गुरु गोलवलकरः 'नफ़रत के मसीहा' या हिंदू राष्ट्रवाद के सबसे बड़े झंडाबरदार?
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गुरु गोलवलकरः 'नफ़रत के मसीहा' या हिंदू राष्ट्रवाद के सबसे बड़े झंडाबरदार?

By Bbc calender  01-Jul-2019

गुरु गोलवलकरः 'नफ़रत के मसीहा' या हिंदू राष्ट्रवाद के सबसे बड़े झंडाबरदार?

अपनी मृत्यु से एक दिन पहले राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के पहले सरसंघचालक डॉक्टर केशव बलिराम हेडगेवार ने गोलवलकर को कागज़ की एक चिट पकड़ाई. जिस पर लिखा था, "इससे पहले कि तुम मेरे शरीर को डॉक्टरों के हवाले करो, मैं तुमसे कहना चाहता हूँ कि अब से संगठन को चलाने की पूरी ज़िम्मेदारी तुम्हारी होगी."
शोक के 13 दिनों बाद जब 3 जुलाई, 1940 को आरएसएस के चोटी के नेताओं की नागपुर की बैठक में हेडगेवार की इस इच्छा को सार्वजनिक रूप से घोषित किया गया तो वहाँ मौजूद सभी नेता अवाक रह गए. आरएसएस पर बहुत प्रमाणिक किताब लिखने वाले वॉल्टर एंडरसन और श्रीधर दामले अपनी किताब 'द ब्रदरहुड इन सैफ़रन' में लिखते हैं, "आरएसएस के नेता उम्मीद कर रहे थे कि हेडगेवार अपने उत्तराधिकारी के तौर पर एक अनुभवी और वरिष्ठ शख़्स को चुनेंगे."
"उस ज़माने में अप्पाजी जोशी, हेडगेवार के दाहिने हाथ समझे जाते थे. क़यास यही लगाए जा रहे थे कि वो ही डॉक्टर साहब के वारिस होंगे लेकिन उन्होंने सबको ग़लत साबित किया." बाद में कई हलकों में कहा गया कि गुरु गोलवलकर को उत्तराधिकारी चुनने में अन्य कारणों के अलावा एक कारण ये भी था कि गुरु गोलवलकर अंग्रेज़ी भाषा के अच्छे ज्ञाता थे.
संघ को राजनीति से दूर रहने की सलाह
19 फ़रवरी, 1906 को रामटेक में जन्मे गोलवलकर की निजी ज़िंदगी के बारे में सार्वजनिक रूप से बहुत कम सामग्री उपलब्ध है. 1929 में अपने एक साथी बाबू राव तेलंग को लिखे एक पत्र में उन्होंने अपनी निजी ज़िंदगी की एक झलक देते हुए लिखा था कि "वो एक ग़ुस्सैल पिता की एक रुष्ट संतान हैं और उनकी धमनियों में शुद्ध रक्त प्रवाहित हो रहा है."
वो तेलंग को ये भी बताते हैं कि किस तरह बीमारी के दौरान उन्होंने सिगरेट पीना शुरू कर दिया था और किस तरह नागपुर दंगों के दौरान उन्होंने अपने हाथों का इस्तेमाल किया था.
उन पर एक किताब 'एमएस गोलवलकर, द आरएसएस एंड इंडिया' लिखने वाले और हैदराबाद विश्वविद्यालय में राजनीति शास्त्र के प्रोफ़ेसर डॉक्टर ज्योतिर्मय शर्मा बताते हैं, "नागपुर में अपने हाथों का इस्तेमाल तो कई लोगों ने किया था. अगर आप उनकी विचारधारा से सहमत हैं तो आप कहेंगे कि वो 'नॉन गाँधियन क्रांतिकारी' थे."
"अगर आप उनसे सहमत नहीं है तो आप उन्हें दंगाई कहेंगे. इस तरह तो सावरकर ने भी नौ साल की उम्र में मस्जिद के ऊपर पत्थर मारे थे. मेरे विचार में इन सब चीज़ों का इतना महत्व नहीं है. सबसे महत्वपूर्ण बात ये है कि उन्होंने राजनीति को निम्न समझा."
"महाभारत का एक श्लोक है जिसे वो और उनके बाद के कई सरसंघचालक दोहराया करते थे अपने सार्वजनिक भाषणों में कि राजनीति वैश्याओं का धर्म है. उन्होंने संघ के सदस्यों को राजनीति से दूर रहने की सलाह दी. ये अलग बात है कि बाद के सरसंघचालकों ने देश की राजनीति को 'रिमोट कंट्रोल' से नियंत्रित करने में कोई गुरेज़ नहीं किया."
दुख में भी अविचलित
कहा जाता है कि आरएसएस के सभी सरसंघचालकों में उन पर सदाशिव गोलवलकर की छाप सबसे अधिक है. संघ के हलकों में उन्हें अभी तक स्वामी विवेकानंद की आध्यात्मिक विरासत के सबसे बड़े प्रतीक के रूप में पेश किया जाता है. इंदिरा गाँधी सेंटर ऑफ़ आर्ट्स के प्रमुख और वरिष्ठ पत्रकार रामबहादुर राय को उनसे कई बार मिलने का मौका मिला था.
रामबहादुर राय याद करते हैं, "एक बार मैंने उन्हें विरोध में एक पत्र लिखा था. गुरुजी पत्रों के जवाब देते थे. जब वो दौरे पर रहते थे जिसे आरएसएस की भाषा में प्रवास कहते थे, वो मुख्यालय लौट कर हर पत्र का उत्तर देते थे." 
"नागपुर में सीढ़ियाँ चढ़ कर सरसंघचालक का एक कमरा होता था. डॉक्टर आवाजी थट्टे उनके सचिव हुआ करते थे जो पेशे से डॉक्टर थे. पहली बार मैंने गुरुजी को 1968 में देखा था जब जनसंघ के अध्यक्ष दीनदयाल उपाध्याय की हत्या हो गई थी." "गुरुजी इलाहाबाद में थे. वहाँ से वो सीधे मुग़लसराय उस स्थान पर गए जहाँ दीनदयाल उपाध्याय का शव पोस्टमॉर्टम के लिए रखा हुआ था. मैंने देखा कि वहाँ पर सब लोग रो गा रहे थे लेकिन वो अविचलित थे."
भारत छोड़ो आंदोलन से गोलवलकर की दूरी
गुरु गोलवलकर के कार्यकाल का सबसे विवादित फ़ैसला था 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन से संघ को पूरी तरह से अलग-थलग रखना. उनके इस फ़ैसले को लेकर संघ की आजतक आलोचना की जाती है. लेकिन इस फ़ैसले के पीछे उनके अपने तर्क थे.
मशहूर किताब 'आरएसएस-आइकन्स ऑफ़ इंडियन राइट' लिखने वाले नीलांजन मुखोपाध्याय बताते हैं, "मैं आपको याद दिलाना चाहता हूँ कि 1930-31 में भी जब गांधी ने दांडी यात्रा के बाद असहयोग आँदोलन चलाया था, उसमें भी हेडगेवार ने आरएसएस को हिस्सा लेने की अनुमति नहीं दी थी."
"उन्होंने कहा था कि अगर स्वयंसेवक चाहें तो अपनी निजी हैसियत से उस आंदोलन में शामिल हो सकते थे. उन्होंने खुद जंगल सत्याग्रह में भाग लेने से पहले सरसंघचालक का पद छोड़ दिया था और अपनी जगह परांजपे को कार्यवाहक सरसंघचालक बना दिया था."
"गोलवलकर ने भारत छोड़ो आँदोलन में भाग न लेने का फ़ैसला उसी तर्ज़ पर लिया था. उपनिवेषवाद का विरोध करना राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का मुख्य लक्ष्य नहीं था. वो चाहते थे कि वो हिंदू समाज को मज़बूत करें, ताकि उनकी नज़रों में मुसलमानों ने हिंदू समाज का जो अपमान किया, उसका वो बदला ले सके."
"उनका मानना था कि अगर हम अंग्रेज़ों को किसी कारण से नाराज़ करेंगे तो उनके हिंदू ध्रुवीकरण के उद्देश्य पर आँच आएगी और अंग्रेज़ उनके ख़िलाफ़ हो जाएंगे और मुसलमानों के ख़िलाफ़ हिंदुओं को खड़ा करने की उनकी मुहिम को धक्का लगेगा."
गांधी की हत्या के बाद संघ पर प्रतिबंध
आरएसएस के अस्तित्व पर सबसे बड़ा संकट तब आया जब गाँधी की हत्या के बाद आरएसएस पर प्रतिबंध लगा दिया गया. गोलवलकर उस समय चेन्नई (तब मद्रास) में थे जब गाँधीजी की हत्या का समाचार उन तक पहुंचा.
सीपी भिषीकर गोलवलकर की जीवनी में लिखते हैं, "उस समय गोलवलकर के हाथ में चाय का प्याला था, जब किसी ने उन्हें गाँधी की हत्या का समचार दिया. चाय का प्याला रखने के बाद गोलवलकर बहुत समय तक कुछ भी नहीं बोले." "फिर उनके मुंह से एक वाक्य निकला, 'कितना बड़ा दुर्भाग्य है इस देश का!' इसके बाद उन्होंने अपना बाक़ी का दौरा रद्द कर दिया और पंडित नेहरू, सरदार पटेल को संवेदना का तार भेज कर वापस नागपुर आ गए."
गोडसे चाहते थे संघ और सावरकर को जोड़ना
1 फ़रवरी, 1948 की आधी रात को नागपुर पुलिस ने गुरु गोलवलकर को गांधी की हत्या का षडयंत्र रचने के आरोप में गिरफ़्तार कर लिया.
पुलिस जीप की तरफ़ जाते हुए उन्होंने अपने समर्थकों से कहा था, "संदेह के बादल जल्द ही छँट जाएंगे और हम बिना किसी दाग़ के बाहर आएंगे."
उस बीच उनके एक एक सहयोगी भय्याजी दानी ने आरएसएस की सभी शाखाओं को तार भेजा, "गुरुजी गिरफ़्तार. हर कीमत पर शांत रहें."
छह महीने बाद आरएसएस से प्रतिबंध हटा लिया गया और गोलवलकर रिहा हो गए. लेकिन इस तथ्य ने आरएसएस को बहुत नुक़सान पहुंचाया कि एक समय नाथूराम गोडसे आरएसएस के सदस्य हुआ करते थे.
ज्योतिर्मय शर्मा बताते हैं, "गोडसे आरएसएस से निकल चुके थे और वो सावरकर और गोलवलकर के बीच एक तरह का सामंजस्य बैठाने की कोशिश कर रहे थे. मुश्किल ये थी कि सावरकर तीस के दशक के बाद हिंदुओं का नेता बनने के लिए तैयार थे."
"गोलवलकर का मत था कि सारा देश हिंदू है तो आप हिंदुओं का प्रतिनिधित्व कैसे कर सकते हैं दूसरी बात ये थी कि सावरकर का मत था कि बिना राजनीति के कोई भी चीज़ संभव नहीं है, जबकि गोलवलकर जब तक रहे संघ का यही मत रहा कि उसके लोग राजनीति में अपने हाथ गंदे नहीं करेंगे."
प्रतिबंध के दौरान संघ का साहसपूर्ण नेतृत्व
जेल से बाहर आने के बाद गोलवलकर ने संघ के संगठन के आधार को विस्तार देने का बीड़ा उठाया.
राम बहादुर राय बताते हैं, "प्रतिबंध वाला समय सचमुच संघ के लिए जीवन मरण का प्रश्न था. उस समय संघ के विरोध में वातावरण जागा था. कांग्रेस, समाजवादी और कम्यूनिस्ट में ज़्यादातर मानते थे कि गाँधीजी की हत्या संघ के कारण हुई है."
"इसलिए संघ के कार्यालयों पर बहुत हमले हुए. एक घटना गुरुजी से भी संबंधित है. उनकी गिरफ़्तारी से पहले जहाँ वो रहते थे, वहाँ भारी हमले का अंदेशा था. लोगों ने कहा कि आप ये स्थान छोड़ दीजिए. छिपने के लिए दूसरे स्थान पर चले जाइए."
"परंतु उन्होंने ने कहा कि वो भागेंगे नहीं. लेकिन हमले से पहले ही उनकी गिरफ़्तारी हो गई. सरदार पटेल को भी जाँच के बाद समझ में आया कि गाँधी की हत्या में संघ का हाथ नहीं था. उन्होने नेहरू को समझाया और जुलाई 1949 को संघ से प्रतिबंध उठा लिया गया. इस बीच गुरुजी ने संघ का बहुत साहसपूर्ण नेतृत्व किया."
मुसलमानों के धुर विरोधी
गोलवलकर की सबसे बड़ी आलोचना हुई मुसलमानों के उनके ज़बरदस्त विरोध के कारण. आख़िर गोलवलकर के मुस्लिम विरोध के पीछे मूल आधार क्या था?
इस सवाल पर ज्योतिर्मय शर्मा का जवाब था, "एक तो ये कि वो हमसे अलग हैं. इस्लाम का जन्म हिंदुस्तान में नहीं हुआ. ये धरती सिर्फ़ हमारी है. सावरकर का जो मातृभूमि, पितृ भूमि और पुण्य भूमि वाला जो सिद्धाँत है, गोलवालकर उसे मानते थे." "गोलवलकर कहते भी थे कि उन्हें कोई आपत्ति नहीं है कि मुसलमान जुमे की नमाज़ अता करें या मस्जिद बनाएं अगर वो मानें कि वो हिंदू सभ्यता की उत्पत्ति हैं. वो ये भी कहते हैं कि भले ही आप अपना पहला नाम मुस्लिम रख ले, लेकिन सर नेम हिंदू रखें."

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