लद्दाख के लिए महत्वपूर्ण घोषणा
देश के मुख्य न्यायाधीश (CJI) जस्टिस सूर्यकांत ने दशहरा के अवसर पर केंद्र शासित प्रदेश लद्दाख को एक बड़ी सुविधा प्रदान की है। उन्होंने घोषणा की है कि लेह-लद्दाख के वकील अब वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए सुप्रीम कोर्ट में लद्दाख से जुड़े मामलों की सुनवाई कर सकेंगे, जिससे उन्हें दिल्ली जाने की आवश्यकता नहीं होगी। इसका अर्थ यह है कि लेह और करगिल के वकील स्थानीय स्तर पर ही अपनी दलीलें पेश कर सकेंगे।
CJI ने यह बातें रविवार को लेह में जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाई कोर्ट की लद्दाख बेंच के उद्घाटन के अवसर पर कही। उन्होंने कहा कि लद्दाख से जुड़े सभी मामलों को एक ही दिन सूचीबद्ध किया जाएगा, और उनकी सुनवाई वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से की जाएगी। इस व्यवस्था से वकीलों और संबंधित व्यक्तियों को दिल्ली यात्रा में लगने वाले समय और खर्च में राहत मिलेगी।
ऐतिहासिक पहल और न्याय का विस्तार
इस उद्घाटन को एक ऐतिहासिक कदम मानते हुए, CJI ने 1870 में लेह में एक विशेष अदालत की स्थापना का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि जबकि वह संस्था अब इतिहास बन चुकी है, लेकिन भौगोलिक चुनौतियां न्याय तक पहुंच को सीमित करती रहीं। CJI ने बताया, "लगभग एक सदी तक, लद्दाख के लिए काम करने वाला उच्च न्यायालय हिमालय की पार स्थित था, जहां सर्दियों में केवल हवाई मार्ग से पहुंचा जा सकता था।"
CJI ने यह भी कहा कि 2019 में लद्दाख को केंद्र शासित प्रदेश बनाने के बाद, उच्च न्यायालय में 'लद्दाख' नाम का समावेश एक महत्वपूर्ण कदम था, लेकिन इसे केवल प्रतीकात्मक ही माना गया। उन्होंने स्पष्ट किया, "अदालत के लेटरहेड पर नाम होना और किसी के दरवाजे पर अदालत का होना, दोनों एक जैसी बातें नहीं हैं।"
भौगोलिक चुनौतियों का समाधान
CJI ने जोर देते हुए कहा कि यह पीठ लद्दाख के दोनों जिलों-लेह और कारगिल के लिए समान रूप से है। उन्होंने कहा कि इसका उद्देश्य तभी पूरा होगा, जब लद्दाख के सभी नागरिक इस संस्थान को अपना मानने लगें। उन्होंने आगे कहा कि वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग की सुविधा स्थापित होने के बाद, उच्चतम न्यायालय लद्दाख से जुड़े सभी मामलों को एक ही दिन सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करेगा।
CJI ने कहा, "हम समुद्र तल से लगभग 3,500 मीटर ऊपर हैं, और मुझे बताया गया है कि हमारे देश में इससे अधिक ऊंचाई पर कभी किसी उच्च न्यायालय की पीठ स्थापित नहीं हुई है।" उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि किसी अदालत का असली पैमाना उसकी भौगोलिक ऊंचाई नहीं, बल्कि उसकी सुलभता है।





