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West Bengal SIR विवाद: वोटर लिस्ट से 5.38 लाख नाम हटने पर उठे गंभीर सवाल, ऑटो-जनरेटेड फॉर्म्स पर बड़ा खुलासा

पश्चिम बंगाल एसआईआर: वोटर लिस्ट से 5.38 लाख नाम हटने पर बड़ा विवाद, ऑटो-जनरेटेड फॉर्म्स पर उठे गंभीर सवाल।

West Bengal SIR विवाद: वोटर लिस्ट से 5.38 लाख नाम हटने पर उठे गंभीर सवाल, ऑटो-जनरेटेड फॉर्म्स पर बड़ा खुलासा
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KOLKATA : पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची के विशेष पुनरीक्षण (SIR) को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। हाल ही में सामने आए आंकड़ों और मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, बंगाल की फाइनल वोटर लिस्ट से फॉर्म 7 के जरिए 5,38,320 लोगों के नाम हटा दिए गए हैं। हैरानी की बात यह है कि इन मामलों में नाम हटाने की कोई वजह (Reason) दर्ज नहीं की गई है और न ही किसी आम नागरिक या ऑब्जेक्टर द्वारा इसके लिए कोई आपत्ति दर्ज कराई गई थी।

 

सॉफ्टवेयर के जरिए ऑटो-जनरेटेड रिजेक्शंस और ईआरओ की भूमिका

नियमों के अनुसार, किसी भी वोटर का नाम हटाने के लिए फॉर्म 7 के जरिए आपत्ति दर्ज कराई जाती है और इलेक्ट्रोरल रजिस्ट्रेशन ऑफिसर (ERO) द्वारा पूरी जांच व सुनवाई के बाद ही कोई फैसला लिया जाता है। लेकिन बंगाल के मुख्य निर्वाचन अधिकारी (CEO) के बयान से यह पुष्टि हुई है कि ये डिलीशंस किसी ऑब्जेक्टर के फॉर्म भरने से नहीं, बल्कि चुनाव आयोग के सॉफ्टवेयर द्वारा ऑटो-जनरेटेड किए गए थे।

'द वायर' की रिपोर्ट के अनुसार, बंगाल की 294 में से 284 विधानसभा सीटों के फॉर्म 10 रजिस्टर्स की जांच करने पर सामने आया कि 5,23,998 मामलों में आपत्ति दर्ज कराने वाले (Objector) के रूप में खुद ERO का नाम दर्ज था, जो खुद मामले पर फैसला ले रहे थे। यानी जिस अधिकारी ने सुनवाई की और दावे को मंजूर नहीं किया, सॉफ्टवेयर ने उन्हीं के नाम से ऑटो-जनरेटेड फॉर्म 7 तैयार कर दिया। इन सभी मामलों में नाम हटाने की वजह वाला कॉलम पूरी तरह खाली पाया गया।

 

राजनीतिक सवाल और भौगोलिक आंकड़े

इस पूरी प्रक्रिया को लेकर विपक्ष और राजनीतिक दलों ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। टीएमसी नेता अभिषेक बनर्जी ने पहले ही चुनाव आयोग के आंकड़ों में विसंगतियों को लेकर सवाल उठाए थे। विश्लेषकों का कहना है कि यदि सॉफ्टवेयर ने अपने आप नाम हटाए हैं, तो उसके नियम और मानदंड सार्वजनिक होने चाहिए।

इसके अलावा, विश्लेषणात्मक रिपोर्ट में यह भी सामने आया है कि जिन विधानसभा सीटों पर भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने जीत हासिल की, वहां ड्राफ्ट वोटर लिस्ट के मुकाबले फॉर्म 7 के जरिए नाम हटाए जाने का अनुपात टीएमसी की जीती हुई सीटों के मुकाबले लगभग दोगुना (91% बनाम 49%) था। साथ ही, सीमावर्ती और शहरी क्षेत्रों में भी ग्रामीण इलाकों की तुलना में नाम हटाए जाने का अनुपात ज्यादा देखा गया।

विशेषज्ञों का यह भी तर्क है कि चुनाव आयोग प्रभावित मतदाताओं को अपना नाम दोबारा जुड़वाने के लिए फॉर्म 6 (जो सामान्यतः नए वोटर्स के लिए होता है) भरने को कह रहा है, जिससे प्रक्रिया और कानूनी पेचीदगियों को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।

इस पूरी खबर को वीडियो फॉर्मेट में देखिए के लिए इस लिंक पर क्लिक करें- https://youtu.be/m101HRjEgvw?si=QuSfJHlY-ifOVcXm

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