पीठ ने कहा, "हुसैन 4 साल 10 महीने से जेल में हैं, और उन पर केवल उकसाने का आरोप है, जो कि नौ मामलों में है, जिसमें उन्हें जमानत मिल चुकी है।"
हुसैन के वकील, वरिष्ठ अधिवक्ता सिद्धार्थ अग्रवाल ने अदालत में यह तर्क दिया कि हुसैन ने 4 साल 10 महीने से जेल में समय बिताया है और उन पर 2020 के दिल्ली दंगों के दौरान भीड़ को उकसाने का आरोप है। उन्होंने यह भी बताया कि हुसैन को 11 मामलों में एफआईआर का सामना करना पड़ा है, जिनमें से नौ मामलों में उन्हें जमानत मिल चुकी है। हुसैन की गिरफ्तारी 16 मार्च 2020 को हुई थी, और उनके खिलाफ आरोप तय करने में तीन साल का वक्त लगा।
अभियोजन पक्ष ने 115 गवाहों का हवाला दिया है, जिनमें से केवल 22 से पूछताछ की गई है, जबकि बाकी गवाहों से पूछताछ अभी बाकी है।
हुसैन के वकील ने यह भी बताया कि मुख्य आरोपियों को पहले ही नियमित जमानत मिल चुकी है। वहीं, दिल्ली पुलिस ने इस याचिका का विरोध करते हुए कहा था कि चुनाव लड़ना कोई मौलिक अधिकार नहीं है, और हुसैन ने जो दंगे भड़काए थे, उसके कारण उनके खिलाफ गंभीर आरोप हैं, जिनसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
दिल्ली हाई कोर्ट ने 14 जनवरी को हुसैन की अंतरिम जमानत याचिका खारिज कर दी थी, जिसमें उन्होंने चुनाव प्रचार के लिए जमानत की मांग की थी। हाई कोर्ट ने इसे अस्वीकार करते हुए कहा कि हुसैन के खिलाफ आरोपों की गंभीरता को नकारा नहीं जा सकता, क्योंकि हिंसा में कई लोग मारे गए थे और हुसैन पर दंगों से संबंधित लगभग 11 प्राथमिकियां दर्ज थीं।
कोर्ट ने यह भी कहा कि हुसैन मनी लॉन्ड्रिंग और यूएपीए जैसे गंभीर मामलों में हिरासत में हैं, और उनका चुनावी प्रचार चुनावी प्रक्रिया के लिए उचित नहीं होगा।
हुसैन की ओर से उनके वरिष्ठ वकील ने तर्क दिया कि चुनाव लड़ने के लिए एक जटिल प्रक्रिया का पालन करना होता है, जिसमें न केवल नामांकन दाखिल करना होता है, बल्कि प्रचार करने के लिए बैंक खाता खोलने और अन्य औपचारिकताएं पूरी करने की भी आवश्यकता होती है। दिल्ली पुलिस ने इस याचिका का विरोध करते हुए कहा था कि चुनाव लड़ना कोई मौलिक अधिकार नहीं है और हुसैन ने 2020 के दंगों की साजिश रची और उसे फंडिंग की, इसलिए उन्हें चुनावी प्रचार की अनुमति नहीं दी जा सकती।
यह मामला 2020 के उत्तर-पूर्वी दिल्ली दंगों से जुड़ा है, जिसमें 53 लोगों की जान चली गई थी। दंगों के दौरान, एक शिकायतकर्ता रविंदर कुमार ने दयालपुर थाने में यह जानकारी दी कि उनका बेटा अंकित शर्मा, जो इंटेलिजेंस ब्यूरो में तैनात था, 25 फरवरी 2020 से लापता हो गया था। बाद में उनका शव खजूरी खास नाले से बरामद हुआ था, जिसमें 51 चोटें पाई गई थीं। इस घटना ने दंगों की भयावहता को और बढ़ा दिया था, और इसे लेकर कई लोगों ने सख्त प्रतिक्रिया दी थी।
हुसैन ने अपनी जमानत याचिका में यह भी कहा कि उन्होंने 4 साल 9 महीने जेल में बिताए हैं, लेकिन अभियोजन पक्ष के 114 गवाहों में से अब तक केवल 20 से पूछताछ की गई है। इसका मतलब है कि मुकदमा अभी भी लंबा चलेगा और इसकी सुनवाई में अभी और समय लगेगा। उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि सह-अभियुक्तों को पहले ही हाई कोर्ट से जमानत मिल चुकी है, और इसलिए उन्हें भी जमानत मिलनी चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले की अगली सुनवाई 22 जनवरी को तय की है, जब वह इस पर और अधिक विचार करेगा और दिल्ली पुलिस से ताहिर हुसैन की याचिका पर अपनी स्थिति स्पष्ट करने को कहेगा।
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