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सुप्रीम कोर्ट की सख्ती: नोएडा ज़मीन मामले में कहा- 'न्याय और धोखाधड़ी एक साथ नहीं चल सकते'

सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश के गौतमबुद्ध नगर स्थित नोएडा प्राधिकरण द्वारा अधिग्रहित भूमि को लेकर पूर्व में जारी मुआवजा आदेश को रद्द कर दिया।

सुप्रीम कोर्ट की सख्ती: नोएडा ज़मीन मामले में कहा- 'न्याय और धोखाधड़ी एक साथ नहीं चल सकते'
फोटो: सुप्रीम कोर्ट की सख्ती: नोएडा ज़मीन मामले में कहा- 'न्याय और धोखाधड़ी एक साथ नहीं चल सकते'
सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को एक अहम फैसले में उत्तर प्रदेश के गौतमबुद्ध नगर स्थित नोएडा प्राधिकरण द्वारा अधिग्रहित भूमि को लेकर पूर्व में जारी मुआवजा आदेश को रद्द कर दिया। कोर्ट ने पाया कि यह मुआवजा एक पक्ष द्वारा धोखाधड़ी से प्राप्त किया गया था, जिसे रिकॉर्ड से हटाया जाना चाहिए। बार एंड बेंच की रिपोर्ट के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट की तीन-न्यायाधीशों की पीठ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस उज्जल भुइयां और जस्टिस दीपांकर दत्ता ने कहा कि "धोखाधड़ी से सब कुछ संदिग्ध हो जाता है" का सिद्धांत केवल निचली अदालतों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सुप्रीम कोर्ट के पूर्ववर्ती आदेशों को भी प्रभावित कर सकता है।

धोखाधड़ी और न्याय साथ नहीं रह सकते- सुप्रीम कोर्ट

विवादित भूमि वर्ष 1997 में तीन व्यक्तियों रेड्डी वीराना, विष्णु वर्धन और टी. सुधाकर द्वारा खरीदी गई थी। वर्ष 2005 में यह भूमि नोएडा प्राधिकरण द्वारा अधिग्रहित की गई, जो अब सेक्टर 18 स्थित एक प्रमुख वाणिज्यिक क्षेत्र का हिस्सा है। आरोप है कि रेड्डी वीराना ने विभिन्न अदालतों सिविल कोर्ट से लेकर हाईकोर्ट और अंततः सुप्रीम कोर्ट तक धोखाधड़ी से यह दावा किया कि वे इस भूमि के एकमात्र स्वामी हैं।  वर्ष 2022 में सुप्रीम कोर्ट ने इसी आधार पर उन्हें उच्च मुआवजा देने का आदेश दिया था। हालांकि, भूमि के अन्य सह-स्वामी विष्णु वर्धन ने वीराना के दावे का विरोध करते हुए सुप्रीम कोर्ट से 2022 के आदेश को रद्द करने की अपील की। उन्होंने आरोप लगाया कि वीराना ने दस्तावेज़ों में हेराफेरी कर उनके और सुधाकर के स्वामित्व को मिटा दिया और सारा मुआवजा हड़प लिया।

सुप्रीम कोर्ट का कड़ा रुख

जस्टिस दीपांकर दत्ता द्वारा लिखित निर्णय में स्पष्ट किया गया कि धोखाधड़ी और न्याय साथ नहीं रह सकते। अदालत ने कहा कि भले ही विष्णु वर्धन की ओर से औपचारिक पुनर्विचार याचिका दाखिल न की गई हो, लेकिन चूंकि 2022 का आदेश ही धोखाधड़ी से हासिल किया गया था, इसलिए वह स्वतः अमान्य हो जाता है और उसे रिकॉर्ड से हटाना उचित है। कोर्ट ने 28 अक्टूबर 2021 को इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा दिए गए उस फैसले को भी रद्द कर दिया, जिसमें वीराना को संपत्ति का एकमात्र मालिक माना गया था और उन्हें प्रति वर्ग मीटर ₹152.04 की जगह ₹1,10,000 मुआवजा देने का आदेश दिया गया था। 

सुप्रीम कोर्ट ने इसे न्यायिक प्रक्रिया की गंभीर क्षति बताते हुए कहा कि पूरी कार्यवाही "धोखाधड़ी से दूषित" थी। सुप्रीम कोर्ट ने यह मामला पुनः इलाहाबाद हाईकोर्ट को सौंप दिया है और निर्देश दिया है कि भूमि के अन्य दो मालिक—विष्णु वर्धन और टी. सुधाकर—को अतिरिक्त प्रतिवादी के रूप में शामिल किया जाए ताकि मामले की निष्पक्ष सुनवाई हो सके।