हाईकोर्ट ने सचिव और बीएसए के आदेश को रद्द करते हुए निर्देश दिया कि संबंधित सभी पक्षों को छह सप्ताह के भीतर सुनवाई का पूरा अवसर दिया जाए और उसके बाद ही कोई नया आदेश पारित किया जाए। यह मामला उस समय चर्चा में आया जब 2015 में जारी प्रोन्नति सूची को बुलंदशहर सहित कई अन्य जिलों के शिक्षकों ने कोर्ट में चुनौती दी। कोर्ट ने पहले ही 11 मार्च 2024 को आदेश दिया था कि याचिकाकर्ताओं और अन्य संबंधित पक्षों की आपत्तियों को सुनने के बाद ही कोई निर्णय लिया जाए।
विवाद की पृष्ठभूमि
इसके बावजूद, सचिव ने 9 दिसंबर 2024 को बिना किसी नोटिस या सुनवाई के पूरी प्रोन्नति सूची को रद्द कर दिया। इसके बाद बुलंदशहर के बीएसए ने भी 10 दिसंबर 2024 को इस संबंध में आदेश पारित कर दिया। याचिकाकर्ताओं के अधिवक्ता अग्निहोत्री कुमार त्रिपाठी ने कोर्ट में तर्क दिया कि यह आदेश न्याय के नैसर्गिक सिद्धांतों और हाईकोर्ट के पहले के आदेश का स्पष्ट उल्लंघन है। कोर्ट ने इसे गंभीरता से लेते हुए सचिव और बीएसए के आदेश को रद्द कर दिया और नए सिरे से निर्णय लेने का निर्देश दिया।
हाईकोर्ट ने एक अन्य मामले में बेसिक शिक्षा अधिकारी बदायूं के स्थानांतरण आदेश पर अंतरिम रोक लगाई। कोर्ट ने इसे गंभीर मामला मानते हुए प्रतिवादियों को छह सप्ताह के भीतर जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया और प्रत्युत्तर हलफनामा के लिए दो सप्ताह का समय दिया। यह आदेश न्यायमूर्ति प्रकाश पाडिया ने देवेन्द्र कुमार की याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया।
मामला क्या है
देवेन्द्र कुमार बदायूं जिले के बिसौली ब्लॉक के सिद्धपुर कैथोली स्थित उच्च प्राथमिक विद्यालय में चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी के पद पर कार्यरत थे। जुलाई 2024 में उन्हें कुछ आरोप लगाकर निलंबित कर दिया गया था। हालांकि, न्यायालय के आदेश के बाद उन्हें 9 जनवरी 2025 को सवेतन बहाल कर दिया गया। इसके बावजूद, बीएसए ने उन्हें दंडात्मक कार्रवाई के तहत भज्जी की मढ़ैया विकास क्षेत्र दहगवा के विद्यालय में स्थानांतरित कर दिया।
याचिकाकर्ता के वकील कमल कुमार केशरवानी ने कोर्ट में तर्क दिया कि यह स्थानांतरण प्रशासनिक आवश्यकता के बजाय दंड स्वरूप किया गया है, जो कानून के अनुसार गलत है। कोर्ट ने इस तर्क को सही मानते हुए स्थानांतरण आदेश पर रोक लगा दी और मामले की सुनवाई के लिए नोटिस जारी कर प्रतिवादियों से जवाब मांगा।
इस फैसले ने एक बार फिर यह स्पष्ट किया कि न्याय प्रक्रिया में नैसर्गिक न्याय और सभी पक्षों को सुनने का अधिकार सर्वोपरि है। कोर्ट ने यह भी दोहराया कि प्रशासनिक आदेशों को लागू करने से पहले सभी पक्षों को सुनना अनिवार्य है। इसके अलावा, इस मामले ने यह भी दिखाया कि स्थानांतरण जैसे कदम केवल प्रशासनिक आवश्यकताओं के तहत उठाए जाने चाहिए, न कि दंडात्मक उद्देश्यों के लिए।
इस निर्णय से न केवल प्रभावित शिक्षकों को राहत मिली है, बल्कि यह भी सुनिश्चित किया गया है कि प्रशासनिक कार्रवाई पारदर्शिता और न्यायिक प्रक्रिया के तहत हो।





