Kashmir में 70 सालों के दौरान ऐसे बदली लाइन ऑफ कंट्रोल
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Kashmir में 70 सालों के दौरान ऐसे बदली लाइन ऑफ कंट्रोल

By Ichowk calender  19-Aug-2019

Kashmir में 70 सालों के दौरान ऐसे बदली लाइन ऑफ कंट्रोल

अगस्त 1947 में जम्मू-कश्मीर एक रियासत हुआ करता था, जो करीब 2.06 लाख स्क्वायर मील में फैला था. यानी अमेरिका के कैलिफोर्निया से भी बड़ा. दो महीने बाद पाकिस्तान ने जम्मू और कश्मीर पर हमला कर दिया, बावजूद इसके कि उसने जम्मू और कश्मीर के साथ समझौता किया हुआ था. इसके बाद जम्मू और कश्मीर ने भारत से मदद मांगी और भारत में विलय होने के समझौते पर हस्ताक्षर किए. इसके बाद भारत की ओर से पाकिस्तान को जवाब देने के चलते एक युद्ध शुरू हुआ, जो 1949 में जाकर खत्म हुआ. ये भी तब खत्म हुआ, जब यूनाइटेड नेशन्स ने हस्तक्षेप किया और माना कि जम्मू और कश्मीर का भारत में विलय लीगल था.
इसके बाद दोनों देशों की सेनाओं की स्थिति के आधार पर एक सीजफायर लाइन खींची गई. सीजफायर लाइन में अस्थाई तौर पर जम्मू और कश्मीर को दो टुकड़ों में बांट दिया. करीब 65 फीसदी हिस्से भारत के पास आया और लगभग 35 फीसदी हिस्से पर पाकिस्तान का राज हुआ. सीजफायर लाइन जम्मू में चेनाब नदी के दक्षिणी छोर पर स्थिति मनावर से शुरू हुई और उत्तर की ओर केरन तक गई. केरन से सीजफायर लाइन उत्तर की तरफ आखिरी प्वाइंट तक गई, जिसे 'एनजे9842' कहा जाता था और वहां से पर्वत शिखा से होती हुई चीन के साथ लगे इंटरनेशनल बॉर्डर तक गई.
'एनजे9842' को सियाचिन ग्लेशियर के लिए बेस की तरह भी समझा जा सकता है. यह पूरी तैनाती ये मानकर की गई कि पर्वत शिखा की दिशा में सीमा उत्तर की ओर है. ट्रांस-हिमालयन रीजन में ऊंचे-ऊंचे पहाड़ों का तब तक पूरी तरह से पता नहीं चल सका था. सीजफायर लाइन की औपचारिकता जुलाई 1949 में भारत और पाकिस्तान के बीच कराची एग्रिमेंट के जरिए पूरी की गई. इस एग्रिमेंट को यूनाइटेड नेशन्स के दो अधिकारियों ने गवाह के तौर पर साइन भी किया. उस वक्त ये बताया गया था कि यूनाइटेड नेशन्स के रिजॉल्यूशन के बारे में जवाहरलाल नेहरू ने कराची गए भारतीय प्रतिनिधिमंडल को बताया था.
इस रिजॉल्यूशन का मतलब था- जो नेहरू ने प्रतिनिधिमंडल को बताया था- कि कोई भी 'बिना इंसानों वाली जगह' अगर सीजफायर लाइन एग्रिमेंट में चिन्हित होने से बच गई है तो वह भारत की होगी, क्योंकि जम्मू और कश्मीर का भारत के साथ लीगल मर्जर हो चुका है. सीजफायर लाइन की प्रतिबद्धता को तब तक बनाए रखना था, जब तक जम्मू और कश्मीर को लेकर अंतिम फैसला नहीं हो जाता. हालांकि, 1960 के दशक में दो ऐसी घटनाएं हुईं, जिन्होंने जम्मू और कश्मीर की यथास्थिति को बदल कर रख दिया. 1962 का भारत-चीन युद्ध और 1965 का भारत-पाकिस्तान युद्ध.
1962 में चीन ने हमला कर दिया
चीन ने भारत के कब्जे वाले कश्मीर पर 1962 में हमला कर दिया और करीब 20 फीसदी हिस्से पर अपना कब्जा कर लिया. इसे अक्साई चिन कहा जाता है. चीन ने जम्मू और कश्मीर पर भारत की संप्रभुता को मानने से इनकार कर दिया.
1963 में पाकिस्तान ने जमीन का एक हिस्सा चीन को दिया
पाकिस्तान ने चीन के साथ एक 1963 में एक एग्रिमेंट साइन किया और करीब 2000 स्क्वायर मील का उत्तरी कश्मीर का हिस्सा चीन को दे दिया, जो अब तक चीन के कब्जे में है.
1965 में पाकिस्तान ने फिर किया हमला
भारत और पाकिस्तान दोनों देशों ने 1965 के युद्ध में एक दूसरे के हिस्सों पर कब्जा किया. भारत ने करीब 750 स्क्वायर मील पर कब्जा किया, जबकि पाकिस्तान ने 200 स्क्वायर मील पर. लेकिन ताशकंद समझौते के बाद दोनों देशों की सेनाएं लाइन ऑफ कंट्रोल पर अपनी पहले वाली स्थिति पर चली गईं.
1971 में भारत-पाक के बीच हुआ बड़ा युद्ध
ये 1971 का बांग्लादेश के लिए भारत और पाकिस्तान के बीच हुआ युद्ध था, जिसने सीजफायर लाइन को लाइन ऑफ कंट्रोल (एलओसी) में बदल दिया. भारत और पाकिस्तान के बीच हुए 1972 के शिमला समझौते से पहले कोई भी एलओसी नहीं थी. इस एग्रिमेंट ने व्यावहारिक रूप से यूनाइटेड नेशन्स के उस रिजॉल्यूशन को बेकार बना दिया, जिसके तहत दोनों देशों में तय हुआ था कि सभी झगड़े द्विपक्षीय बातचीत से सुलझाए जाएंगे. इस तरह खींची गई लाइन ऑफ कंट्रोल ने पाकिस्तान को पीओके और गिलगिट-बाल्टिस्तान पर कब्जा दे दिया. बाकी के जम्मू और कश्मीर में से अक्साई चीन हटा दें तो वह लाइन ऑफ कंट्रोल के भारत की तरफ का हिस्सा है.
1984 में फिर बदला लाइन ऑफ कंट्रोल
लाइन ऑफ कंट्रोल को लेकर 1984 में एक बार फिर बदलाव हुआ, जिसे पाकिस्तान ने सियाचिन ग्लेशियर पर कब्जा करने की नीयत से डिजाइन किया था. सियाचिन ग्लेशियर पाकिस्तानी सेना के फोकस में 1970 में आया, जिसके बाद 1971 में पाकिस्तान को बुरी हार का सामना करना पड़ा. एक भारतीय कर्नल नरेंद्र कुमार ने एक इंटरनेशनल मैगजीन में पाकिस्तान द्वारा सियाचिन ग्लेशियर पर कब्जा करने की कोशिश के बारे में पढ़ा. इसके बाद वह एक टीम लेकर 1981 में सियाचिन ग्लेशियर पर पहुंचे. उनकी टीम वहां की कुछ चोटियों तक पहुंची और इंदिरा कोल (Indira Col) तक पहुंची. आपको बता दें कि इसका नाम इंदिरा गांधी के नाम पर नहीं पड़ा है. ऊंचे पहाड़ों में कोल एक गुजरने का रास्ता होता है. इंदिरा कोल का नाम अमेरिकन जियोग्राफर ने 1912 में रखा था, वो भी देवी लक्ष्मी के नाम पर. यहां बताते चलें कि इंदिरा गांधी का जन्म 1917 में हुआ था.
भारत के सियाचिन ग्लेशियर पर पहुंचने के बारे में पाकिस्तान को काफी बाद में पता चला, जब उन्होंने मेड इन इंडिया सिगरेट का एक पैकेट पाया. इसके बाद उन्होंने तय किया कि सियाचिन पर कब्जा करना है और इसके लिए लंदन की एक फर्म को पहाड़ी चढ़ने के सारे सामान का ऑर्डर दिया, जो भारत को भी सामान सप्लाई करती थी. यहीं से ये सूचना भारत को मिल गई और भारतीय सेना ने ऑपरेशन मेघदूत चलाया और सियाचिन भारत के बेस में से एक बन गया. सियाचिन ट्रांस-हिमालयन रीजन में सबसे बड़ा ग्लेशियर है. यह करीब 76 किलोमीटर का एक तिकोना ब्लॉक है.
पाकिस्तान दावा करता है कि सीजफायर लाइन (कराची 1949) और लाइन ऑफ कंट्रोल (शिमला 1972) समझौते के तहत सियाचिन ग्लेशियर जम्मू-कश्मीर का वह हिस्सा है, जो उसे मिला था. इस तरह से तो लाइन ऑफ कंट्रोल को 'एनजे9842' से उत्तर की तरफ काराकोरम पास तक जाना चाहिए, जहां भारत की सीमा चीन से मिलती है.
हालांकि, भारत मानता है कि 'एनजे9842' के आगे पर्वत शिखा उत्तर-पश्चिम दिशा की ओर बढ़ती है और सियाचिन ग्लेशियर के इंदिरा कोल पर जाकर खत्म होती है. इंदिरा कोल वह जगह है, जहां जम्मू और कश्मीर में पाकिस्तान द्वारा कब्जा की जमीन (1947) और चीन को तोहफे (1963) में दी गई जमीन मिलती है. मौजूदा लाइन ऑफ कंट्रोल जम्मू के मनावर से शुरू होकर काराकोरम पर्वत रेंज के ट्राई-जंक्शन पर इंदिरा कोल तक जाती है. भारत और पाकिस्तान की सेनाओं को लाइन ऑफ कंट्रोल के दोनों ओर 500 गज तक की जमीन पर जाने की इजाजत नहीं है.

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