सरकार का यह फैसला जितना चौंकाने वाला है, उतना ही दिलचस्प भी। जब नौकरियां देने की स्थिति न हो, तो नाम बदलकर वाहवाही तो लूटी ही जा सकती है! लेकिन क्या सिर्फ एक नया नाम देने से युवा अपनी समस्याओं से उबर पाएंगे? शायद नहीं। आइए, एक नज़र डालते हैं बेरोज़गारी के असल आंकड़ों पर और उन युवाओं की कहानियों पर, जो इस नए ‘टाइटल’ के बावजूद अपने भविष्य को लेकर असमंजस में हैं।
राज्य के कौशल विकास मंत्री गौतम टेटवाल ने सरकार की इस नीति का बचाव करते हुए कहा, “रोजगार कार्यालय में पंजीकृत लोगों की संख्या और वास्तविक बेरोज़गारों की संख्या अलग-अलग होती है। यदि कोई युवा अपने पिता की दुकान पर काम कर रहा है, लेकिन उसने रोजगार कार्यालय में अपना नाम दर्ज करा रखा है, तो इसका मतलब यह नहीं कि वह बेरोज़गार है।”
सरकार का कहना है कि जो युवा खुद या अपने परिवार के 12,646 रुपये मासिक आय से कम कमा रहे हैं, उन्हें बेरोज़गार माना जा सकता है। लेकिन ज़मीनी हकीकत कुछ और ही कहानी बयां कर रही है।
नाम बदलने से हकीकत नहीं बदलती
सरकार की इस ‘नाम बदलू’ नीति ने कांग्रेस को सरकार पर हमला बोलने का नया मौका दे दिया है। कांग्रेस विधायक प्रताप ग्रेवाल का कहना है, "सरकार बढ़ती बेरोज़गारी से घबरा गई है और अपने आंकड़े छुपाने के लिए नाम बदलने का खेल खेल रही है।"
उन्होंने तंज कसते हुए कहा, "अब शायद मध्य प्रदेश के युवाओं को आकांक्षी युवा कहा जाएगा, लेकिन क्या नाम बदल देने से उनकी स्थिति बदल जाएगी? हबीबगंज स्टेशन को रानी कमलापति नाम देने से ट्रेनें जल्दी नहीं चलतीं, वैसे ही बेरोज़गार को आकांक्षी कहने से नौकरी नहीं आती!"
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