दलित राजनीति में हिस्सेदारी बढ़ाने की जरूरत
मांझी ने कहा कि अनुसूचित जाति और जनजाति की कुल आबादी 30 प्रतिशत से अधिक होने के बावजूद सत्ता में उनकी हिस्सेदारी नगण्य बनी हुई है। उन्होंने संविधान निर्माता बाबासाहब डॉ. भीमराव आंबेडकर का हवाला देते हुए कहा कि उन्होंने दलित समाज को एकजुट रहने का मंत्र दिया था, लेकिन आज दलित समुदाय उपजातियों में बंटकर अपनी ताकत कमजोर कर चुका है।
उन्होंने जोर देकर कहा, "अलग-अलग कटोरा लेकर घूमने से हक नहीं मिलेगा। हमें एकजुट होकर अपनी राजनीतिक ताकत बढ़ानी होगी।" उन्होंने 2025 के विधानसभा चुनाव में ऐसी सरकार बनाने का आह्वान किया जो दलितों के हितों की रक्षा और उनके सशक्तिकरण के लिए प्रतिबद्ध हो।
आरक्षण प्रणाली में बदलाव की वकालत
अपने संबोधन में जीतनराम मांझी ने अनुसूचित जाति के भीतर आरक्षण के शैक्षणिक वर्गीकरण की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि अब समय आ गया है कि अनुसूचित जाति की विभिन्न उपजातियों को उनकी शिक्षा दर के आधार पर आरक्षण का लाभ मिले। उन्होंने इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों का हवाला देते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से भी आग्रह किए जाने की बात कही। मांझी ने बिहार सरकार से सफाई कर्मचारी आयोग के गठन की मांग करते हुए कहा कि यह आयोग सफाई कर्मचारियों के रोजगार और जीवनस्तर को बेहतर बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। साथ ही, उन्होंने दलित छात्राओं के लिए छात्रवृत्ति बढ़ाने और महिलाओं को मुफ्त व्यावसायिक शिक्षा उपलब्ध कराने की वकालत की, ताकि समाज का यह वर्ग आत्मनिर्भर बन सके।
मांझी ने बिहार में भूमिहीनों को 5 डिसमिल जमीन देने के अपने पुराने फैसले की याद दिलाते हुए कहा कि आज भी कई जिलों में केवल 3 डिसमिल जमीन दी जा रही है, जो अन्यायपूर्ण है। उन्होंने स्पष्ट किया कि जब तक व्यापक भूमि सर्वेक्षण नहीं किया जाता, तब तक भूमिहीनों को उनका हक नहीं मिल पाएगा। इसलिए सरकार को भूमि सर्वेक्षण के काम में तेजी लानी चाहिए। मांझी ने दलित युवाओं और महिलाओं से उपजातियों में बंटने के बजाय संगठित होकर आगे बढ़ने का आग्रह किया। उन्होंने कहा, "शिक्षा शेरनी का दूध है, जो इसे ग्रहण करेगा, वही ताकतवर बनेगा।" उन्होंने युवाओं को शिक्षा और जागरूकता के माध्यम से खुद को सशक्त बनाने और समाज को विकास की मुख्यधारा से जोड़ने का संदेश दिया।
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