प्रियंका गांधी का सोनभद्र दौरा- ज़रूरी या सियासी मजबूरी?
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प्रियंका गांधी का सोनभद्र दौरा- ज़रूरी या सियासी मजबूरी?

By Tv9bharatvarsh calender  20-Jul-2019

प्रियंका गांधी का सोनभद्र दौरा- ज़रूरी या सियासी मजबूरी?

सोनभद्र में 10 लाशें गिरीं तो यूपी की सियासी ज़मीन हिलने लगी. प्रियंका गांधी सबसे पहले वाराणसी पहुंचीं और ट्रॉमा सेंटर में घायलों से मिलीं लेकिन इसके बाद जैसे ही वो सोनभद्र में घटनास्थल की ओर बढ़ीं हंगामा बरपा हो गया. पहले से ही धारा 144 लागू थी. ऐसे में पुलिस को अपना काम करना था. कारों के काफिले को नारायणपुर में रोक दिया गया जिसके साथ ही प्रियंका धरने पर बैठ गईं.
काफी देर तक मीडिया के कैमरों ने उनके तेवर कैद किए. पुलिस ने उन्हें मनाना चाहा तो प्रियंका ने मांग रखी कि उन्हें 4 लोगों के साथ सोनभद्र जाने दिया जाए. इसके बावजूद उनकी सुनी नहीं गई. पुलिस ने प्रियंका गांधी समेत कई कांग्रेसियों को सरकारी गाड़ी में बैठाया और मिर्ज़ापुर के चुनार गेस्ट हाउस ले गए. इसी के साथ आग और फैल गई. राहुल गांधी की प्रतिक्रिया आते-आते कांग्रेस ने एलान कर दिया कि अब देशभर में आंदोलन होगा.
बहुत लोगों का मानना है कि चुकी हुई कांग्रेस को हौसला देने के लिए प्रियंका ने ये मौका चुना है. राहुल तो पहले ही पद छोड़ चुके हैं लेकिन प्रियंका अपने महासचिव पद पर कायम हैं. उन्हें कांग्रेस से यूपी को पूर्व में मज़बूत करने का दायित्व दिया गया था. चुनाव खत्म होने के बावजूद वो जिस तरह सोनभद्र जाने के लिए आगे आईं उससे लग रहा है कि वो कांग्रेसियों को संदेश देना चाहती हैं कि जिस तरह स्मृति ईरानी अपनी हार के बावजूद अमेठी में संघर्ष करती रहीं उसी तरह प्रियंका भी पूर्वी यूपी में सरगर्मी जारी रखनेवाली हैं. इधर यूपी की कई विधानसभा सीटों पर उपचुनाव भी होने हैं और ऐसे में बीजपी नहीं चाहेगी कि कांग्रेस सोनभद्र को मुद्दा बना ले.
उधर ऐसा नहीं कि यूपी सरकार आराम से बैठी है. खुद सीएम योगी आदित्यनाथ ने स्थिति की गंभीरता भांपते हुए प्रेस कॉन्फ्रेंस कर डाली. उनकी पूरी कोशिश थी कि वो डैमेज कंट्रोल कर लें. इसी सिलसिले में उन्होंने कहा कि घटना के लिए सीधे-सीधे कांग्रेस ज़िम्मेदार है. योगी ने 1955 और 1989 की कांग्रेस सरकारों पर ठीकरा फोड़ दिया. कहा कि सोनभद्र में जो घटना घटी है उसकी नींव 1955  में रखी गई थी. पूरे प्रकरण में ग्राम पंचायत की जमीन को 1955 में आदर्श सोसाइटी के नाम पर दर्ज कर किया गया था. इस जमीन पर वनवासी समुदाय के लोग खेती बाड़ी करते थे. बाद में इस जमीन को किसी व्यक्ति के नाम 1989 में कर दिया गया था. 1955 में कांग्रेस की सरकार थी.
अब योगी आदित्यनाथ हिंसा की घटना को ना रोक पाने की प्रशासनिक लापरवाही को सियासत में उलझा रहे हैं, मगर कम से कम हमले झेल रही सरकार के पैराकारों को कोई दलील तो उपलब्ध हो ही गई. ये तथ्य अपनी जगह है कि प्रशासन ने गिरफ्तारियों में तेज़ी बरती है जिस वजह से विरोधी दल सरकार को धीमी कार्यवाही का दोषी तो नहीं ही ठहरा पा रहे. योगी ने खुद ही ये मंज़ूर कर लिया कि अधिकारियों ने मामले में लापरवाही बरती है. इससे पहले कि विपक्षी आक्रामक होते योगी ने सीओ, एसडीएम और इंस्पेक्टर को सस्पेंड कर दिया. दस दिन में ज़ोन एडीजी से रिपोर्ट भी तलब कर ली.

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