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सुप्रीम कोर्ट का फैसला: संसद या विधानसभा का कानून अदालत की अवमानना नहीं माना जाएगा

यह मामला वर्ष 2012 में दाखिल एक अवमानना याचिका से जुड़ा था, जिसमें आरोप लगाया गया था कि छत्तीसगढ़ सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व निर्देशों की अवहेलना की।

सुप्रीम कोर्ट का फैसला: संसद या विधानसभा का कानून अदालत की अवमानना नहीं माना जाएगा
फोटो: सुप्रीम कोर्ट का फैसला: संसद या विधानसभा का कानून अदालत की अवमानना नहीं माना जाएगा
सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक अहम फैसले में स्पष्ट किया है कि यदि संसद या कोई राज्य विधानसभा अदालत के आदेश के बावजूद कोई नया कानून पारित करती है, तो मात्र इस आधार पर उसे अदालत की अवमानना नहीं माना जा सकता। जब तक वह कानून किसी संवैधानिक अदालत द्वारा असंवैधानिक घोषित नहीं किया जाता, तब तक वह पूरी तरह वैध और प्रभावी माना जाएगा। न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना और न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने यह फैसला 15 मई को सुनाया। यह मामला वर्ष 2012 में दाखिल एक अवमानना याचिका से जुड़ा था, जिसमें आरोप लगाया गया था कि छत्तीसगढ़ सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व निर्देशों की अवहेलना की।

सुप्रीम कोर्ट ने वर्ष 2011 में एक ऐतिहासिक फैसले में छत्तीसगढ़ में ‘सलवा जुडूम’ जैसे निगरानी समूहों पर प्रतिबंध लगाते हुए राज्य सरकार को विशेष पुलिस अधिकारियों (SPOs) के रूप में आदिवासियों को हथियार देने से मना किया था। कोर्ट ने इसे असंवैधानिक और मानवाधिकारों का उल्लंघन बताया था।

हालांकि, इसके बावजूद छत्तीसगढ़ विधानसभा ने उसी वर्ष सितंबर में ‘छत्तीसगढ़ सहायक सशस्त्र पुलिस बल अधिनियम, 2011’ पारित किया, जिसके तहत राज्य में माओवादी हिंसा से निपटने के लिए एक नया सहायक बल गठित किया गया। इस बल में पूर्व SPOs को वैध रूप से शामिल कर लिया गया। यह याचिका दिल्ली विश्वविद्यालय की पूर्व प्रोफेसर नंदिनी सुंदर, लेखक रामचंद्र गुहा और आंध्र प्रदेश सरकार के पूर्व अधिकारी ई.ए.एस. शर्मा ने दाखिल की थी।

कोर्ट ने अपने निर्णय में कहा कि यदि कोई विधायिका अदालत के आदेश के बाद कानून बनाती है, तो वह अवमानना नहीं कही जाएगी। कानून की वैधता पर निर्णय केवल संवैधानिक अदालतें ले सकती हैं। न्यायमूर्ति नागरत्ना की अध्यक्षता वाली पीठ ने यह भी कहा कि केवल इसलिए कि नया कानून किसी न्यायिक निर्णय से असहमति जताता है, उसे अवमानना नहीं ठहराया जा सकता। कोर्ट ने भारत के संविधान में वर्णित ‘पावर के विभाजन’ (Separation of Powers) के सिद्धांत को दोहराते हुए कहा कि विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका—तीनों के अधिकार सीमित और परिभाषित हैं और सभी को एक-दूसरे की मर्यादा का सम्मान करना चाहिए।