जुलाई के पहले हफ्ते से ही TCS में छंटनी की शुरुआत
TCS के CEO K. Krithivasan का कहना है कि यह फैसला स्किल-मिसमैच और deployment challenges के चलते लिया गया है। जुलाई के पहले हफ्ते से ही TCS में छंटनी की शुरुआत हो चुकी थी। Mint की एक रिपोर्ट अनुसार 24 से 55 साल के आयु वर्ग के एम्प्लॉयीज को बेंगलुरु, लंदन और प्रिंसटन जैसे लोकेशन्स से निकाला गया। इनमें अनडेप्लॉय एम्प्लॉयी और Work From Office index में फेल हुए एम्प्लॉयी शामिल थे। TCS ने बिजनेस हेड्स को एक सूची बनाने के लिए कहा है जिसमें वे उन एम्प्लॉयीज का नाम लिखा हो जिन्हें पिंक स्लिप दी जा सकती है। पिंक स्लिप का मतलब होता है नौकरी से निकाले जाने का नोटिस। जब कोई कंपनी किसी एम्प्लॉयी को बताती है कि अब उसकी ज़रूरत नहीं है और उसे नौकरी छोड़नी होगी, तो उस सूचना को पिंक स्लिप कहा जाता है। ये शब्द अमेरिका से आया है, जहाँ पहले कंपनियाँ नौकरी से निकालने के लिए एक गुलाबी रंग की चिट्ठी दिया करती थीं। वहीं से ये चलन शुरू हुआ। आज भी कॉरपोरेट और IT सेक्टर में जब कोई कहता है कि उसे पिंक स्लिप मिल गई, तो इसका मतलब होता है कि उसकी नौकरी चली गई है। अब इसी पिंक स्लिप यानी नौकरी से निकालने को भारत की IT कंपनियों ने एक ट्रेंड बना लिया है। पिछले कुछ सालों में IT कंपनियों ने हज़ारों एम्प्लॉयीज को नौकरी से निकाला है।
Infosys, TCS, Wipro, Tech Mahindra ने 67,000 से ज़्यादा एम्प्लॉयीज को निकला
साल 2023 का डेटा देखिए, Infosys, TCS, Wipro और Tech Mahindra ने कुल मिलाकर 67,000 से ज़्यादा एम्प्लॉयीज को नौकरियों से निकाल दिया। इसमें सबसे ज़्यादा छंटनी Infosys ने की, जहां 24,182 एम्प्लॉयीज को कंपनी से बाहर किया गया। Wipro ने 21,875 को, TCS ने 10,818 को और Tech Mahindra ने 10,669 एम्प्लॉयीज को। अब दो साल बाद TCS एक बार फिर से यही प्रक्रिया दोहरा रही है। अगर आपको लग रहा है कि ये कम्पनियाँ एम्प्लॉयीज को इस लिए निकाल रही हैं कि इनका रेवन्यू घट रहा है या बाज़ार में मंदी है, तो ऐसा बिल्कुल नहीं, इन कंपनियों के इसी तिमाही के नतीजे बताते हैं कि कारोबार में कोई गिरावट नहीं है। TCS ने अप्रैल-जून 2025 की तिमाही में 63,437 करोड़ रुपए की कमाई दिखाई, जो पिछले साल से 1.3 प्रतिशत ज़्यादा है। TCS का मुनाफ़ा भी 5.9 प्रतिशत बढ़ा। TCS के अलावा बाक़ी और IT कंपनियों का देखें तो उन्होंने भी ग्रोथ दर्ज की है। Infosys का रेवेन्यू 7.5 प्रतिशत बढ़कर 42,279 करोड़ रुपए तक जा पहुँचा है, और HCLTech ने तो 8.1 प्रतिशत की ग्रोथ की है। यानी इनका धंधा मंदा नहीं फर्स्ट क्लास चल रहा है। अब आपके मन में सवाल आ रहा होगा कि जब रेवेन्यू ऊपर जा रहा है तो एम्प्लॉयी क्यों घटाए जा रहे हैं? इसका क्या मतलब है? इसके आसान से दो जवाब हो सकते हैं। पहला तो जैसा की कम्पनियाँ कह रही हैं वो खुद को “फ्यूचर रेडी” ऑर्गेनाइजेशन बनाना चाहती हैं।
AI में इन्वेस्ट कर रही TCS जैसी बड़ी IT कंपनियाँ
आज का कॉरपोरेट वर्ल्ड बहुत तेज़ी से बदल रहा है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी AI अब सिर्फ एक्सपेरिमेंट नहीं रहा, बल्कि कंपनियों के काम करने के तरीके का हिस्सा बनता जा रहा है। TCS जैसी बड़ी IT कंपनियाँ अब भारी मात्रा में AI में इन्वेस्ट कर रही हैं नए टूल्स, ऑटोमेशन, मशीन लर्निंग मॉडल्स, और ऐसे सिस्टम जो कम लोगों से ज़्यादा काम करवा सकें। अब इस इन्वेस्टमेंट के लिए पैसा चाहिए, और सबसे आसान तरीका है उस खर्च को कम करना जो रिटर्न नहीं दे रहा, यानी उन एम्प्लॉयीज को बाहर का रास्ता दिखाना जो फिलहाल किसी प्रोजेक्ट पर नहीं लगे हुए हैं। IT कंपनियों की भाषा में इन्हें कहते हैं “बेंच पर बैठे एम्प्लॉयीज़” यानी ऐसे लोग जो कंपनी में हैं लेकिन किसी काम में फिलहाल यूज़ नहीं हो रहे। पहले ऐसे एम्प्लॉयीज को कुछ महीनों तक रखा जाता था कि शायद आगे कोई प्रोजेक्ट आ जाए, लेकिन अब कंपनियाँ इतनी मोहलत नहीं दे रहीं। उनका कहना है कि AI के ज़माने में उन्हें lean and efficient टीम चाहिए, यानी कम लोग हों, लेकिन ज़्यादा काम करने वाले हों। इसलिए अनडेप्लॉय एम्प्लॉयीज को रिलीज़ किया जा रहा है यानी उनको पिंक स्लिप दी जा रही है ताकि कंपनी का खर्च घटे और जो पैसा बचे, वो नई टेक्नोलॉजी पर लगाया जा सके।
TCS ने हाल ही में 5000 से ज़्यादा फ्रेशर हायर किए
अब ये कहानी पहली बार सुनने में तो बहुत ऑथेंटिक लगती है कि कम्पनियाँ AI को तरजीह दे रही हैं। इसलिए ये अपने पुराने एम्प्लॉयीज को फायर कर रही हैं। लेकिन इसमें एक झोल है, झोल TCS ने हाल ही में 5000 से ज़्यादा फ्रेशर हायर किए। यानी एक तरफ़ कंपनी कह रही है कि उसे लेऑफ़ करके पैसे बचाने हैं ताकि AI में इन्वेस्ट कर सके दूसरी तरफ़ वो ही कंपनी बड़ी संख्या में हायरिंग कर रही है। भला ये कैसी पैसे की बचत है? इसका मतलब AI के नाम पर मिड और सीनियर ग्रेड एम्प्लॉयीज का लेऑफ़ करना झूठ था। और इसके पीछे कोई अलग कारण है। जवाब है “शायद हाँ” कारण क्या है, वो समझिए। आज से तक़रीबन एक दशक पहले, यानी साल 2013-14 के आसपास जब कोई इंजीनियरिंग का छात्र कॉलेज से पासआउट होता था, तो Infosys, Wipro, TCS जैसी बड़ी कंपनियों में उसे 2 लाख से 2.5 लाख रुपए सालाना का पैकेज मिलता था। और अब, जब हम 2025 में खड़े हैं हालत ये है कि वही पैकेज आज भी जारी है।
यानि एक पूरा दशक गुजर गया, लेकिन फ्रेशर्स की सैलरी में कोई बड़ा बदलाव नहीं आया। इस दौरान देश में पेट्रोल 50 से 100 पार हो गया, घर का किराया और ग्रॉसरी की कीमतें दोगुनी हो गईं, लेकिन इन कंपनियों में एंट्री-लेवल की नौकरी करने वाले इंजीनियर्स की तनख्वाह वहीं अटकी रही 2 लाख से 2.5 लाख रुपए के बीच। इतने सालों में IT इंडस्ट्री ने कितनी तरक्की की क्लाउड सर्विसेज़, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस हर चीज़ में। लेकिन इस ग्रोथ में अहम भूमिका निभाने वाले फ्रेशर्स को इनाम में क्या मिला? वही पुरानी तन्ख्वाह, वही पुरानी शर्तें। यानी 18 से 25 हज़ार की मंथली सैलरी में 2 साल तक का करार करा लिया जाता है।
असल में इन बड़ी कंपनियों ने इस stagnant salary को एक तरह का बिजनेस मॉडल बना लिया है। वो जानते हैं कि देश में बेरोज़गारी का स्तर कितना बड़ा है। ये कम्पनियाँ जब भी 2 लाख के आस पास का ऑफर लेकर कॉलेजों में जाती हैं तो हज़ारों छात्र लाइन में खड़े मिलतें हैं। ये कंपनियाँ इस बात का फायदा उठाती हैं। competition इतना है कि छात्र कुछ भी झेलने को तैयार हैं। ये छात्र 3 से 4 महीने की ट्रेनिंग के बाद कंपनियों के खूब काम आते हैं और मिड और सीनियर ग्रेड एम्प्लॉयीज की तनख्वा के एक चौथायी हिस्से में वो ही काम करते हैं। जब ये 4 से 5 साल तक इन IT कंपनियों में मेहनत करने के बाद सीनियर ग्रेड पर पहुंचते हैं तो एक बार फिर यही प्रोसेस दोहरायी जाती है। मिड और सीनियर ग्रेड के एम्प्लॉयीज को बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता है और कम सैलरी पर काम करने वाले फ्रेशर्स को हायर किया जाता है। इस प्रोसेस को कम्पनियाँ हर बार अलग अलग बहानों से जायज़ ठहराती है। बार बार छँटनी का नतीजा ये है कि नौकरी अब ‘करियर’ कम, और एक ‘प्रोजेक्ट-टू-प्रोजेक्ट कॉन्ट्रैक्ट’ ज़्यादा बनती जा रही है। जो पहले हमें ऐसा सिर्फ़ GIG इकॉनमी में देखने को मिलता था। लेकिन अब ये White Collar नौकरियों में भी हो रहा है।
TCS ने 12,000 से ज़्यादा लोगों को निकाल दिया
IT सेक्टर हो या डिजिटल मार्केटिंग, डेटा एनालिटिक्स हो या कंटेंट हर जगह full-time की जगह contractual, hourly या project-based hiring आम होती जा रही है। पहले कंपनियां “permanent employee” रखती थीं, जिन्हें PF, मेडिकल, छुट्टियों और ग्रेच्युटी जैसी सुविधाएं मिलती थीं। अब यही कंपनियां उन्हीं कामों के लिए contract पर लोग रख रही हैं तीन महीने, छह महीने या सिर्फ एक प्रोजेक्ट के लिए। इससे HR cost घट जाती है और liability भी नहीं रहती। इस बदलाव के पीछे तर्क ये दिया जा रहा है कि “skill-based micro-tasking” का दौर है। यानी अगर कोई बंदा किसी खास software या tool में निपुण है, तो उसे सिर्फ उसी काम के लिए रखा जाए। ना सालभर की नौकरी, ना बेकार की ट्रेनिंग। एक टास्क दो, पैसे दो, काम खत्म। अब बात बस इतनी नहीं है कि TCS ने 12,000 से ज़्यादा लोगों को निकाल दिया।
बात ये है कि ये एक ट्रेंड बन चुका है। बड़े-बड़े ब्रांड्स जो सालों से नौकरी की सुरक्षा और भरोसे का नाम माने जाते थे अब वही कंपनियाँ हर दो-तीन साल में एक नया बहाना लेकर लोगों को बाहर का रास्ता दिखा रही हैं। कभी AI, कभी स्किल गैप, कभी बिज़नेस री-अलाइनमेंट। मगर असल में हो क्या रहा है? पुरानी और महंगी वर्कफोर्स हटाओ, सस्ती और नई ले आओ। इस स्थिति के पीछे कहीं न कहीं सरकार भी जिम्मेदार है क्योंकि सरकारी नौकरियाँ मिलती नहीं जिसके करण प्राइवेट नौकरियों में भीड़ बढ़ रही है। सरकारी नौकरी हासिल करना किसी अधूरे सपने जैसा हो गया है कभी पेपर लीक हो जाता है, तो कभी सालों तक भर्तियाँ ही नहीं आतीं। ऐसे में मजबूरी में लाखों युवा प्राइवेट सेक्टर की तरफ जाते हैं, जहाँ कंपनियाँ उनकी इसी मजबूरी का फायदा उठा रही हैं। वो जानते हैं कि बाहर लाइन लगी है नौजवानों की, इसलिए जॉब सिक्योरिटी जैसी चीज़ों को हटाकर सिर्फ मुनाफे की सोच से फैसले लिए जा रहे हैं। IT सेक्टर कभी देश के सबसे भरोसेमंद करियर ऑप्शन में से एक था, लेकिन अब वही सेक्टर एक अस्थिर, और प्रोजेक्ट-बेस्ड जॉब मार्केट है।





