7 अक्टूबर 2001 को नरेंद्र मोदी ने पहली बार गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली थी। 7 अक्टूबर 2026 को राजनीति में उनके 25 साल पूरे हो चुके हैं। इन ढाई दशकों में उनका राजनीतिक सफर एक साधारण मुख्यमंत्री से लेकर देश के सबसे शक्तिशाली और लंबे समय तक लगातार सत्ता में रहने वाले निर्वाचित नेताओं में तब्दील हो गया है। हालांकि, इन 25 वर्षों की कहानी विकास और उपलब्धियों के साथ-साथ कई गहरे अंतर्विरोधों, विवादों और गंभीर सामाजिक-आर्थिक बहसों से भी जुड़ी रही है।
गुजरात मॉडल से राष्ट्रीय राजनीति तक का सफर
2001 में जब नरेंद्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री बने, तो देश की राजनीति में वे एक बड़ा चेहरा नहीं थे। उनके मुख्यमंत्री बनने के अगले ही साल यानी 2002 में गोधरा कांड और उसके बाद हुए भीषण सांप्रदायिक दंगे राज्य के इतिहास का एक काला अध्याय बन गए। सरकारी आंकड़ों के अनुसार इन दंगों में 1,044 लोगों की जान गई। हालांकि 2022 में सुप्रीम कोर्ट ने उनके खिलाफ किसी बड़ी आपराधिक साजिश का पर्याप्त सबूत नहीं पाया, लेकिन '2002' का राजनीतिक और सामाजिक असर आज भी भारतीय राजनीति में बहस का केंद्र बना हुआ है। एक तरफ गुजरात को निवेश, बुनियादी ढांचे और 'विकास मॉडल' के रूप में पेश किया गया, तो दूसरी तरफ अल्पसंख्यक अधिकारों और ध्रुवीकरण के सवाल लगातार उनके साथ चलते रहे।
2014 में 'अच्छे दिन' के नारों और गुजरात मॉडल की गूंज के साथ मोदी ने केंद्र की सत्ता संभाली। यूपीए सरकार के खिलाफ भ्रष्टाचार के माहौल और बड़े आंदोलनों की पृष्ठभूमि में उन्होंने देश की बागडोर संभाली। युवाओं के लिए रोजगार, हर खाते में 15 लाख और काला धन वापसी जैसे वादों के साथ देश की राजनीति में एक नए युग की शुरुआत हुई।
आर्थिक नीतियां, बेरोजगारी और बड़े फैसले
सत्ता संभालने के बाद सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती बेरोजगारी से निपटने की थी। आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण (PLFS) जैसे आंकड़े और युवाओं के संघर्ष लगातार बहस का मुद्दा रहे। इस बीच, 8 नवंबर 2016 की रात नोटबंदी का ऐसा फैसला आया जिसने देश की 86 प्रतिशत करेंसी वैल्यू को सिस्टम से बाहर कर दिया। सरकार का उद्देश्य काला धन और आतंकवाद पर चोट करना था, लेकिन आरबीआई के आंकड़ों के अनुसार अधिकांश करेंसी बैंकिंग सिस्टम में वापस लौट आई।
इसके बाद 2020 में कोरोना महामारी के दौरान लॉकडाउन ने प्रवासी मजदूरों के पलायन, अस्पतालों में ऑक्सीजन की कमी और स्वास्थ्य व्यवस्था की लाचारी की दर्दनाक तस्वीरें दिखाईं। इसी दौर में लाए गए तीन कृषि कानूनों के खिलाफ देश का किसान आंदोलन दिल्ली की सीमाओं पर महीनों तक डटा रहा, जिसके बाद सरकार को तीनों कानून वापस लेने पड़े। इसके अलावा, इलेक्टोरल बॉन्ड योजना को 2024 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा असंवैधानिक घोषित किया जाना और आरटीआई (RTI) कानून में संशोधन जैसे फैसलों ने लोकतांत्रिक पारदर्शिता और संस्थागत स्वतंत्रता पर गंभीर सवाल खड़े किए।
मीडिया, सामाजिक न्याय और चुनावी राजनीति
इन 25 वर्षों में मीडिया की भूमिका और प्रेस की स्वतंत्रता पर भी गहरी आंच आई। भारत विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक में लगातार पिछड़ता गया। इसके साथ ही, दलितों और अल्पसंख्यकों के खिलाफ अपराधों के आंकड़े (NCRB रिपोर्ट), मॉब लिंचिंग और सामाजिक न्याय के मोर्चे पर उठते सवाल शासन की प्राथमिकताओं पर बहस छेड़ते रहे। राजनीति में धर्म और पहचान की सुई इस कदर हावी हुई कि चुनावी रैलियों और बहसों का दायरा बदल गया। डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर राजनीतिक वॉरियर्स और इन्फ्लुएंसर्स का एक नया कल्चर खड़ा हुआ, जिसने युवाओं की ऊर्जा को एक अलग दिशा दी।
दूसरी ओर, प्रतियोगी परीक्षाओं में लगातार पेपर लीक और धांधलियों के मामलों ने देश के युवाओं को सड़कों पर लाने के लिए मजबूर किया। अडानी समूह के विकास, कॉर्पोरेट घरानों के विस्तार और 'के-शेप इकॉनमी' (अमीर और गरीब के बीच बढ़ती खाई) ने आर्थिक नीतियों के दावों को चुनौती दी।
लोकतंत्र और भविष्य के सवाल
सत्ता के इन 25 वर्षों का सबसे बड़ा पहलू यह है कि इसने देश के लोकतांत्रिक ढांचे, संस्थाओं और चुनावी प्रक्रियाओं को गहराई से प्रभावित किया है। हाल ही में एसआईआर (SIR) और वोटर लिस्ट से करोड़ों नाम काटे जाने और फिर भारी मात्रा में उनके वापस जोड़े जाने के दावों ने चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर बड़े सवाल खड़े किए हैं। विपक्ष का विरोध और सड़कों पर उतरा जनसैलाब इस बात का प्रतीक है कि लोकतंत्र में असहमतियों की जगह और जवाबदेही की मांग कितनी अहम है। नरेंद्र मोदी के ये 25 साल केवल एक नेता की जीत या हार की कहानी नहीं हैं, बल्कि यह आधुनिक भारत के राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक ताने-बाने के पुनर्निर्माण और उसके संघर्ष की एक लंबी दास्तान है।
इस पूरी खबर को वीडियो फॉर्मेट में देखिए के लिए, क्लिक करें नीचे दिए गए लिंक पर - https://youtu.be/agDR3x8FlYU?si=PE75L7qvxl0q0Twe





