कर्नाटक संकट: क्या सदस्यों का इस्तीफा देना एक अयोग्यता का मामला है? जानिए...
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कर्नाटक संकट: क्या सदस्यों का इस्तीफा देना एक अयोग्यता का मामला है? जानिए...

By Ichowk calender  16-Jul-2019

कर्नाटक संकट: क्या सदस्यों का इस्तीफा देना एक अयोग्यता का मामला है? जानिए...

कर्नाटक में राजनीतिक संकट पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा पक्षकारों को यथास्थिति बनाए रखने के लिए जब तक कि इसमें शामिल कानून के सवालों की जांच नहीं की जाती है, व्यावहारिक और सराहनीय कदम है. कोर्ट ने स्पीकर से विधायकों के इस्तीफे या उनकी अयोग्यता के मुद्दे पर फिलहाल निर्णय नहीं लेने के लिए कहा है. यह आदेश तब दिया गया जब कि इस प्रश्न पर फैसला किया जाना है कि क्या अदालत अध्यक्ष को इस तरह का निर्देश दे सकती है. अब यह संकेत देता है कि विधायकों को अयोग्य ठहराया जाने के बहाने उन्हें इस्तीफा देने से रोका जा सकता है.
अदालत में यह तर्क दिया गया कि विद्रोही विधायक त्यागपत्र देकर अयोग्य होने से बचने की कोशिश कर रहे हैं. परन्तु यह आश्चर्यजनक है, क्योंकि दलबदल के लिए व अन्य पार्टी में शामिल होने से पहले वर्तमान पद छोड़ना एक कानूनी और नैतिक दायित्व है. दलबदल निंदनीय है, खासकर यदि यह प्रक्रिया एक शासन को गिराने और दूसरा बनाने के लिए किया जाता है. लेकिन राजनेताओं को उनकी वर्तमान विधायकी स्थिति से नहीं निकलने देने के बहाने उनकी इच्छा के खिलाफ पार्टियों से बांधा नहीं जा सकता है. यहां तक कि अगर यह तर्क दिया जाता है कि दो विधायकों के खिलाफ अयोग्यता की कार्यवाही लंबित थी, तो बाकी के बारे में क्या? वे कहते हैं कि उन्होंने स्पीकर से मिलने की कोशिश की, लेकिन नहीं कर पाए.
इस्तीफे को अयोग्य का मामला मान लेना, एक सदस्य को अन्य पार्टी में शामिल होने से पहले विधानसभा में अपनी सीट छोड़ने के अधिकार को अस्वीकार करने का एक प्रयास माना जायेगा, भले ही क्रॉसिंग-ओवर एक राजनीतिक रूप से समीचीन उपाय हो. तर्क यह है कि एक अयोग्य सदस्य दोबारा चुने बिना मंत्री नहीं बन सकता है, जबकि जो इस्तीफा देता है उसे सदस्य बने बिना वैकल्पिक मंत्रिमंडल में शामिल किया जा सकता है. इस्तीफा स्वीकार करना स्वैच्छिक होने पर संतुष्ट होने का एक सरल कार्य है, जबकि साक्ष्य और जांच पर अयोग्यता का निर्णय लिया जाता है. दोनों को मिलाया नहीं जाना चाहिए. यह चल रही कार्यवाही एक संवैधानिक मुद्दों पर मुकदमेबाजी में तेजी से सामान्य प्रवृत्ति का प्रतिनिधित्व करती है.
संविधान के तहत अध्यक्ष को पहले से ही असाधारण अधिकार प्राप्त हैं. विधायी मामलों के लिए न्यायिक जांच से प्रतिरक्षा के अलावा, स्पीकर को अधिकारियों को यह तय करने का अधिकार है कि क्या किसी सदस्य ने दलबदल विरोधी कानून के तहत अयोग्यता का आरोप लगाया है. हालांकि यह निर्णय न्यायिक समीक्षा के अधीन है, लेकिन कई अध्यक्ष अयोग्य ठहराए जाने के मामलों पर कार्रवाई न करके चुप चाप बैठे रहे. यह प्रश्न कि क्या अध्यक्ष की निष्क्रियता को अदालत में चुनौती दी जा सकती है, यह मामला अन्य संविधान पीठ के समक्ष लंबित है. तेलंगाना, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु में स्पीकरों के उदाहरण हैं जहां वे वर्षों से अयोग्यता के सवालों पर चुप चाप बैठे रहे हैं. कर्नाटक में मौजूदा संकट ने इस तरह की पक्षपातपूर्ण कार्रवाई को एक नया आयाम दिया है.
कर्नाटक में राजनीतिक नाटक फिर से दल-बदल विरोधी कानून की समीक्षा की तत्काल आवश्यकता को सामने लाया है. दाल-बदल कानून 1985 में दलबदल कानून को 10वीं अनुसूची में शामिल किया गया. इस कानून के तहत यदि कोई विधायक जिस पार्टी के टिकट पर चुना जाता है, उस पार्टी को स्वेच्छा से छोड़ता है या फिर अपनी पार्टी के इच्छा के विपरीत जाकर वोट करता है तो उसे अयोग्य करार दिया जाएगा. यदि पार्टी नेतृत्व 15 दिनों के भीतर वोट या अवज्ञा को रद्द कर देता है तो विधायक को अयोग्य करार नहीं दिया जाएगा.
अयोग्य करार होने पर क्या होगा
अगर किसी भी विधानसभा सत्र के दौरान कोई विधायक अयोग्य करार दिया जाता है तो वह उस सत्र के दौरान चुनाव नहीं लड़ सकता है. हालांकि वह अगले सत्र में चुनाव लड़ने के योग्य है. यही नहीं ऐसे किसी भी सदस्य को मंत्री भी नहीं बनाया जा सकता है जब तक कि उसका कार्यकाल पूरा ना हो जाए.
त्यागपत्र और अयोग्य करार देने में अंतर
अगर कोई विधायक त्यागपत्र देता है तो फिर उसे सरकार में मंत्री बनाया जा सकता है और वह छह महीने के भीतर विधायिका के किसी भी सदन से वह निर्वाचित हो सकता है. परन्तु, अयोग्य करार दिए जाने पर नए चुनाव में फिर से चुने जाने से पहले वह मंत्री नहीं बनाया जा सकता है.
स्पीकर (अध्यक्ष) का अधिकार
दल-बदल कानून लागू करने के सभी अधिकार सदन के अध्यक्ष या सभापति को दिए गए हैं. मूल प्रावधानों के तहत अध्यक्ष के किसी निर्णय को न्यायालय की समीक्षा से बाहर रखा गया और किसी न्यायालय को हस्तक्षेप का अधिकार नहीं दिया गया. लेकिन सर्वोच्च न्यायालय ने नगालैंड के किरोतो होलोहन (1990) मामले में इस प्रावधान को खारिज कर दिया. न्यायिक सिद्धांतों का हवाला देते हुए न्यायालय ने कहा कि 'न्यायिक समीक्षा' भारतीय संविधान के मूल ढांचे में आती है, जिसे रोका नहीं जा सकता. ऐसा ही कुछ कर्नाटक में देखने को मिल रहा है.
कर्नाटक में सियासी घमासान के बीच कांग्रेस के 13 और जेडीएस के 3 तीन विधायकों को पार्टी विरोधी गतिविधियों में शामिल होने और पार्टी व्हिप को नहीं मानने के कारण अयोग्य करार दिया जा सकता है. गेंद अब स्पीकर केआर रमेश कुमार के पाले में है और अंतिम फैसला उन्हें ही लेना है.

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