RBI से सरकार का पैसा लेना, कितना सही-कितना गलत
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RBI से सरकार का पैसा लेना, कितना सही-कितना गलत

By BBC(Hindi) calender  28-Aug-2019

RBI से सरकार का पैसा लेना, कितना सही-कितना गलत

भारतीय रिज़र्व बैंक ने केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार को लगभग 1.76 लाख करोड़ रुपए लाभांश और सरप्लस पूंजी के तौर पर देने का फ़ैसला किया है.
समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक, इसमें से 28,000 करोड़ रुपए अंतरिम लाभांश के तौर पर सरकार को पहले ही दिए जा चुके हैं.
जब अर्थव्यवस्था की रफ़्तार सुस्त हो रही है, नौकरियां जा रही हैं, लोग कम खर्च कर रहे हैं, रियल स्टेट और ऑटो सेक्टर की हालत खस्ता है ऐसे में सरकार के लिए आरबीआई का ये फ़ैसला काफ़ी राहत देने वाला होगा.
ये फ़ैसला 2018 में पूर्व आरबीआई गवर्नर विमल जालान की अध्यक्षता में बनाई गई एक समिति के सिफ़ारिशों के आधार पर किया गया है.
इस समिति में विमल जालान के अलावा पूर्व उप गवर्नर डॉक्टर राकेश मोहन, आरबीआई सेंट्रल बोर्ड डायरेक्टर भरत दोशी, आरबीआई सेंट्रल बोर्ड डायरेक्टर सुधीर मानकड, सुभाष चंद्र गर्ग और आरबीआई उप गवर्नर एनएस विश्वनाथन शामिल थे.
मोटे तौर पर समझें कि रिज़र्व बैंक अपने दो रिज़र्व से एक बड़ी रक़म केंद्र सरकार को देगी.
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क्या आरबीआई कमज़ोर होगा?
इस 1.76 लाख करोड़ में से लाभांश 1.2 लाख करोड़ का होगा जबकि क़रीब 52 हज़ार करोड़ कंटिंजेंसी रिज़र्व में से आएंगे. कंटिंजेंसी रिज़र्व मतलब इमर्जेंसी के दौरान इस्तेमाल होने वाली धनराशि के लिए फंड.
कई बार मनी मार्केट में एक बड़े पेमेंट के रुकने से असर कई जगहों पर पड़ता है और इससे भुगतान के रुकने का एक सिलसिला यानी एक चेन सी बन जाती है. ऐसी स्थितियों के लिए कंटिंजेंसी रिज़र्व होना ज़रूरी होता है.
दरअसल, हर साल रिज़र्व बैंक सरकार को लाभांश देती है और अर्थशास्त्रियों के मुताबिक़ इसमें कोई हर्ज़ नहीं क्योंकि आरबीआई सरकार की एजेंसी है.
कई सालों से सरकार में ये बात चल रही थी कि आरबीआई के पास ज़रूरत से ज़्यादा पैसे इकट्ठा हो रहे हैं और हर साल आरबीआई सरकार को जो डिविडेंड या लाभांश देती है उसे बढ़ाना चाहिए.
पूर्व चीफ़ इकोनॉमिक एडवाइज़र अरविंद सुब्रमण्यम भी इसका समर्थन करते थे. उनका मानना था कि आरबीआई के 4.5 से 7 लाख करोड़ रुपए एक्स्ट्रा कैपिटल है जिसका इस्तेमाल बैंकों को रीकैपिटलाइज़ करने या उन्हें आर्थिक तौर पर बेहतर स्थिति में लाने के लिए करना चाहिए.
इस बारे में अर्थशास्त्रियों, बैंक अधिकारियों की राय बँटी थी. कुछ का मानना था कि इससे केंद्रीय बैंक की स्थिति कमज़ोर होगी.
क्या इस पैसे का इस्तेमाल वेतन देने में होगा?
इस बार लाभांश क़रीब 1.2 लाख करोड़ का है, यानी पिछली बार के सबसे ज़्यादा लाभांश का दोगुना.
साल 2017-18 में ये आंकड़ा 40,659 रुपए करोड़ था, साल 2016-17 में 30,659 करोड़ रुपए और साल 2015-16 में 65,876 करोड़ रुपए.
इसलिए चिंता ये है कि क्या सरकार रिज़र्व बैंक से बहुत ज़्यादा पैसा निकाल रही है.
कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने ट्वीट कर कहा, "ख़ुद पैदा की गई आर्थिक तबाही का क्या उपाय निकाला जाए, इस बारे में प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री को कुछ नहीं पता. आरबीआई से चोरी करके कुछ हासिल नहीं होगा. ये कुछ ऐसा है कि गोली की चोट के लिए डिस्पेंसरी से बैंड एड चोरी करना."
सवाल ये है कि सरकार इतनी बड़ी धनराशि का कैसे इस्तेमाल करेगी? क्या इसका एक हिस्सा बैंकों की आर्थिक तौर पर मज़बूत बनाने के लिए किया जाएगा?
अर्थशास्त्री पूजा मेहरा के हिसाब से अच्छा होता कि इस पैसे का इस्तेमाल मूलभूत सुविधाओं के सुधार के लिए होता.
वो कहती हैं, "मेरे हिसाब से इस पैसे का सबसे अच्छा इस्तेमाल होगा अगर ये कैपिटल एक्पेंडीचर में हो, यानी इससे मूलभूत सुविधाओं में सुधार हो, सड़कें बनें, हाइवेज़, रेलवेज़ बनें. इसका खर्च इंटरेस्ट पेमेंट में न हो, तन्ख्वाहें देने में न हो. ऐसा करने से इससे अर्थव्यवस्था को फ़ायदा पहुंचेगा और हमारे स्लोडाउन से उबरने से आसार बेहतर होंगे."
लेकिन ऐसा शायद ही हो क्योंकि सरकार के पास ये धनराशि ऐसे वक़्त आई है जब अर्थव्यवस्था की रफ्तार धीमी हो रही है, लोगों की नौकरियां जा रही हैं और ऑटो में हालात चुनौतीपूर्ण हैं.
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अगले साल क्या होगा?
अर्थशास्त्री विवेक कौल कहते हैं कि इस बार बजट ने जितनी आमदनी आने का आकलन किया था, वो तो आने वाले है नहीं, "इसलिए सरकार के लिए ज़रूरी हो गया था कि कहीं से पैसा आए."
वो कहते हैं, "सरकार किस्मतवाली है कि उनके पास आरबीआई से इतना ज़्यादा पैसा आ रहा है, नहीं तो उसे दिक्कत होती. या तो उन्हें खर्च घटाना पड़ता, या तो और कर्ज़ लेना पड़ता जिससे ब्याज़ दर और बढ़ती."
लेकिन महत्वपूर्ण सवाल ये है कि इस साल तो आरबीआई से पैसा आ गया है लेकिन अगले साल क्या होगा, क्योंकि शायद ही कोई सरकार हो जिसका खर्च कभी कम नहीं होता है.
विवेक कौल के मुताबिक, "जिस किस्म के स्लोडाउन में अभी हम हैं, मुझे तो नहीं लगता कि ये स्लोडाउन जल्दी ख़त्म होने नहीं वाला है. अगले साल अगर ऐसी ही कुछ हालत रही और टैक्स कलेक्शन धीमा ही रहे, तो फिर पैसा कहां से आएगा. उस हिसाब से ये (आरबीआई से इतनी बड़ी धनराशि लेना) ग़लत उदाहरण है."
वो कहते हैं, "अभी तक सरकार के पैसे नहीं होते थे तो कभी एलआईसी से जुगाड़ करके, ओएनजीसी ने एचपीसीएल को ख़रीदा जैसी तिकड़मबाज़ी करके काम चलता था. अब आप आरबीआई के आगे कहां जाएंगे."
आरबीआई की स्वायत्तता पर सवाल
अर्थशास्त्री पूजा मेहरा के मुताबिक़, सरकार की कोशिश होनी चाहिए थी कि अर्थव्यवस्था को ठीक किया जाए.
वो कहती हैं, "हर चीज़ में एक बैलेंस होना चाहिए. सरकार इतनी ज़्यादा आक्रामक तरीक़े से (पब्लिक सेक्टर कंपनियों आदि से) पैसे निकाल रही है वो शायद ठीक नहीं है, क्योंकि अगर उन कंपनियों में पैसा रहता तो अर्थव्यवस्था के लिए अच्छा होता. ये कंपनियां प्रोजेक्ट्स लगातीं, निवेश करतीं, और जीडीपी को फ़ायदा होता. ओएनजीसी जैसी कंपनियों को कमज़ोर करना अच्छी रणनीति नहीं है."
विमल जालान समिति ने ये भी सिफ़ारिश की थी कि ख़तरों से निपटने के लिए आरबीआई के पास अपनी बैलेंसशीट के 5.5 से 6.5 फ़ीसदी रक़म होनी चाहिए, यानी चुनौतियों से निपटने के लिए आरबीआई के पास कम धनराशि होगी.
पूर्व चीफ़ स्टैटिशियन ऑफ़ इंडिया प्रोनब सेन के मुताबिक, अगर ये रेंज 6 से 6.5 होती तो उन्हें "ज्यादा ख़ुशी होती."
पूर्व आरबीआई गवनर रघुराम राजन और उर्जित पटेल के जाने के बाद सवाल उठते रहे हैं कि आरबीआई अपने फ़ैसले लेने में कितनी स्वायत्त है.
कहीं ये सेल्फ़ गोल तो नहीं?
आरबीआई के पूर्व उप गवर्नर विरल आचार्य ने पिछले अक्टूबर में कहा था कि केंद्रीय बैंक की स्वायत्तता को कमज़ोर करना सेल्फ़ गोल जैसा है.
हाल ही में पूर्व आरबीआई गवर्नर डी सुब्बाराव ने कहा था कि आरबीआई के रिज़र्व पर "धावा बोलना" सरकार के "दुस्साहस" को दर्शाता है.
सरकार की मदद करने वाले आरबीआई के इस फ़ैसले को भी उसी चश्मे से देखा जा रहा है.
लेकिन पूर्व चीफ़ स्टैटिशियन ऑफ़ इंडिया प्रोनब सेन को नहीं लगता कि 'इस फैसले का आरबीआई का खुद फ़ैसले लेने के अधिकार पर असर पड़ता है.'
वो कहते हैं, "आरबीआई की स्वायत्तता की बात तब उठती है जब मुद्रा नीति पर बात हो रही होती या फिर बैंक और एनबीएफ़सी पर निरक्षण संबंधी कंट्रोल की बात हो रही है. आरबीआई ख़ुद कितना मुनाफ़ा अपने पास रखे और कितना सरकार को दे, इसे आरबीआई की स्वायत्तता के चश्मे से देखना ठीक नहीं."
प्रोनब सेन कहते हैं कि अगर सरकार को आरबीआई के हाथ मरोड़ने होते तो सरकार ने ये बहुत पहले कर दिया होता.
वो कहते हैं कि विमल जालान समिति की सिफ़ारिशों के बाद कुछ बातें साफ़ हो गई हैं कि आरबीआई अपने पास कितना रिज़र्व रख सकती है उसे कितनी धनराशि सरकार को देनी होगी लेकिन इसके लिए ज़रूरी है कि इस दस्तूर की भावना का पालन जारी रहे.
उधर विवेक कौल के अनुसार, 'आरबीआई गवर्नर के सरकार से बहुत अच्छे संबंध नहीं होने चाहिए' और 'ऐसा लगता है कि आरबीआई गवर्नर शक्तिकांत दास अभी वित्त सचिव की ही भूमिका में ही हैं.'

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