और पंजाब की सत्ता की दावेदार मानी जा रही आम आदमी पार्टी को पछाड़कर कांग्रेस वापस सत्ता में आई.
तो क्या पंजाब के पड़ोसी राज्य हरियाणा में भी कांग्रेस इसी रास्ते पर चलेगी? कांग्रेस के नेताओं, राजनीतिक जानकारों और पंजाब-हरियाणा के पत्रकारों से बातचीत करने पर पता चलता है कि दबाव की रणनीति भले ही भूपेंद्र हुड्डा ने कैप्टन की तरह ही अपनाई हो लेकिन सियासी पूंजी के मामले में वे कैप्टन से काफी पीछे हैं. 2014 के लोकसभा चुनावों में जब पूरे देश में मोदी लहर थी तो पंजाब में यह लहर उतनी प्रभावी नहीं रही. जब पंजाब में कांग्रेस के नेता चुनावी मैदान छोड़कर भाग रहे थे तो उस वक्त भाजपा के वरिष्ठ नेता अरुण जेटली को कैप्टन ने भाजपा के लिए सुरक्षित माने जाने वाली सीट अमृतसर से चुनाव हराया था. बाद में 2017 के विधानसभा चुनावों में भी कैप्टन का जादू चला. 2019 के लोकसभा चुनावों में भी मोदी लहर पंजाब में नहीं चली.
इसके मुकाबले अगर भूपेंद्र सिंह हुड्डा को देखा जाए तो 2014 में लोकसभा और विधानसभा चुनावों में वे हरियाणा में भाजपा को मजबूत होने से नहीं रोक पाए. 2019 के लोकसभा चुनावों में न सिर्फ कांग्रेस की और बुरी स्थिति हुई बल्कि वे खुद भी चुनाव हार गए. जिस तरह का जनाधार पंजाब में कैप्टन का है, उस तरह का जनाधार हरियाणा में हुड्डा का नहीं माना जाता. इसलिए अब देखना दिलचस्प होगा कि शीर्ष स्तर पर नेतृत्व संकट से जूझ रही कांग्रेस हरियाणा में अपनी ही पार्टी के वरिष्ठ नेता भूपेंद्र हुड्डा से मिल रही चुनौती से कैसे निपटती है.

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