रिपोर्ट में क्या है
रिपोर्ट के अनुसार, प्रति क्यूबिक मीटर पर पीएम 2.5 पार्टिकल्स का लेवल 15 माइक्रोग्राम से पार नहीं होना चाहिए, लेकिन भारत के 10 शहरों में यह 60 माइक्रोग्राम से ऊपर तक जा चुका है। इन शहरों में साल के गिने-चुने दिन होते है, जब वायु प्रदूषण नियंत्रण में होता है। वायु प्रदूषण का सबसे ज़्यादा असर दिल्ली में देखने को मिलता है। राजधानी में प्रदूषण की मुख्य वजह वाहनों और औद्योगिक संस्थानों से निकलने वाला ज़हरीला धुँआ है। दिल्ली में हर साल कुल मौतों में से 12 हज़ार मौतें वायु प्रदुषण के कारण हो रही है, जोकि कुल मौतों का 11.5 फ़ीसद है।
वायु प्रदूषण के कारण पिछले एक साल में अहमदाबाद में 2,495, बेंगलुरु में 2,102, चेन्नई में 2,870, दिल्ली में 11,964, हैदराबाद में 1,597, कोलकाता में 4,678, मुंबई में 5,091, पुणे में 1,367, शिमला में 59 और वाराणसी में 831 लोगों की जानें गयी है।
दस शहरों में 2008 से लेकर 2019 तक 33 हज़ार से ज़्यादा वार्षिक मौतें पीएम 2.5 के कारण हुई हैं। हार्वर्ड विश्वविद्यालय के अध्ययन के सह-लेखक जोएल श्वार्ट्ज ने कहा कि अगर पीएम 2.5 पर नियंत्रण किया जाये, तो इससे हर साल हजारों लोगों की जान बचायी जा सकती है। भारत में विशेष तौर पर उन वाहनों पर रोक लगाने की आवश्यकता है, जिसके अन्य विकल्प मौजूद हों। शोधकर्ताओं ने भारत में वायु गुणवत्ता मानकों को और सख़्त करने की भी माँग की है।
अन्य देशों से तुलना
भारत में वायु प्रदूषण से हुई मौतें अन्य देशों की तुलना में ज्यादा है। चीन में 272 शहरों के अध्ययन के बाद पाया गया कि भारत में वायु प्रदूषण के कारण 0.22 फ़ीसद मौते चीन की तुलना में ज़्यादा हुई हैं। पूर्वी एशिया के 11 शहरों की तुलना में यह दर 0.38 फीसदी है। हालाँकि ग्रीस, जापान और स्पेन के मुक़ाबले भारत में मृत्य दर कम पायी गयी हैं।





