बता दें कि मांझी ने प्रयागराज कुंभ मेला क्षेत्र में 'युवा चेतना' नामक कार्यक्रम में भी भाग लिया, जहां कई प्रमुख साधु संतों ने भी शिरकत की। इस कार्यक्रम का उद्देश्य समाज में सकारात्मक परिवर्तन लाने के लिए युवा शक्ति को जागरूक करना था, और मांझी का वहां उपस्थित होना एक महत्वपूर्ण राजनीतिक संदेश था।
मांझी के बयान पर विशेष ध्यान देने की बात यह है कि वह कई बार रामायण और भगवान राम के अस्तित्व पर सवाल उठा चुके हैं। साल 2022 में उन्होंने एक कार्यक्रम के दौरान यह कहा था कि भगवान राम को कोई मान्यता नहीं दी जा सकती, क्योंकि वे महज वाल्मीकि और तुलसीदास द्वारा रची गई रामायण के पात्र थे। उन्होंने यह भी कहा था कि रामायण में कुछ अच्छी बातें जरूर हैं, लेकिन राम का अस्तित्व सिर्फ एक कहानी का हिस्सा था, जो धार्मिक दृष्टिकोण से मान्य नहीं किया जा सकता।
इसके बाद उनकी टिप्पणी ने काफी विवाद पैदा किया था, और 2023 में भी उन्होंने सार्वजनिक मंच पर अपनी इसी राय को दोहराया था।
इस तरह के बयानों ने जीतनराम मांझी को एक ऐसे नेता के रूप में स्थापित किया है, जो अपने विचारों और धर्म संबंधी परंपराओं के खिलाफ खड़ा रहता है, जो उन्हें अन्य नेताओं से अलग करता है। वहीं उनके कुंभ स्नान के बयान और तंज ने उनके राजनीतिक रुख को फिर से सामने ला दिया है, जिसे लेकर अब राजनीतिक और धार्मिक हलकों में चर्चा हो रही है।
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