इंसेफ़ेलाइटिस से मरने वालों में कुपोषण के शिकार और दलित बच्चे ज़्यादा क्यों?
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इंसेफ़ेलाइटिस से मरने वालों में कुपोषण के शिकार और दलित बच्चे ज़्यादा क्यों?

By Satya Hindi calender  25-Jun-2019

इंसेफ़ेलाइटिस से मरने वालों में कुपोषण के शिकार और दलित बच्चे ज़्यादा क्यों?

बिहार में इंसेफ़ेलाइटिस से 145 से ज़्यादा बच्चों की मौत से कई सवाल खड़े हो गए हैं। यह सवाल उठना लाज़िमी है कि गरीब घरों के कुपोषण ग्रस्त बच्चों की मौत अधिक क्यों हुई है। मरने वालों में दलित घरों के बच्चे ही अधिक क्यों है। यह बिहार सरकार और पूरे देश की स्वास्थ्य व्यवस्था को तो कटघरे में खड़ा करता ही है, उस व्यवस्था पर भी सवाल खड़े करता है जिसमें ग़रीब और ग़रीब होते हैं, साथ ही ग़रीबों को राज्य या राजनीति से कोई ख़ास सहारा नहीं मिलता है।

बिहार में फैले अक्यूट इंसेफ़ेलाइटिस सिन्ड्रम यानी एईएस से मरने वाले बच्चों में सबसे ज़्यादा मुज़फ़्फ़रपुर के तीन ब्लॉक से हैं, ये हैं, काँटी, मुसहरी और मीनापुर। राज्य के 40 में से 20 ज़िलों में फैली इस बीमारी की चपेट में 600 से अधिक बच्चे आए हैं।

दैनिक भास्कर के मुताबिक़,  एक बात साफ़ नज़र आई कि इस रोग से सबसे ज़्यादा प्रभावित वे परिवार ही हुए, जिनकी सामाजिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी कमज़ोर है।
इंसेफ़ेलाइटिस के ज्यादातर रोगी कुपोषण के शिकार हैं। साफ़ सफ़ाई का इंतजाम नहीं है, गंदगी के बीच रहते हैं। इनमें से ज़्यादातर दलित परिवारों के हैं। सवाल उठता है, ऐसा क्यों है?
काँटी के दरियापुर, बेड़ियाही नारापुर ही नहीं, मीनापुर के राघोपुर, पानापुर, मदारीपुर, गंज बाजार, झोंझा, नून छपरा, देवरिया के विशुनपुर, कटरा के बेरई, मोतीपुर के बर्जी, सकरा के राजापाकर आदि गांवों में भी दलित, पिछड़े समाज के लोगों की स्थिति काफी दयनीय है। 

न शौचालय, न पीने का पानी
मीनापुर धोरिया गांव में न तो शौचालय और न ही पीने का पानी है। गांव के लोग फूस के घर, बगीचे और सड़क किनारे रहते हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पसंदीदा और बहु-प्रचारित स्वच्छ भारत अभियान के बावजूद मीनापुर, काँटी और मुशहरी के ज़्यादातर गाँवों में शौचालय नहीं हैं। शौचालय का न होना इंसेफ़ेलाइटिस फैलने का बड़ा कारण माना जाता है। 
यह अकारण नहीं है कि सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और राज्य सरकारों को नोटिस देकर कहा है कि वे एक हफ़्ते के अंदर राज्य की जन स्वास्थ्य व्यवस्था, कुपोषण और साफ़ सफ़ाई पर रिपोर्ट दें। जस्टिस संजीव खन्ना और बी. आर. गवई के खंडपीठ ने यह आदेश दिया है। 
अदालत ने राज्य सरकार को यह निर्देश भी दिया कि प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों पर ज़रूरी सुविधाएँ मुहैया कराई जाएँ ताकि बच्चों का इलाज अपने घर के नज़दीक ही हो जाए। ज़िला मुख्यालयों तक पहुँचने और सरकारी अस्पतालों में दाखिल करने में लगने वाले समय की वजह से भी मौतें हुई हैं।
​​​​​​​कुपोषण बड़ा कारण
लेकिन इसके साथ यह भी सच है कि कुपोषण बड़ा कारण है। मरने वाले बच्चों में कुपोषण के शिकार बच्चे अधिक हैं। साफ़ है कि कुपोषण की वजह से आसानी से रोग की चपेट में आ गए। शायद इसी कारण से कोर्ट ने कुपोषण पर भी रिपोर्ट देने को कहा है। 
इसके पहले राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने भी स्वास्थ्य सेवा की चिंताजनक ढाँचागत सुविधाओं की वजह से बिहार सरकार और केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय को निर्देश जारी किए थे। आयोग ने बिहार में इंसेफ़ेलाइटिस की वजह से होने वाली मौतों का स्वत: संज्ञान लेकर यह नोटिस जारी किया था। 
सवाल यह है कि यह स्थिति क्यों हुई और इसके लिए कौन ज़िम्मेदार है। सुशासन बाबू कहे जाने वाले मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने बीमारी फैलते और मौत की ख़बरें आने के तुरन्त बाद मुज़फ़्फ़रपुर का दौरा क्यों नहीं किया? उन्होंने केंद्र सरकार और दूसरे राज्यों की मदद लेकर स्थिति पर काबू पाने की तुरत कोशिश क्यों नहीं की, यह सवाल लाज़िमी है। 
 
सबसे ज़्यादा मौतें मुशहरी, काँटी और मीनापुर में
इंसेफ़ेलाइटिस से वैसे तो मुजफ्फरपुर के सभी ब्लॉक प्रभावित हैं, पर सबसे ज़्यादा प्रभावित इलाक़े मुशहरी, कांटी और मीनापुर ब्लॉक हैं। 164 बच्चों में से तकरीबन 50% मौतें इन प्रखंडों में हुई। मुख्यमंत्री को सौंपी रिपोर्ट में 17 जून तक आंकड़े दिए गए थे। इनमें सिर्फ एसकेएमसीएच में 69 मौतें दिखाई बताई गईं। इनमें 34 बच्चों की मौत इन तीनों ब्लॉक से हैं।

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