कांशीराम के ख्वाब पर माया का मोह हावी!
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कांशीराम के ख्वाब पर माया का मोह हावी!

By Ichowk calender  30-Jun-2019

कांशीराम के ख्वाब पर माया का मोह हावी!

ताज कॉरीडोर का मामला हो या आय से अधिक संपत्ति का मामला, महात्मा बुद्ध, कांशीराम, गाड़गे महाराज, कबीरदास, संत रविदास या फिर इन सबसे भी आगे खुद की मूर्तियां बनवाने का मसला हो, कई बार उनका दामन भ्रष्टाचार के छींटों से दागदार हुआ. लेकिन 23 जून 2019 को जब उन्होंने अपने भाई आनंद और भतीजे आकाश को पार्टी के प्रमुख पद सौंपे तो दलितों की एकमात्र पार्टी के दामन पर कांशी की माया ने परिवारवाद का धब्बा भी लगा दिया. तो क्या जिस चमचा युग का जिक्र कांशीराम ने अपनी किताब 'एन एरा ऑफ स्टूजेज' में किया था, उसको मायावती ने एक कदम आगे बढ़ा दिया? तो क्या मायावती अब सिर्फ एक 'नेता' हैं, दलितों की मसीहा नहीं!
परिवारवाद की विषबेल से कांशी की माया विषैली हो गई
कांशीराम ने ठीक 24 साल पहले उत्तर प्रदेश की एक सभा में लोगों को संबोधित करते हुए कहा था, ''मैं काफी समय से उत्तर प्रदेश में बहुत कम आ रहा हूं. लेकिन खुशी की बात है कि मेरी इस गैरहाजिरी को कुमारी मायावती ने मुझे महसूस नहीं होने दिया.'' कांशीराम ने अपने किसी सगे संबंधी को अपना उत्तराधिकारी बनाने की जगह मायावती को अपना उत्तारधिकारी घोषित किया. वंचित तबके की सियासत को वंशवाद या परिवारवाद से परे रखकर कांशीराम ने एक मिसाल पेश की. ज्योतिराव फूले, बाबा भीमराव आंबेडकर, छत्रपति शाहू की तरह दलितों को मुख्यधारा में शामिल करने के ख्वाब को कांशीराम ने आगे बढ़ाया और मायवती इसे आगे बढ़ाएंगी इस उम्मीद के साथ उन्हें अपना उत्तराधिकारी बनाया. लेकिन तीन दशक से पहले ही मायावती ने उनके ख्वाबों को श्रृद्धांजलि दे दी.
जब मायावती अपने भाई आनंद और भतीजे आकाश को पार्टी की अहम जिम्मेदारियां सौंप रहीं थी उसी वक्त 'राम' का ख्वाब दम तोड़ रहा था. कांशीराम के करीबी उन्हें प्यार से 'राम' भी कहते थे. 23 जून, 2019 को भतीजे आकाश आनंद को उन्होंने बहुजन समाज पार्टी (बसपा) का राष्ट्रीय संयोजक और भाई आनंद को राष्ट्रीय उपाध्यक्ष घोषित किया.
माया 'मोह' में पड़ती गईं और कांशी का ख्वाब टूटता गया
चार बार उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री रह चुकीं मायावती ने 2007 से 2012 तक अपना कार्यकाल पूरा किया. लेकिन 2012 के बाद हुए विधानसभा चुनाव में मायावती लगातार प्रदेश की सियासत से अपनी पकड़ खोती गईं. 2017 में तो प्रदेश में एक भी सीट पर उनकी पार्टी जीत दर्ज नहीं करा सकी. हालांकि 2019 के लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी (सपा) के साथ गठजोड़कर 10 सीटों पर कब्जा करने में सफल रहीं. सियासत के जानकारों ने जैसे कयास लगाए ठीक वैसा ही हुआ. इधर सीटें मिलीं उधर गठबंधन टूटने लगा. आखिरकार मायावती ने कई आरोप लगाने के बाद अपने भतीजे को बाय-बाय कह दिया.
दलितों की मसीहा बनने से लेकर भ्रष्टाचार में नाम उछलने तक तक मायावती का सफर अब उन्हें इस मोड़ पर ले आया है कि वे दलितों के उस श्रेणी के नेताओं में शामिल हो गईं जिन्हें कभी कांशीराम ने 'चमचा' कहा था. 'रामविलास पासवान' और 'जगजीवन राम' को कांशीराम ने चमचा नेता की श्रेणी में रखा था. ये ऐसे नेता थे जो दलित तो थे लेकिन मुख्यधारा की राजनीति में जाने के बाद यह बहुसंख्यक नेताओं के पिछलग्गू बन गए यानी चमचा बन गए.
दरअसल 24 सितंबर 1984 को कांशीराम ने एक किताब प्रकाशित की, 'एन एरा ऑफ स्टूजेज' या 'चमचा युग'. पूना पैक्ट होने के ठीक 50 साल बाद. पूना पैक्ट जिसने गांधी को दलितों का 'खलनायक' बना दिया. दरअसल दलित समुदाय को इसी दिन अपने वास्तविक प्रतिनिधि चुनने के अधिकार से वंचित किया गया था. हिंदुओं द्वारा नामित प्रतिनिधियों को दलितों पर थोपा गया. ये थोपे गए प्रतिनिधि हिंदुओं के औजार या चमचे के रूप में कार्य करने करने लगे. कांशीराम का मानना था कि 24 सितंबर 1932 से दलितों को चमचा युग में ढकेल दिया गया. चमचा युग के पचास वर्ष पूरे होने पर कांशीराम ने अपनी किताब प्रकाशित कर एक बार फिर दलितों को याद कराया कि कैसे ऊंची जाति के लोगों ने उनके हक पर हमला बोला, कैसे राष्ट्रपिता कहलाने वाले महात्मा गांधी भी दलितों के खिलाफ उठ खड़े हुए.
दरअसल आंबेडकर ने पूना पैक्ट में दलितों को दो मतों का अधिकार और हिंदुओं से अलग दलित उम्मीदवार के निर्वाचन के हक के लिए आंदोलन छेड़ रखा था. आंबेडकर के आंदोलन का ही असर था कि पूना पैक्ट में लगभग उनकी इस मांग को मान भी लिया गया. लेकिन तभी महात्मा गांधी ने भीमराव की इस मांग के खिलाफ आमरण अनशन छेड़ दिया. आंबेडकर गांधी के आमरण अनशन के सामने कमजोर पड़ गए और मांग छोड़ दी.
उस समय गांधी का प्रभाव समाज पर बहुत ज्यादा था. अगर गांधी आमरण अनशन नहीं छोड़ते तो समाज में एक नया आंदोलन छिड़ सकता था. ऐसे में आंबेडकर के सामने झुकने के सिवाए कोई विकल्प नहीं था. लेकिन मायावती के सामने दलितों का उद्धार करने और वंशवाद की राजनीति के खिलाफ आंदोलन करने का मौका था, जिसे माया ने राजनीतिक और संबंधों के मोह में पड़कर खो दिया.
 

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