अदालत ने बॉम्बे हाईकोर्ट की भाषा पर जताई आपत्ति
न्यायमूर्ति अभय एस. ओका, अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की तीन सदस्यीय बेंच ने बॉम्बे हाईकोर्ट द्वारा उपयोग किए गए शब्दों को संविधान के लोकाचार और आदर्शों के खिलाफ बताया। लाइव लॉ की रिपोर्ट के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट ने कहा,
"संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत हर नागरिक को सम्मानपूर्वक जीवन जीने का मौलिक अधिकार प्राप्त है। किसी महिला को ‘नाजायज पत्नी’ कहना उसके इस अधिकार का उल्लंघन है। इस तरह की भाषा न केवल महिला विरोधी है बल्कि हमारे संविधान की मूल भावना के भी विपरीत है।"
सुप्रीम कोर्ट ने जताई गहरी नाराजगी
सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने हाईकोर्ट के फैसले पर हैरानी जताते हुए कहा कि "यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि ऐसी आपत्तिजनक भाषा एक उच्च न्यायालय के निर्णय में शामिल है। ऐसे शब्दों का प्रयोग न केवल अनुचित बल्कि महिला विरोधी भी है।"
बेंच ने अपने फैसले में यह भी स्पष्ट किया कि यदि हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 11 के तहत विवाह अमान्य घोषित किया गया है, तो फिर भी उस विवाह में शामिल जीवनसाथी धारा 25 के तहत गुजारा भत्ता और भरण-पोषण का हकदार होगा।
सुप्रीम कोर्ट ने इस संदर्भ में भाऊसाहेब संधू पुत्र रघुजी मगर बनाम लीलाबाई पत्नी भाऊसाहेब मामले का उल्लेख किया। इस केस में बॉम्बे हाईकोर्ट ने मुआवजे का आदेश देने से इनकार करते हुए ‘अवैध पत्नी’ और ‘वफादार रखैल’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया था।
सुप्रीम कोर्ट ने इस भाषा की कड़ी आलोचना करते हुए कहा,
"जब पति के लिए 'अवैध पति' शब्द का प्रयोग नहीं किया जाता, तो पत्नी के लिए ऐसे शब्दों का इस्तेमाल कर उसके सम्मान को ठेस नहीं पहुंचाई जा सकती।"
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