विरासत में एक बार तो कुर्सी मिली, लेकिन फ्लॉप साबित हो रही हैं अगली पीढ़ियां
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विरासत में एक बार तो कुर्सी मिली, लेकिन फ्लॉप साबित हो रही हैं अगली पीढ़ियां

By News18 calender  09-Jul-2019

विरासत में एक बार तो कुर्सी मिली, लेकिन फ्लॉप साबित हो रही हैं अगली पीढ़ियां

राजनीतिक विरासत और परिवारवाद की बात अक्सर होती रहती है. राजनीतिक दल एक दूसरे पर अक्सर परिवारवाद का आरोप लगाते रहते हैं, लेकिन क्या विरासत में मिली पूंजी को संभलना इतना आसान है? वर्तमान राजनीतिक हालात को देखें तो इस सवाल का जबाब तलाशना मुश्किल नहीं है. मौजूदा समय में सामान्‍य तौर पर विरसात में मिली सत्ता को संभलने में अगली पीढ़ी सफल होती नहीं दिख रही है. हालांकि, इस दौर में जगन मोहन रेड्डी जैसे नेता भी हैं, जिन्होंने संघर्ष कर अपनी विरासत छिनी है. विरासत की राजनीति में सबसे पहले बात राजनीतिक संकट से गुजर रहे कर्नाटक की.करते हैं.
क्या बेटे की सरकार बचा पाएंगे देवगौड़ा?
कर्नाटक में एचडी देवगौड़ा ने बेटे एचडी कुमारस्वामी को जोड़-तोड़ करके मुख्यमंत्री तो बनवा दिया, लेकिन कर्नाटक सीएम की कुर्सी उनसे संभाले नहीं सभल रही है. पहले तो कुर्सी मिली ही बहुत मुश्किल से और जिस दिन से मिली हमेशा खतरा ही बना हुआ है. ऐसे में सवाल उठना लाजमी है कि क्या जोड़-तोड़ में माहिर देवगौड़ा की विरासत कुमारस्वामी संभाल पाएंगे? हालांकि, बेटे की कुर्सी बचाने की कोशिश में देवगौड़ा भी लगे हुए हैं. कुमारस्वामी जब अमेरिका में थे तो कमान देवगौड़ा ने ही संभाल रखी थी, लेकिन फिलहाल हालात बाप-बेटे से काबू होता नहीं दिख रहा है.
महाराष्ट्र में भी कमजोर हो रही विरासत की राजनीति
कर्नाटक से सटे महाराष्ट्र के हालात भी ज्‍यादा अलग नहीं हैं. भले ही लोकसभा चुनावों में शिवसेना ने जीत का परचम लहराया हो लेकिन बाला साहेब ठाकरे से उद्धव ठाकरे के हाथ में आते-आते शिवसेना कितनी कमजोर हुई है, इसका अंदाजा लगाना ज्‍यादा मुश्किल नहीं है. बाल ठाकरे के दौर में मातोश्री की हनक इतनी थी की विरोधी दल का मुख्यमंत्री भी फैसला लेने से पहले सोचता था कि इसपर बाल ठाकरे की क्‍या प्रतिक्रिया होगी? लेकिन, उद्धव के दौर में सत्ता में सहयोगी होने के बाद भी फैसलों में अनदेखी का आरोप लगना आम बात हो गई है. हालात यहां तक पहुंच गए हैं कि महाराष्ट्र की राजनीति में बड़े भाई की भूमिका निभाने वाली शिवसेना अब छोटे भाई की भूमिका में पहुंच गई है. कुछ यही हाल शरद पवार की एनसीपी का है. पवार के खराब स्वास्थ्य के कारण जब से पार्टी की कमान अघोषित रुप से सुप्रिया सुले और अजीत पवार के हाथ में आई है, पार्टी का वोट प्रतिशत और सीटें तेजी से घट रही हैं.
अखिलेश के हाथ में एसपी 5 सीटों पर पहुंची
राजनीति में परिवारवाद की बात मुलायम सिंह यादव की चर्चा के बगैर पूरा नहीं हो सकता है. यहां भी हालात अलग नहीं हैं. अखिलेश पिता मुलायम की विरासत को ठीक तरह से संभालते नहीं दिख रहे हैं. मुलायम ने वर्ष 2012 के चुनावों में अखिलेश को पूर्ण बहुमत का मुख्यमंत्री बनाया, लेकिन 2017 को विधानसभा चुनावों में सपा को बुरी हार का सामना करना पड़ा. वर्ष 2012 में अखिलेश यादव को समाजवादी पार्टी का चेहरा बनाने के बाद हुए दो लोकसभा चुनावों में पार्टी सिर्फ 5-5 सीटें ही जीत पाई हैं. उत्‍तर प्रदेश में भी आंकड़े यही गवाही दे रहे हैं कि बेटा बाप की राजनीतिक विरासत नहीं संभाल सका.
विधानसभा चुनावों में तेजस्वी की अग्नि परीक्षा
उत्तर प्रदेश से सटे बिहार में भी हालात ऐसे ही हैं. हालांकि, 2017 के विधानसभा चुनावों में जिस तरह राष्ट्रीय जनता दल ने प्रदर्शन किया उसके बाद लगा कि लालू यादव के छोट बेटे तेजस्वी उनकी विरासत को संभाल लेंगे. साल 2019 आते-आते परिवार के आपसी कलह ने तेजस्वी की नैया डुबो दी और लोकसभा चुनाव में पार्टी का खाता भी नहीं खुल सका.
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विरासत की राजनीति से बाहर निकलने की कवायद में लगी कांग्रेस

राजनीति में परिवारवाद पर सबसे ज्यादा हमले नेहरू-गांधी परिवार पर होते हैं, ऐसे में राहुल गांधी की चर्चा जरूरी है. कांग्रेस में पहली बार पार्टी को गांधी परिवार की विरासत से बाहर निकलने की कोशिश चल रही है. दिलचस्‍प है कि यह प्रयास गांधी परिवार का ही सदस्‍य कर रहा है. इंदिरा गांधी ने अपनी विरासत में राजीव को 1984 में प्रधानमंत्री की कुर्सी दी, लेकिन राजीव दोबारा वापसी नहीं कर सके. हालांकि, सोनिया गांधी ने जोड़-तोड़ कर 10 साल तक सरकार चला ली, लेकिन राहुल गांधी के हाथ में आते ही कांग्रेस का ग्राफ लगातार गिर रहा है. इन चुनावों में हालात बद से बदतर हो गए है. वर्ष 2019 के लोकसभा चुनावों के बाद तो राहुल गांधी भी मान चुके हैं कि उनके हाथों में कांग्रेस पार्टी बीजेपी से मुकाबला नहीं कर सकती है.
जगन ने बदला विरासत का नजरिया 
विरासत की राजनीति के अपवाद में जगन मोहन रेड्डी का नाम लिया जा सकता है. लेकिन, आंध्र प्रदेश के हालात अलग हैं. जगन के पिता राजशेखर रेड्डी भले ही कांग्रेस के बड़े नेता और आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे, लेकिन जगन को विरासत में न तो कांग्रेस पार्टी मिली और न ही मुख्यमंत्री की कुर्सी. जगन ने सिर्फ पिता के नाम के सहारे अपने संघर्षों से सत्ता हासिल की है.

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