किन-किन संगठनों ने याचिकाएं दाखिल की हैं?
इन छह याचिकाओं में प्रमुख याचिकाकर्ता जमीयत उलेमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी हैं, जिन्होंने हाल ही में पारित वक्फ कानून को संविधान के अनुच्छेद 26 का उल्लंघन बताया है। अन्य याचिकाकर्ताओं में शामिल हैं:
समस्त केरल जमीयतुल उलेमा, आम आदमी पार्टी के नेता अमानतुल्लाह खान, कांग्रेस सांसद जावेद मोहम्मद, AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी और एसोसिएशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ सिविल राइट्स।
याचिकाओं में मुख्य रूप से वक्फ कानून को धार्मिक स्वतंत्रता, संपत्ति के अधिकार, और समानता के सिद्धांत का उल्लंघन बताया गया है। याचिकाकर्ताओं के अनुसार:
कानून अनुच्छेद 26 में निहित धार्मिक मामलों के स्वतंत्र प्रबंधन के अधिकार का उल्लंघन करता है।
वक्फ बोर्ड में गैर-मुस्लिम सदस्यों की नियुक्ति और सरकार द्वारा वक्फ संपत्तियों पर नियंत्रण को धार्मिक हस्तक्षेप माना गया है।
केवल मुस्लिम समुदाय की संपत्तियों को लक्षित किया जाना, अन्य धर्मों के ट्रस्टों के लिए समान प्रावधान न होना, समानता के अधिकार के विरुद्ध है।
वक्फ संपत्तियों के सर्वेक्षण और प्रबंधन में सरकारी दखल को उनकी स्वायत्तता पर खतरा बताया गया है।
कानून, अल्पसंख्यक समुदाय की सांस्कृतिक पहचान और धार्मिक स्वतंत्रता को कमजोर करता है।
गौरतलब है कि संसद के बजट सत्र में पारित वक्फ (संशोधन) विधेयक, 2025 को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू की मंजूरी मिल चुकी है। इसके साथ ही गजट अधिसूचना जारी कर दी गई है। इस कानून के लागू होने के बाद, वक्फ अधिनियम, 1995 का नाम अब बदलकर
"यूनिफाइड वक्फ मैनेजमेंट, इम्पावरमेंट, एफिशिएंसी एंड डेवलपमेंट (UMMEED) अधिनियम, 1995" रख दिया गया है।
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