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1977 के चुनावों के बाद इंदिरा गांधी ने राजनीति छोड़ने का किया था विचार

1977 के लोकसभा चुनावों में मिली हार के बाद इंदिरा गांधी पहाड़ों में बसने का मन बना रही थीं। इस दौरान उन्होंने अपने परिवार की सुरक्षा को लेकर गहरी चिंताओं का सामना किया।

1977 के चुनावों के बाद इंदिरा गांधी ने राजनीति छोड़ने का किया था विचार
फोटो: 1977 के चुनावों के बाद इंदिरा गांधी ने राजनीति छोड़ने का किया था विचार

चुनाव परिणाम और इंदिरा गांधी की स्थिति

20 मार्च, 1977 की शाम को छठे लोकसभा चुनाव के परिणाम सामने आए, जिसमें पहली बार एक गैर-कांग्रेसी सरकार का गठन होने जा रहा था। लगभग 21 महीने तक चले आपातकाल के बाद कांग्रेस पार्टी के सत्ता से बाहर जाने की संभावना स्पष्ट थी, और परिणाम भी इसी दिशा में निकला। इस चुनाव में न केवल उत्तर भारत में कांग्रेस का सफाया हुआ, बल्कि इंदिरा गांधी, जिन्हें 1971 में बांग्लादेश की आज़ादी के बाद 'दुर्गा' कहा जाता था, ने अपने निर्वाचन क्षेत्र से भी हार का सामना किया।


पत्रकार नीरजा चौधरी अपनी पुस्तक 'हाउ प्राइम मिनिस्टर्स डिसाइड' में उल्लेख करती हैं कि इस हार के बाद इंदिरा गांधी ने राजनीति को छोड़कर पहाड़ों में बसने का विचार किया। उन्हें यह भी डर था कि जनता पार्टी की सरकार उनके परिवार को नुकसान पहुंचा सकती है, जिससे उन्होंने अपने परिवार को सुरक्षित रखने के लिए दूर भेजने का मन बनाया।


इंदिरा गांधी का पहाड़ों में बसने का प्लान

20 मार्च तक इंदिरा गांधी देश की प्रधानमंत्री थीं, लेकिन चुनावों की हार के बाद वे अब संसद की सदस्य भी नहीं रहीं। लगभग 59 वर्ष की उम्र में, इंदिरा गांधी ने ना केवल राजनीति से संन्यास लेने की इच्छा जताई, बल्कि हिमाचल प्रदेश में बसने का भी सोचा। नीरजा चौधरी के अनुसार, उन्होंने अपने पारिवारिक मित्र कपिल मोहन से बातचीत करते हुए कहा, 'मैं सोच रही हूं कि राजनीति से संन्यास लेकर हिमाचल प्रदेश में बस जाऊं और वहीं एक छोटा सा घर लेकर अपना संस्मरण लिखूं।'


सुरक्षा की चिंता और परिवार को भेजने का निर्णय

चुनाव हारने से पहले इंदिरा गांधी को यह एहसास हुआ था कि उनकी सरकार ने आपातकाल के दौरान नागरिकों के मूल अधिकारों का उल्लंघन किया। उन्होंने महसूस किया कि जनता पार्टी की सरकार संजय गांधी को नुकसान पहुंचा सकती है। कपिल मोहन से बातचीत में, उन्होंने कहा, 'मुझे अपनी चिंता नहीं है, बल्कि मुझे संजय और उसकी सुरक्षा की चिंता है।' इस दौरान, इंदिरा गांधी ने अपने मातृत्व instinct को प्राथमिकता दी और अपने बच्चों की सुरक्षा को पहले रखा।


21 मार्च, 1977 की आधी रात को इंदिरा गांधी ने अपने आवास 1, सफदरजंग रोड से राजीव गांधी को फोन किया और उन्हें अपनी पत्नी सोनिया और बच्चों को लेकर किसी दोस्त के घर जाने का निर्देश दिया। मां के आदेश का पालन करते हुए राजीव और सोनिया ने तुरंत अपने सोते हुए बच्चों को गोद में उठाया और अपने दोस्त के घर चले गए। कुछ दिनों बाद, उन्होंने अपने बेटों और बहुओं के साथ बच्चों को पहाड़ों में एक मित्र के पास भेज दिया।


प्रधानमंत्री देसाई का आश्वासन

अपने परिवार को सुरक्षित स्थान पर भेजने के बाद, इंदिरा गांधी ने राजीव गांधी को मुंबई भेजा और प्राइवेट हवाई जहाज की व्यवस्था करने को कहा। चूंकि राजीव एक पायलट थे, इंदिरा चाहती थीं कि परिवार के अन्य सदस्य भारत से बाहर चले जाएं। इस जानकारी ने जॉर्ज फर्नांडीस के माध्यम से प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई तक पहुंची।


प्रधानमंत्री देसाई ने जनता पार्टी के नेता जय प्रकाश नारायण से सलाह ली, जिन्होंने सुझाव दिया कि इस मामले को बहुत सावधानी से संभाला जाना चाहिए ताकि पूर्व प्रधानमंत्री के परिवार के साथ गलत व्यवहार का आरोप न लगे। इसके बाद, पीएम देसाई और जेपी ने इंदिरा गांधी के साथ एक बैठक निर्धारित की, जहां उन्हें आश्वस्त किया गया कि उनके परिवार को किसी प्रकार का नुकसान नहीं पहुंचाया जाएगा।