हाफिज अब्दुर रऊफ, जैश-ए-मोहम्मद के संस्थापक मौलाना मसूद अजहर का करीबी रिश्तेदार और सहयोगी बताया जाता है।
इस तस्वीर और वीडियो के वायरल होने के बाद सोशल मीडिया पर भारी प्रतिक्रिया हुई और पाकिस्तान पर अंतरराष्ट्रीय दबाव बढ़ने लगा। अपनी छवि को बचाने के प्रयास में पाकिस्तान की सेना के प्रवक्ता, डीजी आईएसपीआर, को सामने आकर सफाई देनी पड़ी। उन्होंने प्रेस कॉन्फ्रेंस में यह दावा किया कि जिस व्यक्ति को भारत और अन्य अंतरराष्ट्रीय संगठन आतंकी बता रहे हैं, वह दरअसल एक आम नागरिक और धार्मिक प्रवृत्ति का मौलवी है। उन्होंने कहा कि वह पारिवारिक व्यक्ति है और आतंकवाद से उसका कोई लेना-देना नहीं है।
इस सफाई को और प्रभावशाली बनाने के लिए डीजी आईएसपीआर ने उस व्यक्ति का राष्ट्रीय पहचान पत्र भी सार्वजनिक किया। लेकिन यहीं से पाकिस्तान की सच्चाई सामने आने लगी। एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर @OnTheNewsBeat नामक अकाउंट ने इस आईडी कार्ड की तुलना अमेरिका के ऑफिस ऑफ फॉरेन एसेट्स कंट्रोल (OFAC) द्वारा सूचीबद्ध हाफिज अब्दुर रऊफ की जानकारी से की। दोनों के नाम, जन्मतिथि और राष्ट्रीय पहचान संख्या पूरी तरह से मेल खाते थे।
इस खुलासे के बाद स्पष्ट हो गया कि पाकिस्तान की सेना ने जानबूझकर एक घोषित आतंकवादी को आम नागरिक के रूप में प्रस्तुत करने की कोशिश की। यह न सिर्फ पाकिस्तान की दोहरी नीति को उजागर करता है, बल्कि यह भी दिखाता है कि वहां की सेना आतंकवादियों के संरक्षण में किस हद तक जाकर झूठ बोलने को तैयार है।
डीजी आईएसपीआर ने यह भी कहा कि भारत के मीडिया द्वारा यह दावा किया गया था कि वह व्यक्ति मारा गया है और वह मौलाना मसूद अजहर का भाई है। उन्होंने यह सवाल उठाया कि कोई व्यक्ति एक ही समय में जीवित और मृत दोनों कैसे हो सकता है? इसी आधार पर उन्होंने उस व्यक्ति की पहचान को खारिज करने की कोशिश की। लेकिन जब उन्होंने जो आईडी कार्ड स्क्रीन पर दिखाया, वही बाद में पाकिस्तान की पोल खोलने वाला सबूत बन गया।
यह मामला अंतरराष्ट्रीय मंच पर पाकिस्तान की साख को फिर से कटघरे में खड़ा करता है। जहां एक ओर पाकिस्तान आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में सहयोग की बात करता है, वहीं दूसरी ओर उसी की सेना आतंकियों को संरक्षण देती नजर आती है।
अमेरिका द्वारा घोषित आतंकवादी हाफिज अब्दुर रऊफ जैसे व्यक्ति को बचाने की कोशिश पाकिस्तान की नीयत पर बड़ा सवाल खड़ा करती है।
भारत लंबे समय से यह कहता आया है कि पाकिस्तान आतंकवाद का न सिर्फ समर्थन करता है, बल्कि उसे अपनी रणनीतिक नीति का हिस्सा बनाकर इस्तेमाल करता है। ऑपरेशन सिंदूर और उसके बाद सामने आई यह घटना इस दावे की पुष्टि करती है।
पाकिस्तान को अब अंतरराष्ट्रीय समुदाय के सामने स्पष्ट करना होगा कि क्या वह सच में आतंकवाद के खिलाफ है या फिर अब भी उन्हें अपनी जमीन पर फलने-फूलने का अवसर दे रहा है। जब तक पाकिस्तान इस दोहरे रवैये से बाहर नहीं आता, तब तक क्षेत्रीय स्थिरता और शांति की कोई भी पहल अधूरी ही रहेगी।





