ममता बनर्जी ने भाषा आंदोलन की शुरुआत की
मुख्यमंत्री बनर्जी ने नोबेल विजेता रवींद्रनाथ टैगोर द्वारा स्थापित बोलपुर से 'बांग्ला भाषा आंदोलन' की शुरुआत की। उन्होंने केंद्र सरकार और चुनाव आयोग पर बांग्लाभाषियों को मतदाता सूची से बाहर करने की साज़िश का आरोप लगाया। ममता ने कहा, "हम अपनी भाषा नहीं छोड़ेंगे, चाहे जान ही क्यों न देनी पड़े। यह एनआरसी को पिछले दरवाजे से लागू करने की कोशिश है।" उन्होंने चेतावनी दी कि केंद्र और निर्वाचन आयोग अल्पसंख्यकों, गरीबों और ओबीसी मतदाताओं को निशाना बना रहे हैं, ताकि एनआरसी जैसी प्रक्रिया के जरिए उन्हें मतदाता सूची से हटाया जा सके।
ममता ने चुनाव आयोग को खुली चुनौती देते हुए कहा कि वैध मतदाताओं का नाम हटाया गया तो परिणाम भुगतने होंगे। उन्होंने चेताया कि जब तक मैं जिंदा हूं, बंगाल में NRC लागू नहीं होने दूंगी। अगर बंगाल से नाम हटाने की कोशिश की गई, तो छऊ नृत्य, धमसा-मडोल, शंख और नगाड़ों की आवाज़ से जवाब मिलेगा। उन्होंने राज्य के BLO को परोक्ष रूप से आगाह किया कि मतदाता सूची पुनरीक्षण के नाम पर किसी नागरिक को परेशान न करें।
राजनीतिक संदेश और सांस्कृतिक प्रतीक एकसाथ
तीन किलोमीटर लंबे मार्च में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने खुद टैगोर की तस्वीर हाथ में लेकर हिस्सा लिया। उनके साथ मंत्री, पार्टी नेता और स्थानीय प्रतिनिधि मौजूद थे। ममता ने इसे ऐतिहासिक 1952 के ढाका भाषा आंदोलन से जोड़ा और इसे बंगाली अस्मिता की रक्षा की निर्णायक लड़ाई करार दिया।ममता ने कहा कि हम किसी भाषा के विरोध में नहीं हैं, लेकिन अगर आप हमारी भाषा और संस्कृति को मिटाना चाहेंगे, तो हम शांतिपूर्ण लेकिन दृढ़ राजनीतिक प्रतिकार करेंगे।





