इस मार्जिन से वे यह सुनिश्चित करना चाहते थे कि 10 प्रतिशत की गड़बड़ी होने पर भी 5 प्रतिशत के अंतर से वे चुनाव जीत सकें। हालांकि, चुनाव आयोग ने बार-बार इस तरह की आशंकाओं को खारिज किया है और ईवीएम में किसी भी प्रकार की छेड़छाड़ को सिरे से नकारा है।
विश्लेषकों के मुताबिक, केजरीवाल का यह बयान एक रणनीति हो सकता है, जिसका उद्देश्य अपने समर्थकों को यह विश्वास दिलाना है कि यदि उन्हें बहुमत से अधिक वोट मिलते हैं, तो उनका जनादेश सुरक्षित रहेगा। 2015 और 2020 के विधानसभा चुनावों में आम आदमी पार्टी ने शानदार जीत हासिल की थी, लेकिन अब भाजपा के वोट शेयर में बढ़ोतरी देखी जा रही है।
पिछले चुनाव में AAP के वोट शेयर में गिरावट आई थी, खासकर 32 सीटों पर और भाजपा का वोट शेयर बढ़ा था, जिससे उनकी सीटों की संख्या में वृद्धि हुई थी। 2020 में भाजपा ने 62 सीटों पर वोट शेयर में इजाफा किया, जिसमें से 18 सीटों पर 10 प्रतिशत से अधिक वोटों का उछाल देखा गया।
अब, आम आदमी पार्टी के लिए सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह एंटी इनकंबेंसी फैक्टर से कैसे निपटे। पार्टी ने इसे भांपते हुए कई सीटों पर उम्मीदवार बदल दिए हैं। अरविंद केजरीवाल खुद स्वीकार कर चुके हैं कि पानी, सड़क और यमुना सफाई के मोर्चे पर उनका काम अधूरा रहा है और इसके लिए वह एक और मौका चाहते हैं। इन समस्याओं को लेकर उनके सामने एक और बड़ी चुनौती यह है कि वे उन वोटर्स को कैसे बनाए रखें जिन्होंने पहले उनके पक्ष में मतदान किया था।
इसके लिए केजरीवाल बार-बार यह बताने की कोशिश करते रहे हैं कि उनकी सरकार ने लोगों को क्या लाभ पहुंचाया है। वह कहते रहे हैं कि उनकी सरकार ने हर परिवार के लिए औसतन 25,000 रुपये की बचत की है, और यदि भाजपा की सरकार बनती है तो यह बचत खत्म हो जाएगी।
केजरीवाल इस मुद्दे को लेकर बहुत संवेदनशील दिख रहे हैं और जनता से अपील कर रहे हैं कि वे सरकार के लाभ और मुफ्त योजनाओं को ध्यान में रखते हुए चुनाव में अपनी वोटिंग करें।
यह चुनाव केवल दिल्ली के भविष्य के लिए नहीं, बल्कि पूरे देश की राजनीति में भी एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हो सकता है। सभी पार्टियां अपनी पूरी ताकत से चुनावी मैदान में हैं, और यह देखा जाएगा कि किसकी रणनीति जनता के बीच ज्यादा प्रभावी साबित होती है।
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