1980 के दशक का मध्यकाल उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक ऐसा दौर था, जब सूबे की सियासत में पारंपरिक मर्यादाएं टूट रही थीं और बाहुबल, जाति व सत्ता का नया गठजोड़ सामने आ रहा था। इसी दौर में पूर्वांचल के एक साधारण परिवार से उठकर वीर बहादुर सिंह उत्तर प्रदेश के 14वें मुख्यमंत्री की कुर्सी पर काबिज हुए। उनकी यह राजनीतिक यात्रा जितनी रोमांचक थी, उतनी ही विवादों और उतार-चढ़ाव से भरी हुई थी।
1. उभार और पूर्वांचल के बाहुबलियों से टकराव
18 जनवरी 1935 को गोरखपुर के हरनई गांव में जन्मे वीर बहादुर सिंह ने मुफलिसी के बावजूद भूगोल से एमए की डिग्री ली और 1967 में पहली बार विधायक बने। 24 सितंबर 1985 को जब उन्होंने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली, तब तक पूर्वांचल की सियासत हरिशंकर तिवारी और वीरेंद्र प्रताप शाही जैसे बाहुबलिियों के वर्चस्व की लड़ाई का अखाड़ा बन चुकी थी।
वीर बहादुर सिंह ने माफियाओं की कमर तोड़ने के लिए उत्तर प्रदेश में कड़ा 'गैंगस्टर एक्ट' लागू कर दिया। इसी दौरान हरिशंकर तिवारी के एक शक्ति प्रदर्शन के बाद जब पुलिस ने उन्हें घेरा, तो फर्जी एनकाउंटर की अफवाह फैल गई। थानों का घेराव हुआ और कांग्रेस नेता कमलापति त्रिपाठी के जरिए प्रधानमंत्री राजीव गांधी तक बात पहुंची, तब जाकर तिवारी का एनकाउंटर टला। इस पूरे घटनाक्रम ने हरिशंकर तिवारी को पूर्वांचल का सर्वमान्य ब्राह्मण चेहरा बना दिया।
2. राम मंदिर का ताला और सांप्रदायिक तनाव का दौर
1 फरवरी 1986 का दिन भारतीय इतिहास का एक बड़ा मोड़ साबित हुआ। प्रधानमंत्री राजीव गांधी और मुख्यमंत्री वीर बहादुर सिंह की रणनीति के तहत अयोध्या के राम जन्मभूमि परिसर का ताला खोल दिया गया। शाहबानो मामले में घिरी सरकार के लिए इसे हिंदू वोटों को रिझाने का मास्टरस्ट्रोक माना गया, लेकिन यह आत्मघाती साबित हुआ।
इसके तुरंत बाद मेरठ, इलाहाबाद, मुरादाबाद और फैजाबाद जैसे शहरों में भीषण सांप्रदायिक दंगे भड़क उठे। प्रशासनिक लाचारी और दंगों की आंच मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंच गई। इलाहाबाद से सांसद अमिताभ बच्चन ने भी दंगा पीड़ितों की सुधि न लेने पर अखबारों में विज्ञापन देकर सवाल खड़े कर दिए।
3. चौतरफा घेराबंदी और किसान आंदोलन
इस दौरान सूबे में नए राजनीतिक सूरमाओं का उभार हो रहा था:
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मुलायम सिंह यादव ने दंगों और फर्जी एनकाउंटरों के खिलाफ आक्रामक तेवर अपनाए।
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चौधरी अजीत सिंह ने जाटों और किसानों की कमान संभाली।
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कांशीराम ने दलित बस्तियों में अपनी राजनीतिक जमीन तैयार की।
खास तौर पर पश्चिमी यूपी में बाबा महेंद्र सिंह टिकटैत के नेतृत्व में भारतीय किसान यूनियन ने उग्र रूप ले लिया। 11 अगस्त 1987 को सिसौली महापंचायत के दौरान जब मुख्यमंत्री वीर बहादुर सिंह वहां पहुंचे, तो किसानों ने खुले मंच पर उन्हें खरी-खोटी सुनाई और पानी के लिए भी संघर्ष करना पड़ा। इसके बाद जनवरी 1988 में मेरठ कमिश्नरी के ऐतिहासिक घेराव में 5 लाख किसानों ने डेरा डाल दिया, जिससे सरकार को झुकना पड़ा।
4. इलाहाबाद का महासंग्राम और पतन
वीर बहादुर सिंह का सबसे बड़ा इम्तिहान इलाहाबाद उपचुनाव में हुआ, जहां कांग्रेस से बागी हुए वीपी सिंह के खिलाफ पूरी सरकार झोंक दी गई। राजीव गांधी के कहने पर कांग्रेस ने रामानंद सागर की 'रामायण' के राम (अरुण गोविल) और सुनील शास्त्री को भी उतारा, लेकिन 16 जून 1988 को वीपी सिंह ने भारी मतों से जीत दर्ज की। इस हार ने न सिर्फ केंद्र सरकार को हिलाया, बल्कि वीर बहादुर सिंह की मुख्यमंत्री की कुर्सी भी छीन ली और उन्हें केंद्र में संचार मंत्री बना दिया गया।
5. पेरिस में रहस्यमयी मौत
सत्ता से हटने के बाद भी वीर बहादुर सिंह राजनीतिक बिसात बिछाने में जुटे थे। लेकिन 30 मई 1989 को फ्रांस की राजधानी पेरिस के एक होटल के कमरे में 54 वर्ष की उम्र में उनका रहस्यमयी तरीके से निधन हो गया।
सरकारी तौर पर इसे दिल का दौरा बताया गया, लेकिन बोफोर्स सौदे से जुड़े गोपनीय मिशन, शरीर का रंग नीला पड़ने के कारण 'धीमी जहर' (Slow Poison) की थ्योरी और परिवार के संदेह ने इस मौत को लाल बहादुर शास्त्री की ताशकंद मौत जैसा एक गहरा सियासी सस्पेंस बना दिया। उनके जाने के साथ ही उत्तर प्रदेश में कांग्रेस का सुनहरा पन्ना हमेशा के लिए पलट गया और राज्य की राजनीति एक नए और अनिश्चित दौर में प्रवेश कर गई।
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